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Making Exams Fun: Chat with PM Narendra Modi प्रत्येक विद्यार्थी, शिक्षक व अभिभावक हेतु पठनीय।

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Making Exams Fun: Chat with PM Narendra Modi

‘मेकिंग एग्ज़ाम फन: चैट विद पीएम मोदी"। प्रत्येक विद्यार्थी, शिक्षक व अभिभावक हेतु पठनीय।

प्रधानमंत्री मा. नरेन्द्र मोदी ने तालकटोरा स्टेडियम में स्टूडेंट्स के साथ ‘मेकिंग एग्ज़ाम फन: चैट विद पीएम मोदी" टाइटल के तहत परीक्षा पर चर्चा की। उन्होंने कहा-‘भूल जाइए कि आप किसी प्रधानमंत्री के साथ बात कर रहे हैं। ये पक्का कर लीजिए कि मैं आपका दोस्त हूँ, आपके परिवार का दोस्त हूँ। आपके अभिभावकों का दोस्त हैं। एक प्रकार से आज मेरी परीक्षा है। आज आप लोग मेरी परीक्षा लेने वाले हैं। देशभर के 10 करोड़ से ज्यादा बच्चे और उनके परिवार के लोगों के साथ रूबरू होने का मुझे मौका मिला है। मैं उन शिक्षकों को नमन करना चाहूँगा, जिन्होंने मुझे अभी भी विद्यार्था बनाए रखा है। मुझे सबसे बड़ी शिक्षा मिली कि भीतर के विद्यार्थी को कभी मरने मत देना। अंदर का विद्यार्थी जीवनभर जीता है तो हमें जीने की ताकत देता है।'
श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा-‘जिस समय मैंने स्वच्छ भारत का विषय रखा, उसे देश के पालकों ने थाम लिया। वे घरों में कचरा फैलाने पर टोकते हैं। उससे बच्चे जागृत हो गए। दूसरी मदद मीडिया ने की है। अभियान को ताकत दी है। आज यह अभियान हर एक की जिम्मेदारी बन गई है। आज का कार्यक्रम भी प्रधानमंत्री या मोदी का कार्यक्रम नहीं है। ये देश के करोड़ों बच्चों का कार्यक्रम है। आप सब मेरे एग्जामिनर हैं। देखते हैं कि आप मुझे 10 में से कितने अंक देते हैं।"

स्टूडेंट्स के सवालों पर मोदी के जवाब-

1) आत्मविश्वास को कैसे बनाए रखें ?

सवाल: दिल्ली से 11वीं की समीक्षा ने सवाल किया-परीक्षा खत्म होने तक नर्वस रहते हैं, कैसे दूर करें" एक और स्टूडेंट ने पूछा कि परीक्षा के वक्त हमें कुछ भी याद नहीं आता। हम आत्मविश्वास खो देते हैं। ऐसे समय में आत्मविश्वास कैसे बनाए रखें ?
मोदी जी ने इन सवालों पर कहा‘‘ये सवाल बहुत से बच्चों ने पूछा है। मेहनत में कमी नहीं होती। अगर आत्मविश्वास नहीं है तो कितनी भी मेहनत करें, क्लासरूम में बैठने पर ये तो आता है कि किस किताब के किस पेज पर जवाब है, लेकिन एकाध शब्द याद नहीं आता। मैं बचपन में
स्वामी विवेकानन्द को पढ़ता था। वे कहते थे- अहम् ब्रह्मास्मि। यानी अपने आप को कम मत मानो। उस ज़माने में 33 करोड़ देवी-देवताओं की चर्चा हुआ करती थी। वे कहते थे कि 33 करोड़ देवता तुम पर कृपा बरसा भी देंगे, लेकिन अगर तुममें आत्मविश्वास नहीं होगा तो 33 करोड़ देवी-देवता भी कुछ नहीं कर पाएँगे।’ -‘‘बच्चे आमतौर पर सरस्वती की पूजा करते हैं। एग्जाम देने जाते हैं तो हनुमानजी की पूजा करते हैं। ऐसा क्यों करते हैं? मैं छोटा था तो मज़ाक उड़ाता था। मैं सोचता था कि हनुमानजी को इसलिए नमन करते हैं क्योंकि एग्जाम में चिट पकड़ा जाए तो मास्टरजी को पता होना चाहिए कि ये हनुमानजी का भक्त है। ये स्कूलों में मेरे चुटकुले का हिस्सा था। मन में आत्मविश्वास जरूरी होना चाहिए। यह जड़ी-बूटी नहीं है। मन मे आत्मविश्वास लंबे भाषणों से भी नहीं आता। हम अपने आप को कसौटी पर कसने की आदत डालनी चाहिए। -“हर कदम पर कोशिश करते-करते आत्मविश्वास बढ़ता है। मैं जहाँ हैं, उससे मुझे ज्यादा बढ़ना है। इसके लिए जो करना पड़ेगा, वो मैं कहूंगा। ये भाव होना चाहिए।
अभी-अभी एक खबर मेरे दिल को छू गई। साउथ कोरिया में विंटर ओलंपिक चल रहे हैं। उसमें कनाडा का एक नौजवान मार्क स्नोबोर्ड खेल रहा है। उसने ब्रांज मेडल जीता। 11 महीने पहले उसे भयानक इंजरी हुई थी। 15 से 20 फ्रेक्चर हुए। कोमा में था। लेकिन अब मेडल जीत लिया। उसने अपने फेसबुक पर दो फोटो शेयर की। एक अस्पताल का, दूसरा मेडल का। फोटो पर उसने लिखा है-‘धन्यवाद जिंदगी'।

