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Lord Krishna भगवान श्री कृष्ण

भगवान श्री कृष्ण (Lord Krishn) भगवान के 8 वें अवतार हैं। हिन्दू धर्म मे कृष्ण भगवान की अपरम्पार महिमा हैं। श्री कृष्ण श्री वसुदेव एवम माता देवकी की आठवीं सन्तान थे। श्री कृष्ण नाम का अर्थ अत्यंत व सर्व आकर्षक होना हैं। श्री कृष्ण भगवान के भक्त उनकी अनेक आकर्षक रूपों में उनकी पूजा कर खुद को कृतार्थ अनुभव करते हैं। श्री कृष्ण भगवान की कथा अनन्त हैं। सम्पूर्ण विश्व में श्रीकृष्ण भगवान की पूजा अर्चना की जाती है। श्री कृष्ण भगवान की पूजा अर्चना हेतु इस्कॉन मंदिर भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में भी स्थित है।

भगवान श्री कृष्ण

श्री कृष्ण धन, शक्ति, प्रसिद्धि, ज्ञान, सौंदर्य और वैराग्य प्रदान करने वाले आराध्य हैं। श्री कृष्ण की कृपा प्राप्त करने हेतु उनके भक्त सबसे पहले उनके स्वरूप को समझते है तथा भक्ति मार्ग से उनकी प्राप्ति करते हैं। उनकी स्तुति करने हेतु अनेकानेक भजन व प्रार्थना की जाती हैं।

भगवान श्री कृष्ण का जन्म

भगवान श्री कृष्ण का जन्म भादो मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उनका जन्म हुआ था। भगवान श्री कृष्ण का जन्मस्थान मथुरा नगरी में माना जाता हैं। मथुरा एक प्राचीन नगरी है जिसका उल्लेख रामायण में भी किया गया हैं। भगवान श्री कृष्ण का मामा कंस मथुरा का राजा था। कंस ने एक आकाशवाणी सुनी थी कि कंस की बहन देवकी की आठवीं सन्तान द्वारा कंस का वध किया जाएगा। इससे बचने के लिए कंस ने देवकी और वसुदेव को मथुरा के कारागार में डाल दिया था।

श्री कृष्ण ने विष्णु के 8वें अवतार के रूप में आठवें मनु वैवस्वत के मन्वंतर के 28वें द्वापर में भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की आधी रात्रि के समय सबसे शुभ लग्न में उन्होंने जन्म लिया। उस लग्न पर केवल शुभ ग्रहों की दृष्टि थी। तब रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग में लगभग 3112 ईसा पूर्व को उनका जन्म हुआ था।

वासुदेव ने श्री कृष्ण के जन्म पश्चात उनकी रक्षा करने के लिए श्री कृष्ण को जेल से भगाकर आधी रात को यमुना नदी को पार करके गोकुल में यशोदा के पास पहुँचा दिया था। श्री वासुदेव द्वारा श्री कृष्ण को बचाने के लिए यमुना पार करने की कथा बहुत रोमांचक हैं।

वासुदेव द्वारा उफनती यमुना नदी को पार कर के बालकृष्ण की रक्षा करना।

जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तब भारी बारिश हो रही थी और यमुना नदी में उफान था। जब श्री कृष्ण का जन्म हुआ तो जेल के सभी संतरी माया द्वारा गहरी नींद में सो गए। उस बारिश में ही वसुदेव ने नन्हे कृष्ण को एक बड़े टोकरे में रखा और उसको लेकर वे जेल से बाहर निकल आए। कुछ दूरी पर ही यमुना नदी थी। उन्हें उस पार जाना था लेकिन कैसे? तभी चमत्कार हुआ। यमुना के जल ने भगवान के चरण छुए और फिर उसका जल दो हिस्सों में बंट गया और इस पार से उस पार रास्ता बन गया। वसुदेव कृष्ण को यमुना के उस पार गोकुल में अपने मित्र नंदराय के यहां ले गए। नन्दराय के पास बड़ी मात्रा में पशुधन था। नन्दराय व उनकी पत्नी माता यशोदा ने श्री कृष्ण का पालन-पोषण किया था।

