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National education policy 2019 : A vision for the Education System in India

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 : भारत में शिक्षा प्रणाली का विज़न

 

(A vision for the Education System in India)

 

New features in Higher education.

राष्ट्रीय शिक्षा न: राष्ट्रीय  शिक्षा निति 2020  भारत में शिक्षा प्रणाली का विज़न

 

भारत की नई शिक्षा प्रणाली के विज़न को इस प्रकार तैयार किया गया है कि यह देश के प्रत्येक नागरिक के जीवन को स्पर्श करे। एक ओर देश के कई बढ़ते विकासात्मक जरूरतों में योगदान करने में उनकी क्षमता के अनुरूप हो, और दूसरी ओर एक न्याय संगत और निष्पक्ष समाज बनाने की दिशा में भी हो। हमने भारत की परंपराओं और मूल्यों के अनुरूप रहते हुए 21वीं सदी की शिक्षा के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के अनुरूप एक नई प्रणाली बनाने के लिए शिक्षा के स्वरूप, इसके विनियमन और गवर्नेस के सभी पहलुओं में संशोधन का प्रस्ताव दिया है।

1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपनाए गए ऐतिहासिक मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा बताती है कि सभी को शिक्षा का अधिकार है। घोषणा में अनुच्छेद 26 में कहा गया है कि कम से कम प्रारंभिक और मौलिक चरणों में, शिक्षा मुक्त होनी चाहिए और "प्रारंभिक शिक्षा" अनिवार्य होगी। और यह भी कि शिक्षा मानव व्यक्तित्व के पूर्ण विकास और मानवाधिकारों के मौलिक स्वतंत्रता के सम्मान को प्रोत्साहित और मजबूत करने के लिए निर्देशित की जाएगी।

यह विचार की शिक्षा का परिणाम "मानव व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास" के रूप में होना चाहिए जो "लर्निगः द ट्रेज़र विदिन' जैसे प्रभावी रिपोर्टों में दिखता है, जो जैक्स डेलर्स की अध्यक्षता में 21 वीं सदी के लिए अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा आयोग ने 1996 में यूनेस्को को प्रस्तुत किया था। रिपोर्ट में तर्क प्रस्तुत किया गया था कि जीवन भर की शिक्षा चार स्तंभों पर आधारित है:-

1. जानने के लिए सीखना-

ज्ञान का एक मुख्य हिस्सा प्राप्त करना और यह सीखना कि सीखते कैसे हैं, ताकि जिंदगी भर शिक्षा द्वारा मिलने वाले अवसरों का लाभ उठाया जा सके।

2. करने के लिए सीखना-

न केवल एक व्यावसायिक कौशल प्राप्त करना, बल्कि कई परिस्थितियों से निपटने और टीमों में काम करने की क्षमता और कौशल का एक पैकेज जो किसी को व्यावहारिक जीवन की विभिन्न चुनौतियों से निपटने में सक्षम बनाता है।

3. साथ रहने के लिए सीखना-

अन्य लोगों की समझ विकसित करना और अनेकवाद के मूल्यों, आपसी समझ और शांति के प्रति सम्मान की भावना में परस्पर- निर्भरता की क़दर करे।

4. होने के लिए सीखना-

किसी के व्यक्तित्व को विकसित करना और स्वायत्तता, निर्णय और व्यक्तिगत जिम्मेदारी के साथ कार्य करने में सक्षम होना, साथ ही यह भी ध्यान रखना कि शिक्षा किसी व्यक्ति की क्षमता के किसी भी पहलू स्मृति, तर्क, सौन्दर्य बोध, शारीरिक क्षमता और संचार कौशल की उपेक्षा नहीं करता है।

