| On 1 year ago

Maharana Pratap: Complete Introduction

महाराणा प्रताप : सम्पूर्ण परिचय

महाराणा का जन्म व राज्याभिषेक

वीर शिरोमणि, स्वतंत्रता के पुजारी, कुल गौरव के रक्षक, आत्मभिमानी अवतार, प्रातः स्मरणीय और हिंदुआ सूरज महाराणा प्रताप का जन्म वि. सं. १५९७ ज्येष्ठ सुदी ३, रविवार तथा ईस्वी कॅलण्डर के अनुसार ९ मई , सन १५४० को सूर्योदय से ४७ घडी १३ पल पश्चात हुवा था! ३२ वर्ष की आयु में इन्होने मेवाड़ की गद्दी पर स्थान ग्रहण किया था!

महाराणा प्रताप के राज्याभिषेक पर विवाद-

इनके पिताश्री उदय सिंह का अपनी समस्त रानियों में से भटियाणी रानी पर सर्वाधिक प्रेम था! इसी कारण उन्होंने भटियानी रानी के पुत्र जगमाल सिंह को प्रताप सिंह पर वरीयता प्रदान कर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था! प्रताप सिंह ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण स्वाभाविक उत्तराधिकारी थे! महाराणा उदय सिंह के निधन के पश्चात मेवाड़ के समस्त सरदारो ने एकत्र होकर प्रताप सिंह को राज्य गद्दी पर आसीन करवाया था! इनका राज्याभिषेक कुम्भलगढ़ के राज सिहासन पर किया गया था! इस कारण राजकुमार जगमाल सिंह नाराज होकर बादशाह अकबर के पास चले गए थे और बादशाह ने उनको जहाजपुर का इलाका जागीर में प्रदान कर अपने पक्ष में कर लिया था! इसके पश्चात बादशाह ने जगमाल सिंह को सिरोही राज्य का आधा राज्य प्रदान कर दिया था, इस कारण जगमाल सिंह के सिरोही के राजा सुरतान देवड़ा से दुश्मनी उत्पन्न हो गयी और अंत में ई. सं. १५८३ में हुए युद्ध में जगमाल सिंह काम आ गए थे!

अकबर का वर्चस्व-

जिस समय महाराणा प्रताप सिंह ने मेवाड़ की गद्दी संभाली, उस समय राजपुताना बेहद नाजुक दौर में था! बादशाह अकबर के जलाल के आगे राजपूताने के कई नरेशों ने अपने सर झुका लिए थे! कई वीर प्रतापी राज्यवंशो के उत्तराधिकारियों ने अपनी कुल मर्यादा का सम्मान भुलाकर मुगलिया वंश से वैवाहिक संबंध स्थापित कर लिए थे! कुछ स्वाभिमानी राजघरानो के साथ ही महाराणा प्रताप सिंह अपने पूर्वजो की मर्यादा की रक्षा हेतु अटल थे और इसलिए बादशाह अकबर की आँखों में सदेव खटका करते थे!