-स्कूल में जाते समय दिमाग से ये निकाल दीजिए कि कोई
आपका एग्ज़ाम ले रहा है। कोई आपको नम्बर देने वाला है। दिमाग में ये भर लीजिए कि आप ही आपके एग्ज़ामिनर हो। आप ही अपना भविष्य तय करेंगे। मैं अपने हौंसले के साथ चलूँगा, ये भाव तय कीजिए। जीवन में सफलता में क्षमता-संसाधन सब हो, लेकिन आत्मविश्वास होना चाहिए।
हमारे देश में 100 भाषाएँ हैं। 1700 डायलेक्ट हैं। इतनी विविधताएँ हैं। बहुत से बच्चे मुझे ऑनलाइन सुन रहे होंगे। मैं उनकी भाषा में नहीं बोल पा रहा हूं। लेकिन मैं तमिल, मलयालमकन्नड़ जैसी भाषाएँ नहीं बोल पाता। उन सभी से मैं माफी चाहता हूं।”

2. एकाग्रता कैसे बनाए रखें ?

सवाल: नोएडा से 10वीं की कनिष्का वत्स ने पूछा, ‘पढ़ाई से ध्यान भटक जाए तो क्या करें?" आईआईटी.-बीएचयू से प्रणव व्यास ने पूछा-‘जब हम खुद से खुश हो जाएँ तो क्या करना चाहिए?"

मोदी जी ने कहा‘बहुत लोगों को लगता है कि कॉन्सन्ट्रेशन खास तरह की विधा है। ऐसा नहीं है। आपमें हर व्यक्ति दिन में कोई न कोई काम ध्यान से करता है। जैसे गाने के बोल को याद रखना। दोस्त से फोन पर बात करते वक्त अगर आपका प्रिय गाना चल रहा हो तो आप बातचीत में उलझ जाते हैं। यानी कॉन्सन्ट्रेशन है। आप खुद का एनालिसिस कीजिए। वो कौनसी बातें हैं, जिन्हें आप ध्यान से व मन से कर रहे हैं। उसके कारणों पर जाइए। उसे अपनी रेसिपी बना लें और पढ़ाई में अप्लाई करें तो
कॉन्सन्ट्रेशन का दायरा बढ़ता जाएगा। खुद को जाँचना-परखना चाहिए।
‘‘बहुत लोग कहते हैं कि हमें कुछ याद नहीं रहता। लेकिन किसी ने आपको 10 वाक्य बुरे बोल दिए तो आपको 6 साल बाद भी दसों के दसों वाक्य याद रहेंगे। इसका मतलब आपकी मेमोरी पावर में दिक्कत नहीं है। जिसमें आपका दिल लग जाए, वो चीजें जिंदगी का हिस्सा बन जाती हैं।
‘‘योग को लोग फिजिकल एक्सरसाइज मानते हैं। ऐसा होता और ये बॉडी बिल्डिंग का खेल होता तो सारे सर्कस वाले योग करते। लेकिन कॉन्सन्ट्रेशन का मामला है। एक बार मैंने मन की बात’ कही थी। महान खिलाड़ी सचिन तेंदुलकरजी ने एक बच्चे को जवाब दिया था कि जब मैं
खेलता है तो इसमें दिमाग नहीं खपाता कि पहले का बॉल कैसा था, मैं खेल पाया या नहीं। में उस वक्त उसी बॉल को खेलता है जो आने वाली है। बाकी सब भूल जाता है।
‘‘ऐसा नहीं है कि अतीत का महत्व नहीं है। लेकिन अतीत जब बोझ बन जाए तो भविष्य के सपने रौद जाते हैं। वर्तमान में जीने की आदत जरूर है। आंखें किताब पर हैं, एक-एक पन्ना पढ़ रहे हैं। लेकिन दिमाग कहीं और है। आप ऑफलाइन हैं। इसलिए आप किताब से कनेक्ट नहीं होते। आपमें से बहुत लोगों को पानी का टेस्ट पता होगा। कभी पानी का टेस्ट एंजॉय कीजिए। ये कॉन्सन्ट्रेशन है।

3. दूसरों से कॉम्पीटिशन या तुलना के कारण होने वाले तनाव से कैसे बचें?