शिक्षा के इस तरह के व्यापक और स्पष्ट नजरिए जिसमें विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास शामिल है, विशेष तौर पर प्रत्येक की रचनात्मक क्षमता के विकास, उसके समृद्धि और जटिलता में, हाल के वर्षों में तेजी से लोकप्रिय हुआ है। यूनेस्को, ओईसीडी, विश्व बैंक, वर्ल्ड इकोनामिक फोरम और ब्रूकिंग संस्थान की हालिया रिपोर्ट में निकले नतीजे और सर्वसम्मति को हाइलाइट किया है। विद्यार्थियों को न केवल संज्ञानात्मक कौशल (जिसमे पढ़ने-लिखने और गणना के मूलभूत कौशल और उच्च स्तरीय संज्ञानात्मक कौशल जैसे आलोचनात्मक चिंतन, समस्या समाधान कौशल दोनों शामिल हैं) शामिल होने चाहिए बल्कि सामाजिक और भावनात्मक कौशल, जिन्हें 'सॉफ्ट स्किल्स' भी कहा जाता है, जिसमे सांस्कृतिक जागरूकता और सहानुभूति, दृढ़ता और धैर्य, टीमवर्क और नेतृत्व का
भी विकास हो। जिस प्रक्रिया से बच्चे और वयस्क इन दक्षताओं को प्रकट करते हैं, उन्हें सामाजिक और भावनात्मक अधिगम (social and emotional learning 'SEL') कहते हैं। संज्ञानात्मक विज्ञान की दुनिया में जो विकास हुआ है, उस आधार पर इस विचार से गहरा लगाव है कि इन सामाजिक और भावनात्मक दक्षताओं को सभी शिक्षार्थियों द्वारा हासिल करना चाहिए और शिक्षार्थियों को अकादमिक, सामाजिक, और भावनात्मक रूप से दक्ष बनना चाहिए। नीति यह मानती है कि शिक्षा को एक व्यापक रुप में समझना जरूरी है, और इस सिद्वांत को शिक्षा की विषय वस्तु और प्रक्रियाओं के बदलाव में सुधारों की रहनुमाई करनी चाहिए।

भारत के विरासत की देन ।

(Drawing from India's Heritage)

भारत के समग्र शिक्षा का एक लंबा और शानदार इतिहास रहा है। प्राचीन भारत में शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं था, जैसे इस दुनिया के जीवन या स्कूल के बाहर के जीवन के लिए तैयारी करना, बल्कि स्वयं का पूर्ण बोध और मुक्ति भी उद्देश्य था। स्वामी विवेकानंद के अनुसार शिक्षा सूचना या जानकारियों की वह मात्रा नहीं है जिसे आपके
मस्तिष्क में डाल कर वहाँ कोलाहल पैदा कि जाती है और जो आपके जीवन भर समझ नहीं आता। हमारे पास जीवन निर्माण, आदमी बनाने, विचारों को आत्मसात करने वाला चरित्र होना चाहिए। यदि आपने पाँच विचारों को आत्मसात किया है और उनको अपना जीवन और किरदार बनाया है तो आपके पास हर उस व्यक्ति के बनिस्बत अधिक शिक्षा है।

जिसने पूरे पुस्तकालय को कंठस्थ कर लिया है। यदि शिक्षा सूचनाओं/जानकारियों के समान होती है तो पुस्तकालय दुनिया के सबसे बड़े ज्ञानी हैं और इनसाइक्लोपीडिया सबसे महान ऋषि हैं।

भारतीय शिक्षा प्रणाली ने चरक और सुश्रुत, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, चाणक्य, पतंजलि और पाणनी जैसे कई विद्वानों को पैदा किया है। उन्होंने विविध क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिए थे जैसे- गणित, खगोल विज्ञान, धातु विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान और सर्जरी, सिविल इंजीनियरिंग और वास्तुकला, जहाज निर्माण और नेविगेशन, योगा, ललित कला, शतरंज
और अन्य। बौद्ध धर्म और दुनिया पर इसके गहन प्रभाव (विशेष तौर पर दक्षिण-पूर्व एशिया
और चीन में), ने संयुक्त राज्य अमेरिका में चीन के पूर्व राजदूत 'हु शिह' को यह कहने के लिए प्रेरित किया कि भारत ने सीमा पार बिना किसी एक सैनिक भेजे चीन पर बीस शताब्दियों पूर्व ही सांस्कृतिक विजय प्राप्त कर ली थी और उस पर अपना प्रभुत्व जमाया हुआ है। भारत में शिक्षा केवल संस्कृतियों के मिश्रण से समृद्व हुई थी । जो आक्रमणों के पहले से शुरू हुआ और अंग्रेजों के आने तक चला। देश ने इन प्रभावों में से कई को अवशोषित किया है और उन्हें अपनी अनूठी संस्कृति में मिला लिया है।

