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पहले भाव में केतु का फल | स्वास्थ्य, करियर और धन | Ketu in First House in Hindi

पहले भाव में केतु का फल

पहले भाव में केतु का फल | स्वास्थ्य, करियर और धन | Ketu in First House in Hindi
वैसे तो क्रूर ग्रह केतु हमेशा अशुभ परिणाम देता है, लेकिन ऐसा नहीं है। केतु ग्रह भी व्यक्ति को शुभ परिणाम देता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार केतु को अध्यात्म, टुकड़ी, मोक्ष, तांत्रिक आदि का कारक माना गया है। कई ज्योतिषियों का मानना है कि उनके पास कोई चिन्ह नहीं है, लेकिन केतु धनु राशि में ऊंचा होता है, जबकि मिथुन राशि में यह दुर्बल होता है।
केतु के धनु राशि होने के कारण यह इस राशि के लोगों को शुभ परिणाम देता है। वैदिक ज्योतिष में केतु को

मंगल के बराबर माना गया है, इसलिए यह मंगल (मेष और वृश्चिक) की निशानी होने पर भी बुरे परिणाम नहीं देता है। यदि हम जन्म कुंडली में घरों में केतु के परिणामों की बात करें तो केतु दूसरे और आठवें घर का प्रमाणक है। इसलिए यह कुंडली के इन घरों में होने पर ही शुभ परिणाम देता है। अन्य घरों में केतु अशुभ परिणाम देता है। इसलिए केतु का पहला घर या लग्न में फल का असर वहां स्थित राशि पर पड़ता है। पहले भाव में केतु  के प्रभाव के कारण व्यक्ति को अकेला रहना पसंद है, लेकिन यदि लग्न घर में वृश्चिक राशि है तो व्यक्ति को इसके सकारात्मक परिणाम देखने होंगे।यदि
केतु बृहस्पति ग्रह के साथ संयोग बनाता है तो व्यक्ति की कुंडली में इसके प्रभाव से राजयोग बनता है।यदि व्यक्ति की कुंडली में केतु मजबूत हो तो इससे व्यक्ति के पैर मजबूत हो जाते हैं। ऐसे जातक को पैरों से संबंधित कोई बीमारी नहीं होती है। शुभ मंगल के साथ केतु का संयोग जातक को साहस प्रदान करता है।

पहले भाव में केतु के शुभ फल (Positive Results of Ketu in 1st House in Astrology)

  • पहले भाव में केतु  से जातक परिश्रमी, धनी, सुखी होता है।
  • केतु के पहले भाव में होने की वजह से भाई-बन्धु का सुख मिलता है।
  • मकर या कुंभ में, लग्न में, केतु होने से स्थिर संपत्ति तथा पुत्रसुख मिलता है।

पहले भाव में केतु के अशुभ फल (Negative Results of Ketu in 1st House in Astrology)

  • आचार्यों ने प्राय: लग्नभाव में केतु के अशुभफल ही बतलाए हैं।
  • लग्न में केतु होने से जातक चंचल, भीरु और पलानयवादी होता है। जातक भय से व्याकुल, व्यग्र, चिन्तातुर और उद्विग्न होता है। केतु चित्त में घबराहट भी करता है।
  • सर्वदा चिप्त में भ्रम और मानसिक चिन्ता की अधिकता रहती है।।
  • भाई-बन्धु जातक को कष्ट देते हैं और जातक सहन करता रहता है। केतु लग्न में होने से जातक को अपने बंधुजनों से निरंतर महान् क्लेश होता है।
  • लग्न में केतु होने से बांधवों को कष्ट होता है। केतु लग्न में होने से स्त्री को कष्ट, स्त्री-पुत्र आदि की चिन्ता से युक्त रहता है।
  • लग्न में केतु होने से जातक की पत्नी की मृत्यु हो सकती है। दुर्जनों से सदा भय होता है। बुरी संगति से युक्त होता है। मामा को कष्ट होता है।
  • प्रथम भाव में केतु होने से जातक शरीर में अनेक प्रकार से वातरोग की पीड़ा होती है।
  • पेट में दर्द आदि पीड़ा अधिक होती है। शरीर में विकलता और पेट में दर्द आदि पीड़ा अधिक होती है। बाहु का रोग होता है। केतु लग्न में केतु होने से जातक के शरीर का अवयव टूटता है। रोग बढ़ता है और अपघात होता है।