श्री कृष्ण के 108 नाम।

श्री कृष्ण युगपुरुष थे एवम हर हिन्दू के आराध्य देव हैं। श्री कृष्ण के भक्त उनको अनेकों नाम से पुकारते है एवम उनके अलग अलग स्वरूप में उनकी वंदना करते हैं। श्री कृष्ण भगवान के 108 नाम अग्रनुसार हैं-

अचला, अच्युत, अद्भुतह, आदिदेव, अदित्या, अजन्मा, अजया, अक्षरा, अमृत, अनादिह, आनंद सागर, अनंता, अनंतजीत, अनया, अनिरुद्धा, अपराजित, अव्यक्ता, बाल गोपाल, बलि, चतुर्भुज, दानवेंद्रो, दयालु, दयानिधि, देवाधिदेव, देवकीनंदन, देवेश, धर्माध्यिक्ष, द्वारकाधीश, गोपाल, गोपालप्रिया, गोविंदा, ज्ञानेश्वर, हरि, हिरण्यगर्भा, ऋषिकेश, जगद्गुरु, जगदीशा, जगन्नाथ, जनार्धना, जयंतह, ज्योतिरादित्या, कमलनाथ, कमलनयन, कामसांतक, कंजलोचन, केशव, कृष्ण, लक्ष्मीकांत, लोकाध्यक्ष, मदन, माधव, मधुसूदन, महेन्द्र, मनमोहन, मनोहर, मयूर, मोहन, मुरली, मुरलीधर, मुरली मनोहर नंदगोपाल, नारायन, निरंजन, निर्गुण, पद्महस्ता, पद्मनाभ, परब्रह्मन, परमात्मा, परम पुरुष, पार्थसारथी, प्रजापति, पुण्य, पुरुषोत्तम, रविलोचन, सहस्राकाश, सहस्रजीत, सहस्रपात, साक्षी, सनातन, सर्वजन, सर्वपालक, सर्वेश्वर, सत्य वचन, सत्यव्त, शंतह, श्रेष्ठ, श्रीकांत, श्याम, श्यामसुंदर, सुदर्शन, सुमेध, सुरेशम, स्वर्गपति, त्रिविक्रमा, उपेन्द्र, वैकुंठनाथ, वर्धमान, वासुदेव, विष्णु, विश्वदक्सिन, विश्वकर्मा, विश्वमूर्ति, विश्वरूपा, विश्वात्मा, वृषपर्व, यदवेंद्रा, योगि और योगिनाम्पति।

भगवान श्री कृष्ण के 108 नाम

भगवान श्री कृष्ण के भक्त भगवान को अलग अलग नाम से सम्बोधित करते हैं। क्षेत्रवार भी प्रभु श्री कृष्ण के

भक्त उन्हें अलग अलग नाम से सम्बोधित करते है। ब्रज में भगवान श्रीकृष्ण को लोग कान्हा, गोपाल, गिरधर, माधव, केशव, मधुसूदन, गिरधारी, रणछोड़, बंशीधर, नंदलाल, मुरलीधर आदि नामों से सम्बोधित करते हैं। जनसाधारण उन्हें सम्पूर्ण विश्व मे श्याम, केशव, कन्हैया, वासुदेव, द्वारकाधीश आदि नामों से सम्बोधित करते हैं।
लड्डूगोपाल स्वरुप।

भगवान श्री कृष्ण को मोहन कहकर भी सम्बोधित किया जाता है जिसका मतलब होता है मोहने वाला। श्री कृष्ण भगवान को लड्डू गोपाल भी कहते हैं।

श्री कृष्ण भगवान का रूप

श्री कृष्ण भगवान को बाल रूप एवम सांवले रंग के युवा के रूप में चित्रित किया जाता हैं। अपने मनोहर रूप में वो अपने भक्तों से घिरे होते हैं। श्री कृष्ण भगवान के केशों को घुंघराले रूप में चित्रित किया जाते हैं। कुछ चित्रों में उनके नीले-काले बालों में फूलों की माला चित्रित की जाती हैं। उनके चित्र मोर के पंखों से सजाए जाते हैं। उनके चित्रों में वृंदावन के मनोहर दृश्यों में उनके साथ गोप खेलते हुए दिखाई देते हैं।