सांस्कृतिक रूप से बेशुमार भाषाओं और बोलियों के साथ साथ, सात शास्त्रियों नृत्यों के रूप और दो शास्त्रियों संगीतों के प्रकार, लोक कला और संगीत की अच्छी विकसित परम्पराए, मिट्टी के पात्र, मूर्तियां और कांसे, उम्दा वास्तुकला, असाधारण व्यंजन, हरेक
प्रकार के शानदार टेक्सटाइल और भी बहुत कुछ, ये सब जीवन के सभी क्षेत्रों में हमारी महान विविधता को प्रदर्शित करता है। विश्व धरोहरों के लिए इन समृद्व विरासतों को न केवल भावी पीढ़ी के लिए पोषित और संरक्षित किया जाना चाहिए बल्कि हमारी शिक्षा
प्रणाली के जरिए बढ़ाना चाहिए और इसे नए उपयोग में भी लाना चाहिए। उदाहरण के लिए, विद्यार्थियों की रचनात्मकता और मौलिकता को विकसित करने और उन्हें नया करने या नई खोज करने के लिए प्रोत्साहित करने में मदद करने के लिए उन्हें 'लिबरल आर्ट
एजुकेशन' में शामिल किया जा सकता है। जैसा कि आइन्सटाइन ने बच्चों के एक समूह से कहा था "इस बात को ध्यान में रखें कि जो अद्भुत और आश्चर्यजनक चीजें आप स्कूल में सीखते हैं वह कई पीढ़ियों का काम है, यह सब आपकी विरासत के तौर पर आपके हाथों में डाला जाता है ताकि आप इसे प्राप्त कर सके, इसका सम्मान कर सकें, इसमे कुछ
जोड़ सकें और एक दिन निष्ठापूर्वक अपने बच्चों को सौंप दें। इसी तरह सामूहिक रूप से कुछ बड़ी चीजों या परम्पराओं का निर्माण कर हम साधारण लोग अमरता प्राप्त करते हैं।

पिछली शिक्षा नीतियों को आगे ले जाना

(Taking Forward the Agenda of Previous Education Policies)

आजादी के बाद के दशकों में, हमने बड़े पैमाने पर सबके लिए शिक्षा की पहूँच बनाने में
व्यस्त रहे हैं, और दुर्भाग्य से शिक्षा की गुणवत्ता पर हमने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। पिछली
दो शिक्षा नीतियों का कार्यान्वयन अभी भी अधूरा है। एनपीई (NPE) 1986 का अधूरा
अजेंडा, जो 1992 में संशोधित हुआ (एनपीई 1986/92) उसे उचित रूप से इस नीति में
शामिल किया गया है। एनईपी 1986/92 के बनने के बाद एक बड़ा विकास सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए संवैधानिक और कानूनी आधार का स्थापित होना है।
संविधान (86वीं संशोधन) अधिनियम 2002, जो भारत के संविधान में अनुच्छेद 21A
सम्मिलित है, 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार के रूप में परिकल्पना करता है। बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 जो अप्रैल 2010 में लागू हुआ, वह प्रारम्भिक शिक्षा पूरी होने तक 6 से 14 वर्ष की आयु के प्रत्येक बच्चे को पड़ोस के स्कूल में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा
का अधिकार प्रदान करता है। हालांकि कुछ पहलुओं में तरक्की के बावजूद शिक्षा प्रणाली में आज एक नीरसता,

उबाऊपन और बोरियत बनी हुई है। जिसमें हमारी प्राचीन परंपराओं के बिल्कुल उलट, विद्यार्थियों को उनकी व्यक्तिगत क्षमता के लिए विकसित नहीं किया जाता है।
एनपीई (NPE) 1986/92 के बनने के बाद कई महत्वपूर्ण विकास हुए हैं, जिसने इस समय
एक नई नीति को बनाना जरूरी कर दिया है। एनपीई 1986/92 इंटरनेट क्रांति से ठीक पहले तैयार किया गया था जो तकनीक की क्षमता को पहचानते हुए पिछले कुछ दशकों के आमूल परिवर्तन का अंदाज़ा नहीं लगा पाया। तब से हम शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए तकनीक को अपनाने के साथ-साथ गवर्नेस और शिक्षा में योजना और
प्रबंधन में इसके उपयोग को लेकर काफी धीमे रहे हैं जो कि काफी घातक रहा है। युवा शिक्षार्थी आज एक ऐसी पीढ़ी से संबंध रखते हैं जो तकनीक-समृद्व वातावरण में जन्मी और पली-बढ़ी है। वे उन तकनीकों का उपयोग करेंगे जिनका अभी तक आविष्कार नहीं हुआ है और उन नौकरियों में जाएँगे जो वर्तमान में मौजूद नहीं है। वैश्वीकरण और एक
नॉलेज इकॉनमी और नॉलेज सोसायटी की माँग इस बात पर जोर देती है कि शिक्षार्थियों द्वारा नए कौशलों के अधिग्रहण की नियमित रूप से आवश्यकता है, और उन्हें यह सीखना कि सीखते कैसे हैं, ताकि वह आजीवन सीखने वाले बने। नए ज्ञान की पीढ़ी और उसके प्रयोग के बीच संकीर्ण समय अंतराल, खासकर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में शिक्षार्थियों के बदलते सामाजिक व व्यक्तिगत आवश्यकताओं और उभरते राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों के लिए उनकी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए स्कूल और उच्च शिक्षा पाठ्यचर्या का समय-समय पर नवीनीकरण करना आवश्यक बना देता है। भारत सौभाग्यशाली है कि 'जनसांख्यिक लाभांश' केवल 20 वर्षों से थोड़ा अधिक ही रहने की आशा है। इसलिए यह ज़रूरी है कि देश में बच्चे और युवा ज्ञान, कौशल, मनोभाव और मूल्यों के साथ साथ रोजगार-योग्य कौशल से लैस हो जो उन्हें भारत के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक बदलाव में योगदान करने में सक्षम बनाएगा।

