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माता सीता का भूमिगमन (Mata Sita's Submergence Into Land In Hindi)

14 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद राजा राम और माता सीता अयोध्या में सुख पूर्वक राज्य करते है लेकिन एक दिन एक धोबी और उसकी पत्नी में विवाद हो जाता। धोबी की पत्नी अपनी बहन के घर जाती है लेकिन देरी हो जाने के कारण वह रात भर वही रुक जाती है जिससे धोबी उसे अपनाने से मना कर देता है और कहता है की में कोई राजा राम नहीं हु जो इतने वर्ष रावण के यहाँ रहने पर भी सीता हो सवीकार कर ले। यह बात श्री राम तक पहुँचती है लोक मर्यादा की रक्षा के लिए वे सीता माता को वनवास में भेजने का आदेश  दे देते है। 

हालांकि राम जानते हैं कि सीता निर्दोष हैं, उन्हें अपने

प्रजा  के शब्दों पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया और सीता को फिर से वनवास में भेज दिया। 

इस समय सीता भी गर्भवती होती है और फिर भी, बिना किसी अनुरक्षक के जंगल में घूमने के लिए छोड़ दी जाती है। उसे ऋषि वाल्मीकि ने देखा और बचाया, जो उसे तमसा नदी के तट पर स्थित अपने आश्रम में शरण देते हैं। वहाँ, वह जुड़वां बेटों, लव और कुश को जन्म देती है।

वाल्मीकि के सक्षम मार्गदर्शन में जुड़वा बच्चों को शिक्षित और सैन्य कौशल सिखाया जाता है और वे बड़े होकर बहादुर और बुद्धिमान योद्धा राजकुमार बनते हैं, जो तीरंदाजी कौशल में अद्वितीय होते  हैं। वाल्मीकि उन्हें संगीत और वीणा बजाने की कला में भी प्रशिक्षित करते हैं। दोनों बालक  अतिरिक्त रूप से रामायण सीखते हैं, जिसे स्वयं ऋषि वाल्मीकि ने लिखा था। 

श्री राम सीता के विरह से दुखी होते है  और अश्वमेध यज्ञ करने का फैसला करता है। इस यज्ञ में एक घोडा छोड़ा जाता है। जिसको जो भी पकड़ता है उसको अयोध्या की सेना के साथ युद्ध करना पड़ता है नहीं तो जहां  पर यह घोडा जाता है वह भूमि अयोध्या में शामिल हो जाती थी।    

विचाराधीन घोड़ा वाल्मीकि आश्रम के आवास वाले क्षेत्र में घूमता है। लव और कुश आसानी से घोड़े को  पकड़ लेते  हैं और उसे बांध देते  हैं।  लड़के घोड़े को पकड़ लेते हैं और उसे छोड़ने से मना कर देते हैं। राम अपने तीन भाइयों, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न को दोनों  बच्चों से लड़ने के लिए जाने का आदेश देते हैं, लेकिन युवा लड़के उन्हें भी आसानी से हरा देते हैं।

आखिरकार, राम ने व्यक्तिगत रूप से युद्ध में उनका सामना करने का फैसला किया। राम और लव कुश में भयंकर  युद्ध  होता है  जिससे चारो और हाहाकार मच जाता है लेकिन माता सीता द्वारा बिच में ही उस युद्ध को रुकवा दिया जाता है तब श्री राम को उनके पुत्रो के बारे में पता चलता है। 

जब सीता को पता चलता है कि उनके पुत्र उनके पिता राम के साथ मिल गए हैं, तो सीता अपने जीवन के उद्देश्य  को पूरा मानती हैं। राम उसके पास आते हैं और उससे अपने पास वापस आने का अनुरोध करते हैं। लेकिन सीता अब राम या अयोध्या लौटने को तैयार नहीं हैं और इसके

बजाय, अपनी प्यारी माँ, भूमिदेवी की बाहों में अंतिम शरण लेने का विकल्प चुनती हैं।

सीता भूमिदेवी से उस पर दया करने और उसे इस अन्यायपूर्ण दुनिया और दुख से भरे जीवन से मुक्त करने का अनुरोध करती हैं। पृथ्वी अचानक  से विभाजित हो जाती है और माता सीता उस भूमि में समाधिस्थ हो जाती है।

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