सवाल : नेहा शर्मा ने पूछा, ‘तुलना के चलते में तनाव में रहती हैं। इससे मेरा आत्मविश्वास कमज़ोर होता है।"" वहीं, 9वीं की स्टूडेंट अरुणा शर्मा श्रीवास्तव ने कहा कि दोस्तों से आगे निकलने की होड़ ज्यादा है। इससे कैसे बचें : एक और स्टूडेंट ने पूछा कि कॉम्पीटिशन बढ़ने से दबाव बढ़ जाता है।
मोदी जी ने कहा"खेल या युद्ध के विज्ञान को समझिए। आप अपने मैदान में खेलिए। अगर आप सामने वाले के मैदान में खेलने के लिए जाते हैं तो बड़ा रिस्क ले लेते हैं। दुश्मन को अपने ही मैदान की तरफ खींचकर लाओ और मारो युद्ध में भी यही समझाया जाता है।"
"दूसरों की सोच, परवरिश, माहौलसपने, रुचि अलग हैं।
लेकिन आप स्वतंत्र व्यक्ति हैं। आपको उसके पूरे ईको-सिस्टम का पता नहीं हैं। ऐसे में आप निराशा में आ जाते हो। पहले तय करो कि आपके भीतर क्या है? आप किसी चीज में मजबूत हो ? खेल जगत के बड़े नामों को देखिए। कोई उनकी डिग्री पूछता है क्या? खुद को न जानना समस्या का कारण होता है।'' ‘जब भी आप कॉम्पीटिशन में उतरते हैं तो आपको तनाव महसूस करना होता है। दूसरा चार घंटे पढ़े तो आप भी ऐसा ही करते हो। आप खुद को देखो, समझो। प्रतिस्पर्धा अपने आप हो जाएगी। लोगों
को आपकी प्रतिस्पर्धा में आने दो। आप किसी की प्रतिस्पर्धा में मत जाओ। लोगों को आपको मॉडल बनकर प्रतिस्पर्धा में उतरने दीजिए।"
‘खुद से स्पर्धा कीजिए। खुद के पैरामीटर बनाइए। डायरी
लिखिएये लिखिए कि कल से मैं दो कदम आगे निकला या नहीं ? इसके बाद आपको किसी की शाबाशी की जरूरत नहीं है। इससे नई ऊर्जा निकलेगी। आप प्रतिस्पर्धा के चक्कर से निकल जाइएखुद से स्पर्धा करें। एक ओलंपियन बुका हैं। उन्होंने अपने ही रिकॉर्ड 36 बार तोड़े। वो औरों को देखता तो वहीं अटक जाता।"

4. पैरेंट्स के दबाव का क्या करें?

सवालः दीपशिखा ने पूछा-‘परीक्षा के दौरान माता-पिता प्रेशर डालते हैं। जब बच्चे 80 से 90 फीसदी नंबर लाते हैं तो उन्हें संतोष नहीं होता। ये सही है या गलत" बीए की स्टूडेंट लीला बानो ने पूछा कि माता-पिता की उम्मीदों को कैसे पूरा करें ? ऐप के जरिए एक सवाल आया
कि सोशल प्रेशर से कैसे उबरें ?
मोदी जी ने मजाकिया अंदाज़ में कहा‘आप लोग चाहते हैं कि आज मैं आपके पैरेंट्स की क्लास लें?'
इसके बाद कहा-‘मेरी सोच थी कि स्टूडेंट्स के सवाल आएँगे। लेकिन ये सवाल ऐसा है कि माँ-बाप भी ऐसा ही सोचते होंगे कि बच्चों को कैसे सुधारें पहली बात ये कि माता-पिता के इरादों पर शक न करें, वे हमारे लिए जिंदगी खपा देते हैं। वे कोई अच्छी चीज़ इसलिए नहीं खरीदते क्योंकि बच्चों की फीस भरनी है। कहीं बाहर नहीं जाते क्योंकि बच्चों के एग्जाम हैं। माता-पिता का सपना होता है, अपने बच्चों को कुछ बनते देखने का । इसलिए उनकी निष्ठा पर शक नहीं करना चाहिए।