वैश्विक लक्ष्यों के साथ संरेखण

(Alignment with the global sustainable development goal)

वैश्विक शिक्षा के विकास एजेंडा की दिशा सतत विकास के लिए 2030 के एजेंडा के सतत
विकास लक्ष्य 4 (SDG4) में दिखाई पड़ता है। SDG4, 2030 तक समावेशी और समान
गुणवत्ता वाली शिक्षा सुनिश्चित करने और सभी के लिए आजीवन सीखने के अवसरों को बढ़ावा देने का प्रयास करता है। SDG4 के सात लक्ष्यों में से पाँच गुणवत्ता शिक्षा और सीखने के प्रतिफल पर केंद्रित है। अतः SDG4 एक सर्वव्यापी लक्ष्य है जो प्रत्येक राष्ट्र के लिए लागू होता है कि वह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना, अपने नागरिकों के लिए जीवन की गुणवत्ता को स्थायी रूप से लाने का प्रयास करे। यह एक बड़ी चुनौती है और इसको समझने की शुरुआत शिक्षा के शुरुआती हिस्से में होनी चाहिए। भविष्य कि शिक्षा का दूसरा पहलू शिक्षा से जुड़े अन्य आयामों से निपटना है। ज्ञान अगर सभी क्षेत्रों / आयामों
से जुड़ा होगा तो वह परिवर्तनकारी भी होगा। SDG4 का एक अतिमहत्वपूर्ण पहलू गुणवत्ता शिक्षा को सम्मिलित करना और इसको प्रोत्साहित करना है और शिक्षा के क्षेत्र में अध्ययन के स्नातक कार्यक्रम के अगले चरण की तैयारी के साथ 'लिबरल आर्ट्स शिक्षा' को जल्दी शुरू करने की सुविधा होगी। इसके अलावा उपयुक्त निकास विकल्पों के साथ
बहु-विषयक अध्ययन करना आसान होगा।
शिक्षा के विकास के लिए एक व्यापक नीति की अवधारणा और मसौदा तैयार करने में, समिति ने शिक्षा के विभिन्न चरणों के परस्पर संबद्वता को ध्यान में रखा है और यह कैसे निरंतरता, संगतता और प्रक्रियाओं को सक्षम बनाएगा और अंत में देश के लिए एक शैक्षिक रोडमैप को साकार करेगा। हमने माध्यमिक शिक्षा चरण की शुरुआत करने वाले सभी विद्यार्थियों के लिए स्नातक और स्नातकोत्तर शिक्षा और अनुसंधान में जाने के लिए कई निकास और प्रवेश विकल्प प्रदान किए हैं। कोई विद्यार्थी जो भले ही अपनी पढ़ाई बंद कर चुका है, वह उच्च स्तर में फिर से प्रवेश और निरंतर शिक्षा के लिए योग्य होगा, इसके लिए नीति तैयार करते समय उपयुक्त योजनाएँ दिए गए हैं। समिति ने इस तथ्य को अनदेखा
नहीं किया है कि शैक्षिक ढाँचे के कई आयाम एक मजबूत शैक्षिक प्रगति के समग्र रूपरेखा
के भीतर होना चाहिए।
अंतरसंबद्वता की अवधारणा विद्यार्थियों को उचित उन्मुखीकरण के जरिए उच्च स्तर पर आगे की पढ़ाई के लिए तैयार करती है, जो कि शिक्षा के माध्यमिक स्तर में लागू किए जाने वाले लिबरल शिक्षा के शुरुआती प्रयासों से आएगी। लिबरल आर्ट्स शिक्षा की मजबूत बुनियाद और विभिन्न स्तरों पर व्यवसायिक शिक्षा का प्रावधान सभी स्नातक शिक्षा का हिस्सा है। स्नातक शिक्षा का चौथा वर्ष भी परास्नातक और डॉक्टरेट स्तर की शिक्षा में बिना किसी बाधा के एकीकृत हो सकते हैं। लंबे समय में, यह एकीकृत अवधारणा व्यवसायिक शिक्षा को स्नातक शिक्षा की मुख्यधारा में लाने में भी मदद करेगा, इससे शिक्षा के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण पैदा होगा और नीति की भावना समग्र रूप में साकार
हो सकेगी।
