हर्षित अनुशासित शिक्षा (Joyful Disciplined Education in Hindi)

शिक्षा का कलेवर अत्यंत विराट व इसका अस्तित्व मानवीय जीवन के साथ जुड़ा हैं। शिक्षा क्षेत्र में अनेकानेक अनुसंधान के उपरान्त भी अनेक पहलु अब भी अछूते हैं। शिक्षा क्षेत्र में शिक्षाशास्त्रियों एवम शिक्षाविदों ने सिद्धान्तों, अ56वधारणाओं एवम सूत्रों का प्रतिपादन किया हैं।

हर्षित अनुशासित शिक्षा (Joyful Disciplined Education in Hindi)

शिक्षा एक विराट विषय- आनंद व अनुशासन इसके दो पहलु।

हर्षित अनुशासित शिक्षा एक कभी ना प्राप्त हो सकने वाला लक्ष्य है। प्रत्येक कालखंड में शासन द्वारा समाजोपयोगी एवम यथोचित शिक्षा व्यवस्था का कार्य किया है। शिक्षा क्षेत्र में आनंद व अनुशासन ऐसे पहलु रहे है जिन्हें प्रत्येक कालखंड व व्यवस्था में कमोबेश अपनाया गया है एवम इनके महत्व को स्वीकार किया गया हैं।

जिस शिक्षा की प्राप्ति में आनंद

की अनुभूति ना हो एवम जिसका उपयोग जीवन को बेहतर बनाने के लिए नहीं हो वह शिक्षा संसाधनो के अपव्यय का कारण बनती हैं। अनुशासन विद्यार्थी जीवन की प्रथम आवश्यकता है। अनुशासनहीन व अराजक व्यवस्था द्वारा शिक्षा के मर्म को समझा जाना नितांत असम्भव हैं।


अनुशासनहीनता के कारण समाज में अनेक कुशाग्र व मेघावी बुद्धि के विद्यार्थियों का पथ विचलन एक आम उदाहरण हैं।

आनंद और अनुशासन परस्पर विरोधी ना होकर पूरक तत्व है। प्रारम्भिक दौर में इन दोनों में विभेद किया जा सकता है परन्तु अंतोगत्वा दोनों एक दूसरे में समाहित हो जाते है तथा यह अधिगम की श्रेष्ठ अवस्था हैं। किसी भी श्रेष्ठ संस्थान में इसे आसानी से अनुभूत किया जा सकता हैं।

एक संस्था प्रधान को सम्पूर्ण संस्था में एवम

शिक्षक को अपनी कक्षा में दोनों तत्वों का सजगता पूर्वक समागम सुनिश्चित करना आवश्यक हैं। एक प्रोफेशनल शिक्षक को अपने द्वारा करणीय कार्यो का उद्देश्य, प्रक्रिया, मूल्यांकन व निरंतर नवाचार  का सम्पूर्ण ज्ञान रहना चाहिए।

वर्तमान सन्दर्भ :

वर्तमान सन्दर्भ में "अनुशासन व आनंद" दोनों के सम्मिलित स्वरूप का अत्यधिक महत्व है। हमारे राष्ट्र में नई शिक्षा नीति का आगमन हो चुका है जिसे 2030 तक मूर्त रूप धारण करना है। नई शिक्षा नीति में सम्मिलित नए बिंदुओं व दर्शन को प्राप्त करने में अनुशासन व आनंदित शिक्षा का सम्मिश्रण अतिआवश्यक है।

व्यवहारिक स्तिथि :

व्यवहारिक रूप में अनुशासन व आनंदमय शिक्षा व्यवस्था को स्थापित करने के लिए आवश्यक होगा कि शिक्षक निम्नलिखित बिंदुओं पर पूर्ण ध्यान देवे-

1. शिक्षण हेतु वार्षिक, मासिक, साप्ताहिक तथा दैनिक योजना का निर्माण व तदनुसार शिक्षण तैयारी।

2.शिक्षण तैयारी हेतु पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तक के साथ ही सन्दर्भ पुस्तकों के माध्यम से नोट्स तैयार करना।

3. इन नोट्स के आधार पर आवश्यक TLM का निर्माण करना। TLM निर्माण में विद्यार्थियों का सहयोग लेना एक रचनात्मक प्रयास साबित होता है।

4. यूनिट समाप्ति के पश्चात सीधे प्रश्नोत्तर , परख या गृहकार्य के स्थान पर समस्या-निवारण, तर्क-वितर्क, संवाद को प्राथमिकता देना।

5. ज्ञान को पूर्ण रूप से अंगीकार करने के उद्देश्य से प्राप्त ज्ञान के आधार पर मॉड्यूल, प्रोटोटाइप, संकलन व प्रतियोगिता इत्यादि का आयोजन करवाया जा सकता है।

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निवेदन :

समस्त शिक्षको व संस्थाप्रधान साथियों से निवेदन है कि इस लेख को पढ़ने के पश्चात अपने अमूल्य विचार टिप्पणी के रूप में अवश्य लिखे ताकि अन्य शिक्षक साथी आपके विचारों से लाभान्वित हो सके।