मान सिंह अकबर के दूत के रूप में असफल-

महाराणा प्रताप गद्दीनशीं होते ही चितोड़ के उद्धार और मुग़ल

साम्राज्य से राजपूताने को सुरक्षित रखने की गंभीर चिंतन में रत हो गए! अपनी विशाल मुग़लिया सेना, बेमिसाल बारूदखाने, युद्ध की नवीन पद्धतियों के जानकारों से युक्त सलाहकारों, गुप्तचरों की लम्बी फेरहिस्त के उपरांत भी बादशाह अकबर ने महाराणा प्रताप से सीधे युद्ध के स्थान पर कूटनीति के उपयोग को वरीयता प्रदान की! समस्त प्रयासों के उपरांत भी प्रताप को झुकाने में असफल होने के पश्चात बादशाह ने आमेर के महाराजा भगवान दास के भतीजे कुंवर मान सिंह (पुत्र भगवंत दास) को विशाल सेना के साथ डूंगरपुर और उदयपुर के शासको को अधीनता स्वीकार करने हेतु विवश करने के लक्ष्य के साथ भेजा! कुंवर मान सिंह की सेना के समक्ष डूंगरपुर राज्य अधिक प्रतिरोध नहीं कर सका! वि. सम्बत १६३० में कुंवर मान सिंह ने महाराणा प्रताप को समझाने हेतु उदयपुर पहुंचे, यहाँ प्रताप सिंह ने उनका यथोचित सम्मान किया परन्तु दृढ़ता पूर्वक अपनी स्वाधीनता बनाये रखने की घोषणा की! कुंवर मान सिंह द्वारा रखे गए प्रस्ताव को प्रताप सिंह ने प्रथम दृष्टि में अस्वीकृत कर दिया और आवश्यक होने पर किसी भी युद्ध में सामना करने की घोषणा कर दी! मान सिंह के उदयपुर से खाली हाथ आ जाने को बादशाह ने करारी हार के रूप में लिया तथा वि. संवत १६३२ में अपनी विशाल मुगलिया सेना को मान सिंह के नेतृत्व में मेवाड़ फ़तेह हेतु कुच के आदेश दिए!

विश्वप्रसिद्ध हल्दी घाटी युद्ध की तैयारियां-

मान सिंह ने मांडलगढ़ में रुक कर सैनिक तैयारियां आरभ कर दी तथा विशाल मुगलिया सेना ने हल्दी घाटी से कुछ ही दूर स्थित बनास नदी के समीप डेरा स्थापित कर लिया! महाराणा प्रताप ने अपने सैन्य बल के साथ मान सिंह से तीन कोस की दुरी पर मोर्चा स्थापित कर लिया! महाराणा की उपस्तिथी से अनजान मान सिंह जब मात्र कुछ सेनिको के साथ ही प्रताप सिंह के डेरे के समीप से गुजरने के समाचार गुप्तचरों से प्रताप सिंह को प्राप्त हुए तो कुछ सेनिको ने मान सिंह को घेर कर मार डालने की योजना प्रताप सिंह के समक्ष प्रस्तुत की! परन्तु प्रताप सिंह ने इस प्रकार शत्रु को मार डालना क्षत्रियोचित नहीं होने के कारण योजना को अस्वीकृत कर दिया!

विश्व का सर्वाधिक महत्वपूर्ण युद्ध - हल्दीघाटी

आख़िरकार, ३० मई ई. सं. १५७६, बुधवार के दिवस प्रातःकाल में हल्दी घाटी के मैदान में विशाल मुगलिया सेना और रणबांकुरी मेवाड़ी सेना के मध्य भयंकर युद्ध छिड़ गया! स्वाधीनता के इस अमर युद्ध के आरम्भ में ही मुगलिया सेना के पैर मेवाड़ी वीरो के आक्रमण के आगे उखड़ने लगे! विशाल बादशाही फोज़ ने आरंभिक आक्रमण को संभाला और पुनः युद्ध क्षेत्र को नियंत्रण में लेने का प्रयास करने लगे! प्रथम हमले में ही दोनों पक्षों के ५०० से अधिक सैनिक काम आ गए! महाराणा प्रताप सिंह अपने प्रिय घोड़े “चेतक” के घायल हो जाने के कारण जब गोगुन्दा की तरफ मुड़े तो मुग़ल और बादशाही फोज़ के राजपूत सेनिको ने उनको घेरकर मार डालने का प्रयास किया! महाराणा प्रताप के छोटे भाई शक्ति सिंह, जो की आतंरिक कारणों से बादशाह अकबर की शरण ले चुके थे, जो बादशाही सेना के तरफ से प्रताप सिंह के विरुद्ध लड़ रहे थे! शक्ति सिंह ने जब अपने भाई प्रताप सिंह को संकट से घीरे देखा तो उनके हृदय में भातृ प्रेम की हिलोरें उठने लगी और उन्होंने अपने घायल भाई के पक्ष में टोली से युद्ध किया तथा अपना घोडा प्रताप सिंह के हस्तगत कर मुगलिया खेमे में लोट गए!