अंत में, परस्पर संबद्वता की अवधारणा सामाजिक संदर्भ में शिक्षा के स्थान पर लागू होती है, जो दोनों को प्रभावित करती है और इससे प्रभावित होती है। नीति शैक्षिक प्रयासों की सफलता के लिए समुदाय के स्वामित्व को महत्वपूर्ण मानती है, चाहे वह विद्यालय परिसर प्रबंधन समिति के माध्यम से एक स्कूल परिसर का स्वामित्व हो या शैक्षिक कार्यक्रमों की
सफलता सुनिश्चित करने के लिए स्वयंसेवा के माध्यम से हो। यह समुदाय आधारित संगठन और शैक्षणिक संस्थानों द्वारा समान प्रयासों के अभिसरण और समुदाय सदस्यों की अध्ययन के स्नातक कार्यक्रम के अगले चरण की तैयारी के साथ 'लिबरल आर्ट्स " शिक्षा को जल्दी शुरू करने की सुविधा होगी। इसके अलावा उपयुक्त निकास विकल्पों के साथ बहु-विषयक अध्ययन करना आसान होगा।
शिक्षा के विकास के लिए एक व्यापक नीति की अवधारणा और मसौदा तैयार करने में,
समिति ने शिक्षा के विभिन्न चरणों के परस्पर संबद्वता को ध्यान में रखा है और यह कैसे निरंतरता, संगतता और प्रक्रियाओं को सक्षम बनाएगा और अंत में देश के लिए एक शैक्षिक रोडमैप को साकार करेगा। हमने माध्यमिक शिक्षा चरण की शुरुआत करने वाले सभी
विद्यार्थियों के लिए स्नातक और स्नातकोत्तर शिक्षा और अनुसंधान में जाने के लिए कई निकास और प्रवेश विकल्प प्रदान किए हैं। कोई विद्यार्थी जो भले ही अपनी पढ़ाई बंद कर चुका है, वह उच्च स्तर में फिर से प्रवेश और निरंतर शिक्षा के लिए योग्य होगा, इसके लिए नीति तैयार करते समय उपयुक्त योजनाएँ दिए गए हैं। समिति ने इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया है कि शैक्षिक ढाँचे के कई आयाम एक मजबूत शैक्षिक प्रगति के समग्र रूपरेखा के भीतर होना चाहिए।
अंतरसंबद्वता की अवधारणा विद्यार्थियों को उचित उन्मुखीकरण के जरिए उच्च स्तर पर आगे की पढ़ाई के लिए तैयार करती है, जो कि शिक्षा के माध्यमिक स्तर में लागू किए जाने वाले लिबरल शिक्षा के शुरुआती प्रयासों से आएगी। लिबरल आर्ट्स शिक्षा की मजबूत बुनियाद और विभिन्न स्तरों पर व्यवसायिक शिक्षा का प्रावधान सभी स्नातक शिक्षा का हिस्सा है। स्नातक शिक्षा का चौथा वर्ष भी परास्नातक और डॉक्टरेट स्तर की शिक्षा में बिना किसी बाधा के एकीकृत हो सकते हैं। लंबे समय में, यह एकीकृत अवधारणा व्यवसायिक शिक्षा को स्नातक शिक्षा की मुख्यधारा में लाने में भी मदद करेगा, इससे शिक्षा के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण पैदा होगा और नीति की भावना समग्र रूप में साकार
हो सकेगी।
अंत में, परस्पर संबद्वता की अवधारणा सामाजिक संदर्भ में शिक्षा के स्थान पर लागू होती है, जो दोनों को प्रभावित करती है और इससे प्रभावित होती है। नीति शैक्षिक प्रयासों की सफलता के लिए समुदाय के स्वामित्व को महत्वपूर्ण मानती है, चाहे वह विद्यालय परिसर प्रबंधन समिति के माध्यम से एक स्कूल परिसर का स्वामित्व हो या शैक्षिक कार्यक्रमों की
सफलता सुनिश्चित करने के लिए स्वयंसेवा के माध्यम से हो। यह समुदाय आधारित संगठन और शैक्षणिक संस्थानों द्वारा समान प्रयासों के अभिसरण और समुदाय सदस्यों की विशेषज्ञता को शामिल करने की परिकल्पना करता है, जैसा कि संस्थान कई तरीकों से समुदाय की प्रगति में योगदान करते हैं।

उच्च शिक्षा में लिब्रल आर्ट दृष्टिकोण

(Liberal arts approach in higher education)