"भरोसा करेंगे तो अंडरस्टैंडिंग का दरवाज़ा खुलता है। डर
से पढ़ाई करने का माहौल अच्छा नहीं है। ये परिवार में तबाही ला देता है। कई माता-पिता ऐसे होते हैं, जिन्होंने बचपन में कुछ सपने बोए होते हैं। वे अपने सपने पूरे नहीं करते तो अपने बच्चों में उन सपनों को ट्रांसप्लांट करते हैं। माता-पिता अपने बच्चों की क्षमता-परवरिश देखे बिनाअपने अधूरे कभी-कभी इच्छाओं के भी भूत होते हैं। लेकिन डायलॉग करना चाहिए। माता-पिता जब अच्छे मूड में हों, तब करनी चाहिए। ये बात हिंदुस्तान के बच्चों को सिखानी नहीं पड़ती। भारत का बच्चा जन्मजात पॉलिटिशियन होता है। उसे पता होता है कि पापा नहीं मानेंगे, इसलिए दादी से कहा" "मैं अभिभावकों से कहना चाहूंगा कि पढ़ाई को सोशल स्टेटस बना दिया है। उन्हें लगता है कि दूसरे के बच्चे आगे पहुंच गए, लेकिन हमारे बच्चे नहीं कर पाए। वे तय कर लेते हैं कि हमारे बच्चे बेकार है। पिताजी पत्नी को डाँटते रहते हैं। घर पहुंचकर बच्चे मिल जाएँ तो खेल खत्म।
इसलिए इसे सोशल स्टेटस मत बनाइए दूसरों के बेटे के सामर्थ से अपने बेटे की तुलना मत कीजिएहर बच्चे में परम शक्ति होती है। बच्चे ये नहीं पूछ पाते कि माता-पिता को कितने नंबर आए थे?"

5. फोकस कैसे करें ?

सवाल: अभिनव ने पूछा कि परीक्षा में खेलने का मन करता है, तो क्या करें। वहींसलोनी ने पूछा कि फोन का कम से कम यूज़ कैसे करें।
मोदी जी ने कहा-फोकस करना है तो डी-फोकस करना सीख लीजिए। किसी बर्तन में दूध भरना है तो एक सीमा तक भरेगा। अंदर से कुछ खाली करना सीखें। फोकस करते रहने से चेहरे पर भी तनाव आएगा। मेरे कुछ साथी मुझे हर बार कहते हैं कि आप टीवी, पर दिखते हो तो हमेशा गंभीर क्यों रहते हैं। जब मैं बिना काम किसी समारोह मंच पर हूँ तो मैं एकदम सोचने लग जाता हूँ। लोग कहते हैं टीवी बंद , मोदी ऐसा ही दिखता है। लेकिन मंच पर आकर में रिलेक्स हो जाता हैं। जैसे ही डी-फोकस होता है, सबकुछ सरल हो जाता है।"
"चौबीसों घंटे परीक्षा, प्रैक्टिकल नहीं सोचना चाहिए। आपका डिसेक्शन कर दें तो यही शब्द निकलेंगे। हमारे शास्त्रों में पंचमहाभूत की चर्चा है। पृथ्वी, आकाश, जल, वायु, अग्नि । आप कितना ही थककर आएँपानी से मुंह धो दीजिए खिड़की खोलकर हवा लीजिए तो फ्रेश महसूस करेंगे। पंचमहाभूतों से संपर्क बनाए रखेंगे तो ऊर्जा महसूस करेंगे।"
"एग्जाम से पहले कफ्यू जैसा माहौल हो जाता है। टीवी, बंद बातचीत बंद। आप जिंदगी की जिन आदतों के साथ पले-बढ़े हैं, आप उनकी मात्रा कम कर सकते हैं लेकिन उससे अलग नहीं हो सकते। खेलने का शौक है, खेलिए। गीत गाने का शौक है, गाइए। सब चीजों को काटकर
अलग मत कीजिए । ऐसा करेंगे तो फोकस की संभावना ही नहीं बचेगी।

6. योग कैसे मदद करता है?