प्रताप ने जारी रखा गोरिल्ला युद्ध-

विशाल बादशाही सेना गोगुन्दा पहुंची और महाराणा प्रताप और उनके वीर राजपूत तथा भील सेनिको ने अलग अलग टोलियों में विभक्त होकर लोहा लेने लगे! पहाड़ी इलाके में युद्ध संचालित होने के कारण बादशाही सेना को रसद और अन्य सैन्य सामग्रियों की कमी का एहसास होने लगा! मेवाड़ी सेना ने छापामार प्रणाली के तहत युद्ध जारी रखते हुई मुगलिया सेना की आपूर्ति को ठप्प कर दिया! शाही सेना ने चार माह तक गोगुन्दा और आस पास के क्षेत्रो में अनेको प्रयास किये परंतु सफलता उनसे कोसो दूर रही! निराश विशाल मुगलिया सेना ने पुनः अजमेर की तरफ प्रस्थान किया और महाराणा ने वीर सेनिको ने पुनः शाही सेना द्वारा स्थापित थानो को हटाकर अपने थाने स्थापित कर लिए! दोनों पक्षों द्वारा अपनी जीत के दावे किये गए, परन्तु प्रमाण यह

है कि एक अत्यंत विशाल और संपन्न सेना को अगर सम्पूर्ण बल प्रयोग के पश्चात भी खाली हाथ लोटना पड़े तो परिणाम का निर्णय सुधि पाठक स्वयं कर सकते है!

स्वयम अकबर का आगमन-

इस घोर असफलता से विचलित होकर बादशाह अकबर स्वयं विक्रम संवत १६३३ में शिकार के बहाने इस क्षेत्र मैं अपने सैन्य बल सहित पंहुचा! वीर महाराणा प्रताप सिंह ने तत्कालीन स्थितियों और सिमित संसाधनो को समझकर स्वयं को पहाड़ी क्षेत्रो में स्थापित किया और लघु तथा छापामार युद्ध प्रणाली के माद्यम से शत्रु सेना पर निरंतर आक्रमण कर उसे हतोत्साहित रखने पर बल दिया! बादशाह द्वारा अनेकानेक प्रयासों के उपरांत भी सफलता ने उनका वरण नहीं किया! महाराणा प्रताप ने युद्ध में भी धर्म का परिचय दिया तथा आचार युद्ध सहिता का पालन कर अपना नाम अमर किया! युद्ध में एक बार शाही सेनापति मिर्जा खान के सैन्यबल ने समर्पण किया, उसके साथ में शाही महिलाये भी थी, महाराणा प्रताप ने उन सभी के सम्मान को सुरक्षित रखते हुए आदर पूर्वक मिर्जा खान के पास पंहुचा दिया!

शाहबाज खान ने जीता कुम्भलगढ़-

मुग़ल बादशाह अकबर ने विक्रम सम्बत १६३५ में एक और विशाल सेना शाहबाज खान के नेतृत्व में मेवाड़ भेजी, इस विशाल सेना ने अपने पूर्व अनुभवों और राजपूताने से प्राप्त कुछ स्थानीय मदद के आधार पर वैशाख बदी १२ को कुम्भलगढ़ और केलवाड़ा पर कब्ज़ा कर लिया तथा गोगुन्दा और उदयपुर क्षेत्र में लूट पाट भी की! महाराणा प्रताप ने विशाल सेना का मुकाबला जारी रखते हुए पहाड़ी क्षेत्रो में पनाह प्राप्त कर स्वयं को ना केवल सुरक्षित रखा अपितु चावंड पर कब्ज़ा प्राप्त कर लिया! शाहबाज खान आख़िरकार खाली हाथ पुनः पंजाब में अकबर के पास पहुंच गया! महाराणा प्रताप के समक्ष लगातार युद्ध में रत रहने के कारण कम होते संसाधनो की समस्या आन खड़ी हुई, ऐसे में वीर महादानी मेवाड़ के प्रधान मंत्री भामाशाह ने आगे बढ़कर अपने स्वामी प्रताप सिंह को अपना समस्त धन भेट कर स्वाधीनता के इस हवन में आहुति प्रदान की, भामाशाह ने २० लाख अशर्फियाँ और २५ लाख रुपए महाराणा को भेट प्रदान किये! ये राशि उन्होंने मालवा पर चढ़ाई कर संगृहीत की थी!