नालंदा और तक्षशिला के समय से या उससे भी पहले से भारत में, उच्च शिक्षा का इतिहास यह बताता है कि मानवीय ज्ञान के सभी पहलू और अन्वेषण मौलिक रूप से जुड़े हैं। एक व्यापक और एकीकृत शिक्षा के माध्यम से प्रदान की जाने वाली ज्ञान की समग्र प्रकृति विद्यार्थियों को जीवन, कार्य और समाज के प्रभावी सदस्य बनने की तैयारी में एक
महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। इस संदर्भ में, जिस लिबरल एजुकेशन को आज हम विभिन्न विषयों की सारणी के माध्यम से दिखाते हैं, जिसमें कला, मानविकी, गणित और विज्ञान शामिल हैं, दुनिया भर के कई उच्च अध्ययन के संस्थानों ने ठीक ढंग से एक विशेष क्षेत्र के गहन अध्ययन के साथ एकीकृत करके कार्यान्वित किया है। इस तरह के प्रयास,
जो विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित के साथ मानविकी और कला को एकीकृत
करते हैं, पर उपलब्ध आकलन इसके

सीखने पर सकारात्मक प्रभाव को प्रदर्शित करते हैं।
बहुत स्पष्ट तौर पर, सीखने की सामान्य क्रिया और इस का आनंद लेने के अलावा, यहाँ के
परिणामों में अन्य बातों के साथ अधिक आलोचनात्मक चिंतन, उच्च स्तरीय चिंतन, गहन
अधिगम, विषय-वस्तु की दक्षता, समस्या समाधान, टीम वर्क और संचार कौशल शामिल
है। भले ही भारत में व्यवस्थित शोध अध्ययनों के माध्यम से इस तरह के निर्णायक आकलन अभी तक उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी दूसरी जगहों पर उपलब्ध आकलन के निष्कर्ष स्नातक स्तर पर उदार शिक्षा (लिबरल एडुकेशन) शुरू करने के लिए पर्याप्त और ठोस हैं। ये विद्यार्थियों को भविष्य में विभिन्न रोजगार परिदृश्यों के लिए अपनी राह तैयार करने, साथ ही अपने पेशे में दूसरी भूमिकाएँ निभाने हेतु तैयार करते हैं। स्नातक स्तर कि शिक्षा कि यह नीति वर्तमान संदर्भ के लिए तो माफिक है ही बल्कि भविष्य में भी मानवीय प्रयासों की बहुलता और साथ ही साथ संबंधित तंत्रों की बढ़ती अनिश्चितताओं के लिए भी उपयुक्त है।

उच्च गुणवत्ता वाले अनुसंधान पर फोकस

(Focus on High Quality Research)

परास्नातक (Masters) और डॉक्टरेट स्तर को मास्टर डिग्री में कम से कम तीन रूट के
प्रावधान के साथ मजबूत किया जा रहा है- एक साल की डिग्री, दो साल की डिग्री और एकीकृत 5 साल की डिग्री। मास्टर्स डिग्री में, विषय विशेष में उपयुक्त क्षमता को मजबूत करने के लिए तथा विद्यार्थियों को एक शोध डिग्री हेतु तैयार करने के लिए, शोध एक
महत्वपूर्ण घटक होगा। वर्तमान शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी कमी विश्वविद्यालय स्तर पर
अनुसंधान की योजना और कार्यान्वयन के लिए सुसंगत दिशा का अभाव है। हमने इस
बड़ी कमी को दूर करने के लिए पहली बार एक नया राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान (एनआरएफ़/NRF) प्रस्तावित किया है, जो शिक्षा प्रणाली के भीतर मुख्य रूप से कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अनुसंधान के वित्तपोषण पर ध्यान केंद्रित करेगा। एनआरएफ़ (NRF) विज्ञान, तकनीक, सामाजिक विज्ञान और कला एवं मानविकी के चार व्यापक क्षेत्रों को शामिल करेगा। वर्तमान में कमजोर समर्थन प्राप्त विषयों जैसे सामाजिक विज्ञान और मानविकी को मजबूत करने के अलावा, एनआरएफ़ (NRF) बहू-विषयक स्वरुप के विभिन्न अनुसंधान प्रयासों के बीच सामंजस्य भी लाएगा।
वित्त पोषण प्रदान करने के अलावा, एनआरएफ़ (NRF) परामर्श के एक नए स्थापित किए
जाने वाले औपचारिक तंत्र के माध्यम से विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शोध क्षमता के
विकास और निर्माण की आवश्यकता का भी ध्यान रखेगा। एनआरएफ़ (NRF) के कामकाज के सिद्धांतों के प्रतिपादन के लिए जरूरी है:
1. हितधारकों और अनुसंधान समूहों
के बीच तालमेल लाना
2. नियंत्रण तथा बीच के सुधारों के लिए एक तंत्र का निर्माण,और
3. व्यापक स्तर पर विश्वविद्यालयों और उनके समकक्षों के बीच की कड़ियों को मजबूत
किया जाना। एनआरएफ़ (NRF) विश्वविद्यालयों और कॉलेजों विशेष कर उन संस्थानों
में शोध को बढ़ावा देगा जो अब तक देश के अनुसंधान परिदृश्य में बड़े खिलाड़ी नहीं हैं।
इसके लिए देश में प्रमुख संस्थानों के प्रतिष्ठित शोधकर्ताओं को शामिल करते हुए एक
संस्थागत सलाह तंत्र के माध्यम से अनुसंधान करने की क्षमता का निर्माण करने में मदद
करेगा।