भगवान श्री कृष्ण को मोहन कहकर भी सम्बोधित किया जाता है जिसका मतलब होता है मोहने वाला। श्री कृष्ण भगवान अपने सुंदर स्वरूप से सबका मन मोह लेते हैं। भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप को लड्डू गोपाल कह कर सम्बोधित किया जाता है। इनके भक्त इनके लड्डू गोपाल स्वरूप का भी रोज पूजन करते है एवम उनके स्वरूप को नाना रूप से सजाया भी जाता हैं।

श्री कृष्ण भगवान का मुरली वादन (बांसुरी वादन) मन को मोहने वाला था। इसी कारण उनके रूप के साथ मुरली भी दिखाई देती हैं। श्री कृष्ण का रूप अत्यंत मनोहारी व मन को मोहने वाला हैं।

भगवान श्री कृष्ण एवम भगवत गीता

भगवत गीता देववाणी है एवम दुनिया का सर्वश्रेष्ठ ज्ञान स्त्रोत हैं। महाभारत के युद्ध मे जब अर्जुन दुविधा में थे तब भगवान श्री कृष्ण ने उनको राह बतलाने के लिए भगवत गीता में वर्णित शिक्षा प्रदान की थी। भगवत गीता ज्ञान का वह भंडार है जिस पर नित नई शोध होती हैं। यह ज्ञान का अकूत भंडार है। भगवत गीता पर अनेक संत व साधु प्रवचन प्रदान करते हैं। इस ज्ञान की सलिला से मानव जीवन का उद्देश्य व

जीवन जीने के सिद्धांत सिख कर अनगिनत लोग अपने जीवन को सार्थकता प्रदान करते हैं।

भगवान श्री कृष्ण के पुनीत कार्य।

भगवान श्री कृष्ण ने समाज हित मे अनेक पुनीत कार्य किये थे। उन्होंने कई असुरों का वध किया था। उन्होंने अपने जन्म के छठे दिन से ही असुरों का संहार करना आरंभ कर दिया था। बाल रूप में श्री कृष्ण नेराक्षसी पूतना का वध किया था तथा कंस के द्वारा गोकुल भेजे गए तृणावर्त, वत्सासुर, बकासुर, धेनुकासुर, अरिष्टासुर राक्षसों और असुरों का वध किया था। जिस कालिया नाग से जनता बड़ी त्रस्त थी उस कालिया नाग का को भी श्री कृष्ण ने यमुना नदी से भगा दिया था।

जब कंस अनेक प्रयास के बाद भी श्री कृष्ण का वध नही कर सका तो उसने श्री कृष्ण को अपने राज दरबार मे बुलवाया था तब श्री कृष्ण ने कंस के योद्धाओं मुष्टिक और चाणूर को द्वंद्व युद्ध में परास्त किया था। श्री कृष्ण ने कूट-शल और तोशल को खेल-खेल में ही मार डाला था।

श्री कृष्ण व पांडव

श्री कृष्ण पांडवों के निकट सम्बन्धी थी। पांडवों की माता कुंती भगवान श्री कृष्ण की भुआ थी। इसी नाते श्री कृष्ण का सम्बंध पांडवों व कौरवों से सम्बंधित थे। महाभारत के युद्ध मे श्री कृष्ण से कौरव व पांडव दोनों ही सहायता मांगने गए थे। एक श्रुति के अनुसार जब अर्जुन एवम दुर्योधन भगवान श्री कृष्ण से युद्ध हेतु सहायता प्राप्त करने गए थे तो दुर्योधन ने उनकी विशाल सेना मांग ली थी जबकि अर्जुन ने स्वयम श्री कृष्ण की पांडवों के साथ उपस्थित रहने की मांग की थी। श्री कृष्ण ने इस युद्ध मे किसी के पक्ष में युद्ध नही करने का निर्णय लिया था अतः वे महाभारत के युद्ध मे एक योद्धा के रूप में नही बल्कि अर्जुन के सारथी के रूप में उपस्थित रहे थे।

श्री कृष्ण एवम मथुरा।

भगवान श्री कृष्ण की जन्म भूमि के तोर पर मथुरा विश्व प्रसिद्ध है। मथुरा की गलियों में ही भगवान श्री कृष्ण पले-बढ़े थे। मथुरा सप्त पुरियों में एक हैं। मथुरा का हिंदू धर्म में बड़ा धार्मिक महत्व हैं। कृष्ण भक्त मथुरा जाकर कृष्ण जन्मभूमि के दर्शन करने हेतु व्याकुल रहते हैं। मथुरा प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का केंद्र रहा है।