सवाल : दीक्षित ग्रोवर ने पूछा-“परीक्षा के तनावपूर्ण दिनों में योग हमारी किस तरह सहायता करता है, आप खुद योग करते हैं.. तो कुछ आसन बताइए? आप ईक्यू और आईक्यू में संतुलन करना बताएँ।
मोदी जी ने कहा-"आईक्यू और ईक्यू. हमने सुना है। लेकिन, किसी को पूछोगे कि ये क्या है तो कहेंगे कि सुना है। मैं सरल रीति से बताता हैं। एक तो ये बताया जा सकता है कि आईक्यू के खिलने का सबसे बड़ा अवसर होता है, ज्यादा से ज्यादा 5 साल के पहले ही पनपना शुरू हो जाता है। बाद में उसका प्रगतिकरण होता है। कोई माँ बच्चे को झूले में सुलाती है, झूले में चुंघरू बंधा है।

"2-5 महीने का बच्चा होगा, वो देखता है कि माँ ने ऐसा किया तो घुंगरू की आवाज आईवो अपने पैर ऊपर करके घुंघरू से आवाज लाने की कोशिश करता है। इसे आईक्यू कहते हैं। वो रोता नहीं है, उसका पूरा ध्यान घुंघरू रहता है। ये है आईक्यू.।"
अब मान लीजिए माँ को बहुत काम है, सो जाए बच्चा तो अच्छा है। गाना, सीडी झूले के पास लगा देती है ताकि बच्चा सो जाए। लेकिन, बढ़िया गायिका या शब्द हों, बच्चा रोना बंद नहीं करता है। माँ किचन से आती है और खुद अपनी आवाज से गाना गाती है और बच्चा सो जाता है, ये ईक्यू. है। ये इमोशंस हैं, वो कनेक्ट हैं। इसलिए आईक्यू और ईक्यू दोनों का संतुलित विकास जरूरी है। ईक्यू का बहुत बड़ा रोल होता है। ‘ये इन्सिपरेशन का सबसे बड़ा सोर्स होता है और रिस्क लेने की कैपेसिटी बढ़ाता है। अगर हम डोनेशन के लिए जाते हैं, मैं जब जाता है और पता चलता है कि मैंने जिसे ब्लड दिया उसकी जान बच गई। मेरा आईक्यू ईक्यू. में बदल गया।
मेरे एक टीचर का नियम था कि किसी का जन्मदिन हो तो वो बच्चों से आग्रह करते थे कि परिवार के साथ वृद्धाश्रम, अस्पताल या अनाथालय में होकर आओ, तब जन्मदिन मागूंगा। मैंने पूछा तो टीचर ने कहा कि आईक्यू. तो मैं पढ़ा दूंगा , लेकिन उसका ईक्यू बढ़ाने के लिए कुछ चीजें जरूरी हैं इसलिए मैं उन्हें ऐसी जगहों पर जाने के लिए प्रेरित
करता हूं। जन्मदिन पर बच्चा केन्द्रित होता है और तब वो जो करता है, बहुत ताकत से करता है। हमारे लिए जरूरी है कि हम जीवन में ऐसा कुछ समय ऐसे लोगों के बीच बिताएँ। अखबार डालने वाले का नाम नहीं जानते
होंगे, दो दिन नहीं आया तो उससे नहीं पूछा कि बीमार तो नहीं हो गए? ड्राइवर, दूधवाले का नाम पूछा नहीं। आप उससे पूछिए तो आपका सोचने का तरीका बदल जाएगा। इन लोगों से जितना संपर्क में आएंगे, उससे उतना ही ईक्यू शार्प होगा। आईक्यू , सक्सेस देता है, लेकिन सेंस ऑफ
विज़न देने में ईक्यू. अहम है।'
योग आसन के संबंध में भ्रम है कि इस आसन से ऐसा होता है, उस आसन से वैसा होता है। ये विज्ञान है। आपको जो आसन अच्छा लगे और कंफर्ट दे उसे शुरू करें। दुनिया के कई परिवारों में बच्चों की हाइट बढ़ाने के लिए ताड़ासन को रेगुलराइज कर दिया गया है। मन में तो ये रहता है कि ताड़ासन कर रहा हूँ तो मेरी हाइट बढेगी। ये प्रक्रिया है। ये सिखाता है कि शरीर मन और बुद्धि साथ कैसे काम कर रहे हैं, ठीक कर रहे हैं या नही"।
" मैं खड़ा हूँ तो कहेंगे कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हूँ लेकिन, अगर बारीकी से देखोगे तो आप अपने पैरों पर नहीं खड़े हो। बॉडी को देखो तो पता चलेगा कि वेट कमर पर है। फिर देखोगे तो पता चलेगा कि नी और एंकल पर है। बाद में पता चलेगा कि तलवे पर वेट आता है।
(भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की वेबसाइट mhrd.gov.in से साभार)