शिक्षा प्रणाली के रूपान्तरण को सुगम बनाना

(Facilitating

Transformation of Education System)

शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन की इस नीति की यह परिकल्पना बिना बहुत ही अनुभवी और
उत्साही स्कूल शिक्षकों और कॉलेज शिक्षकों के संभव नहीं हो पाएगा| इसके लिए उनकी तैयारी पूरी होनी पड़ेगी। इसलिए शिक्षकों की तैयारी, उनका आमुखीकरन तथा प्रशिक्षण की ज़िम्मेदारी उच्च शिक्षा संस्थानों को लेनी पड़ेगी। ये ऐसे संस्थान या विश्वविद्यालय होने चाहिये जहां सभी प्रकार के कोर्स और पाठ्यक्रम चलते हों। शिक्षण के द्वारा शिक्षा व्यवस्था के विकास के अतिरिक्त शिक्षकों की भूमिका शोध, संस्था के निर्माण तथा छात्रों के पूर्ण
विकास में भी होगी और इसके लिए उन्हें प्रोत्साहित भी किया जाएगा।
स्कूलों के संदर्भ में, स्कूल कॉम्प्लेक्स का विकास एक नयी परंपरा को विकसित करेगा जिससे कॉमन संसाधनों का समुचित उपयोग हो पाएगा| स्कूल कॉम्प्लेक्स का प्रस्ताव सबसे पहले 1964-66 की स्कूल कमिशन की रिपोर्ट में की गयी थी| फिर एनपीई 1986/92 की प्रोग्राम ऑफ एक्शन में भी इसको शामिल किया गया था लेकिन इसे लागू करने में चूक हुई। हमें परिवर्तन के प्रति अपनी सोच को बदलने की आवश्यकता है जिससे बदलाव
की इस प्रक्रिया को ध्यान से क्रियान्वित किया जा सके और सफल स्कूल कोम्प्लेक्सेस की प्रक्रियाओं को अन्य जगहों तक फैलाया जा सके। खुलेपन और संसाधनों की सामूहिक इस्तेमाल की यह संस्कृति हमारी सोच और प्रवृति को बदलने में काफी मदद करेगा और इस नीति का सफल क्रियान्वयन हो पाएगा| एक ज्ञानवान समाज (Knowledge Society) के लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमें एक उत्तरदायी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत
है जो तभी हो सकता है जब हमारे शिक्षा संस्थान, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय आदि इस
नीति में दर्शाये गए लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सक्षम और स्वतंत्र हों।
इस नीति में उच्च शिक्षण संस्थानों के प्रशाशन को एक एकीकृत इकाई के तौर पर देखा गया है जिसके अंतर्गत पाठ्यक्रम संबन्धित, प्रशासनिक और वित्तीय मामले शामिल होंगे।
इन्हें जरूरी स्वायतता हासिल होगी जिससे की ये ज्यादा स्वतंत्र और कुशल बन पाएंगे।
इनमें काँट-छांट का कोई भी प्रयास इन्हें वास्तव में कमजोर करेगा| इसलिए हमें किसी भी प्रकार की छोटी स्वायतता के बारे में नहीं सोचना चाहिए। लेकिन इस स्वायतता के साथ ही जिम्मेदारिओं के मानदंड भी तय करने पड़ेंगी जिससे की वो अपनी स्वायतता का
सही मायनों में इस्तेमाल करें। इस नीति के क्रियान्वयन के लिए बड़ी संख्या में उच्च गुणवत्ता
वाले लोगों जैसे वाइस चान्सलर, संस्थानों के डाइरेक्टर, रजिस्ट्रार, नीति निर्माता, प्रशाशक,
आदि की जरूरत पड़ेगी| इस नीति के अनुसार इनकी भूमिका शिक्षा जगत के लिए बहुत महत्वपूर्ण होने वाली है और इसके लिए उनकी ट्रेनिंग या आमुखीकरण आदि की भी जरूरत पड़ेगी। इस किस्म की जरूरतों को पूरा करने के लिए शिक्षा विभाग जरूरी ढांचे बनाएगा।
विश्वविद्यालयी शिक्षा की संरचना का निरूपण प्रत्येक स्तर पर शोध को शामिल करते हुए एक बहु विषयक उच्च शिक्षा संस्थानों के रूप में किया गया है। यह नीति विश्वविद्यालय और कॉलेज में अनुषंधान और विकास की एक मायी संस्कृति विकसित होते देखना चाहती है। ऐसी उम्मीद है की आने वाले सालों में विश्वविद्यालयों में बहु विषयक उच्च शिक्षा जिसमें कृषि, चिकित्सा और कानून जैसे व्यवशायिक विषयों का भी समावेश होगा, उपलब्ध होगा। इसी के साथ वहाँ शोध के भी अच्छे मौके उपलब्ध होंगे। इससे विद्यार्थियों को ना केवल सम्पूर्ण शिक्षा के मौके मिलेंगे बल्कि उन्हें अपनी पसंद के विषयों का अध्ययन करने तथा अपनी रचनात्मकता और मौलिकता को बढ़ाने में मदद मिलेगा।
जहां तक इन पर नियंत्रण का सवाल है हमने अपनी संस्तुति इस प्रमुख सिद्वान्त के आधार
पर की है कि विनियमन, शिक्षा कि व्यवस्था, प्रमाणन, वित्त पोषण तथा स्तर का निर्धारण आदि एक अलग इकाई के द्वारा किया जाएगा और यहाँ भी प्रयास होगा कि नियंत्रण कम से कम हो। इससे हितों के द्वंद तथा अधिकारों के केंद्रण को भी रोका जा सकेगा।
भृष्टाचार शिक्षा के गवर्नेस को प्रभावित करने वाला एक एक महत्वपूर्ण कारक बना हुआ है। हमारी लोक प्रणालियों से भ्रस्टाचार को जड़ से खत्म करने का संकल्प इस विश्वास के साथ स्थापित किया गया है कि ईमानदारी, पारदर्शिता और नैतिकता की बुनियाद के बिना हम एक देश के रूप में महानता हासिल नहीं कर पाएंगे। भ्रस्टाचार की प्रकृति केवल वित्तीय या मौद्रिक नहीं है। यह ऐसी कोई भी रुकावट हो सकती है जो जनता की भलाई के लिए महत्वपूर्ण प्रणालियों के संचालन में निष्पक्षता, नैतिकता व ईमानदारी को कम करती है। इसके लिए अकुशल प्रणालियों को फिर से बनाने और प्रभावी नेतृत्व और नए संकल्प के साथ काम करने की आवश्यकता होगी। दृष्टिकोण ऐसी होनी चाहिए जो यह सुनिश्चित करे कि राजनीतिक पहल और प्रशासनिक प्रणालियों दोनों शिक्षा प्रणाली में