मथुरा नगरी

रामायण में मथुरा को मधुपुर तथा मधुदानव नामक नगर कहा गया है और नगर को लवणासुर की राजधानी बताया गया है। मधुदैत्य द्वारा स्थापित यह नगरी भारत के प्रमुख ऐतिहासिक केंद्रों में से एक हैं। पौराणिक साहित्य में मथुरा को शूरसेन नगरी, मधुपुरी, मधुनगरी, मधु आदि अनेक नामों से संबोधित किया गया है।

हिंदू धर्म के प्रमुख व प्राचीन ग्रन्थ मथुरा का उल्लेख मथुरा की प्राचीनता को इंगित करता हैं। इसी नगरी से महाकवि सूरदास, संगीत के आचार्य स्वामी हरिदास, स्वामी दयानंद के गुरु स्वामी विरजानंद, कवि रसखान जैसे महान नाम जुड़े हुए हैं। मथुरा के प्रमुख दर्शनीय स्थानों में कृष्ण जन्म भूमि मंदिर, द्वारिकाधी मंदिर, विश्राम घाट, केशवदेव मंदिर, निधिवन और बिड़ला मंदिर शामिल हैं। इसके अलावा श्री कृष्ण के जीवन से जुड़े अन्य स्थानों में गोकुल, बरसाना और गोवर्धन हैं।

श्री कृष्ण और रुक्मिणी का विवाह

रुक्मिणी राजा भीष्मक की पुत्री थी एवम उन्होंने श्री कृष्ण की कीर्ति सुनकर अपने ह्र्दयस्थल मे श्री कृष्ण को स्थापित कर दिया था। राजा भीष्मक मध्यप्रदेश के धार जिले में अमझेरा नामक स्थान के राजा थे। उन्होंने रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से निर्धारित कर दिया था।

रुक्मिणी ने इस निर्धारित विवाह की सूचना एक व्रद्ध ब्राह्मण के द्वारा श्री कृष्ण को प्रेषित कर दी थी। तब श्री कृष्ण ने रुक्मिणी का हरण करके द्वारिका में उससे विवाह किया था। रुक्मिणी हरण की सूचना मिलने पर शिशुपाल ने श्री कृष्ण का पीछा किया था। श्री कृष्ण ने युद्ध मे शिशुपाल को पराजित करके रुक्मिणी से धूमधाम से विवाह किया था।

श्री कृष्ण एवं सुदामा की मित्रता

श्री कृष्ण भगवान एवम उनके सखा सुदामा की मित्रता सदियों से प्रसिद्ध हैं। श्री कृष्ण व सुदामा की मित्रता संदीपनी ऋषि के आश्रम में शिक्षा के दौरान हुई थी। सुदामा श्री कृष्ण के परम मित्र तथा भक्त थे। वे समस्त वेद-पुराणों के ज्ञाता और विद्वान् ब्राह्मण थे। उनका निवास अस्मावतीपुर था जो कि वर्तमान में पोरबंदर कहलाता हैं।

अस्मावतीपुर में सुदामा अत्यंत निर्धन अवस्था मे जीवनयापन कर रहे थे। एक बार अपनी पत्नी के कहने पर सुदामा द्वारिकाधीश श्री कृष्ण से मिलने व सहायता लेने द्वारिका गए थे। अपने मित्र भगवान श्री कृष्ण से मिलने हेतु वे अपने साथ मे भेंट स्वरूप एक पोटली चावल भी ले गए थे। सुदामा ने संकोचवश श्री कृष्ण से किसी प्रकार की सहायता नहीं मांगी थी लेकिन अंतर्यामी श्री कृष्ण सब जानते थे। जब सुदामा वापस अपने निवास खाली हाथ पहुंचे तो दृश्य देखकर विस्मित हो गए क्योंकि उनकी झोपड़ी की जगह एक विशाल महल बना हुआ था। सुदामा का परिवार धनधान्य से भरपूर हो चुका था। इस के बाद अस्मावतीपुर को सुदामापुरी के नाम से सम्बोधित किया जाने लगा।