सेना पुनर्निर्माण में भामाशाह का योगदान-

इस अनुपम सहायता से प्रोत्साहित होकर महाराणा ने अपने सैन्य बल का पुनर्गठन किया तथा उनकी सेना में नवजीवन का संचार हुवा, प्रताप सिंह ने पुनः कुम्भलगढ़ पर अपना कब्ज़ा स्थापित करते हुए शाही फौजो द्वारा स्थापित थानो और ठिकानो पर अपना आक्रमण जारी रखा! महाराणा के विरुद्ध विक्रम संवत १६३५ के पौष माह में पुनः मुगलिया सेना ने अपने चुनिंदा सेनापतियों के नेतृत्व में एक विशाल सेना का आगमन हुवा, परन्तु महाराणा ने प्राप्त अनुभवों के आधार पर अपनी प्रजा को पहाड़ो पर चढ़ जाने तथा समतल स्थानो पर खेती नहीं करने का फरमान जारी कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप मुग़ल सेना को स्थानीय रसद सामग्री का टोटा होने लगा और बाहर से आने वाली सहायता को महाराणा के वीर सेनिको ने लगातार लूट कर मुगलिया सेना की कमर तोड़ने का सिलसिला कायम रखा! अपनी हर चंद कोशिशो के उपरांत भी मुगलिया फोज़ प्रताप सिंह को ना तो गिरफ्तार कर सकी ना ही उसे शिकस्त दे सकी, इसी बीच मुगलिया फ़ोज़ो को पंजाब और दक्षिण में अपना सैन्य बल नियुक्त करना पड़ा! महाराणा प्रताप सिंह ने अपनी सिमित मेवाड़ी सेना और स्थानीय वीर भीलो और पहाड़ी मीनो की सहायता से ना केवल अपनी कुल मर्यादा की रक्षा की साथ ही स्वाधीनता का परचम लहराते हुए किसी भी विपरीत शर्तो पर सहमत न होकर मुगलिया सल्तनत से सफल मुकाबला किया!

प्रताप द्वारा पुनः अपने स्थानों का विजय करना-

विचलित मुगलिया सेना के घटते प्रभाव और अपनी आत्मशक्ति के बुते महाराणा ने चितोडगढ़ व मांडलगढ़ के अलावा सम्पूर्ण मेवाड़ पर अपना राज्य पुनः स्थापित कर लिया गया! अपनी स्वाधीनता से संतुष्ट इस महावीर की जीवनलीला आखिरकार माघ सुदी ११ विक्रम संवत १६५३ ( ईस्वी सं १५९७,जनवरी १९) को एक अनुपम सन्देश प्रदत करते हुवे चावंड ग्राम में पूर्ण हुई!

आज भी उनकी वीर गाथाये स्वतंत्रता के पुजारियों के हृदयो को आलोकित करती है तथा उनका नाम ना केवल भारत अपितु विश्व में अत्यंत श्रद्धा और आदर के साथ लिया जाता है!

विशेष- उपरोक्त कथा “राजपूताने का इतिहास” श्री जगदीश सिंह गेहलोत से प्रेरित है!

सादर!