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| On 2 months ago

ग्यारहवें भाव में केतु का फल | स्वास्थ्य, करियर और धन

ग्यारहवें भाव में केतु होने से जातिका परोपकारी, दयालु, उदार, सन्तुष्ट, गुणवान होती है। जातिका सुशिक्षित और सुविद्य (उत्तम विद्या युक्त), शास्त्ररसिक, विनोदी, विद्वान होती है। एकादशभाव में केतु होने से जातिका सरस और मधुर बोलने वाली होती है तथा अच्छा भाषण देती है।

ग्यारहवें भाव में केतु का फल

ग्यारहवें भाव में केतु का शुभ फल (Positive Results of Ketu in 11th House in Astrology)

  • एकादश भाव में केतु (Ketu in 11th House) होने से जातिका निर्मल आकृति, दर्शनीय स्वरूप अर्थात् देखने में आकर्षक और
    मनोहर, विशेष कान्ति और बड़ी तेजस्वी होती है। जातिका उत्तम वस्त्रधारण करने वाली होती है। सुन्दर, स्वच्छ वस्त्रधारी होती है।
  • जातिका परोपकारी, दयालु, उदार, सन्तुष्ट होती है। गुणवान होती है। जातिका सुशिक्षित और सुविद्य (उत्तम विद्या युक्त), शास्त्ररसिक, विनोदी, विद्वान होती है।
  • एकादशभाव में केतु होने से जातिका सरस और मधुर बोलने वाली होती है। अच्छा भाषण देती है।
  • एकादश केतु से जातिका प्रतापी, पराक्रमी, प्रतिष्ठित, लोकप्रिय, दूसरों द्वारा प्रशंसित और राजा द्वारा आदृत होती है। जातिका ऐश्वर्य सम्पन्न, वस्त्रा-भूषणों से युक्त तथा लाभ युक्त होती
    है। एकादशभाव में केतु होने से जातिका को सर्वप्रकार से लाभ होता है।
  • केतु एकादशभाव में होने से जातिका पूर्ण भाग्यवान् होती है। अच्छे भोग भोगने वाली, सुन्दर घर-बार वाली, उपभोग से समृद्ध, श्रंगार-शास्त्र में निपुण होती है। धनुर्धरों में सम्मानित तथा कीर्तिमान् होती है।
  • लाभभावगत केतु होने से धन का संचय, सब अर्थों की सिद्धि, द्रव्य तथा उपकरणों की प्राप्ति होती है। जातिका हाथ में लिए हुए काम को अधूरा नहीं छोड़ती और अच्छे काम करने वाली होती है। बुध का योग होने से व्यापार में
    अच्छा यश मिलता है।
  • जातिका का धन अच्छे कामों में खर्च होता है। इस केतु के प्रभाव से जातिका कवि, लेखक, राजमान्य, पशुधन समृद्ध, सर्व मनोरथ सिद्धि प्राप्त करने वाली होती है। जातिका के भय से शत्रु पीडि़त रहते हैं। लाभ भी शीघ्र होता है। जातिका आलस्यहीन होती है।

ग्यारहवें भाव में केतु का अशुभ फल (Negative Results of Ketu in 11th House in Astrology)

  • ग्यारहवें भाव में केतु (Ketu in 11th House) होने से जातिका बुद्धिहीन, निज की हानि कर्ता होती है। मन में सदा चिंता रहती है।

    जातिका की सन्तान अभागी होती है और भय से पीडि़त होती है। सन्तान वर्ग अत्यन्त विकल होता है। पुत्र भाग्यहीन होते हैं। निन्दित सन्तान वाली होती है।
  • केतु एकादशभाव में होने से धन और पुत्र की विशेष चिन्ता रहती है।

  • ग्यारहवें भाव के केतु से जातिका पेट की बीमारियों से पीडि़त रहती है। गुदा में पीड़ा रहती है अर्थात् बवासीर-भगंदर आदि गुदा के रोग होते हैं।