राष्ट्रीय विकास को सुविधाजनक बनाना

(Facilitating National Development)

भारत 2032 तक संयुक्त राज्य और चीन के साथ तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में
अपनी जगह बनाने की महत्वाकांक्षा रखता है. इसी अवधि के दौरान यह नीति एक बड़ा
परिवर्तन लाएगी। भारत अभी छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और हम 5-7 वर्षों में 5
ट्रिल्यन तक पहुँचकर चौथे या पाँचवे स्थान पर पहुँच जाएंगे। 2030-2032 तक हम 10 ट्रिल्यन से अधिक की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होंगे। हमारी 10 ट्रिल्यन की अर्थव्यवस्था प्राकृतिक संसाधनों से नहीं बल्कि ज्ञान संसाधनों से संचालित होगी। हमने दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के निहितार्थ पर ध्यान नहीं दिया है। यह पूरी तरह से अलग परिस्थिति होगी। व्यवस्था और तंत्र में अलग तरीके से सोचने के लिए मजबूर करता है और इस मील के पत्थर को हासिल करने से पूरे देश में इसके प्रभाव व परिणाम होंगे। क्या हम संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और चीन के अलावा दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के रूप में अपनी जगह बनाने के लिए तैयार हैं और आने वाले वर्षों में इसे बनाए रखने के लिए आश्वस्त होंगे? ऐसा करने के लिए हमें ज्ञान की माँगों, तकनीकों और जिस तरह से ये समाज रहते और काम करते है, के संदर्भ में सभी आवश्यक गुण और विशेषताओं के साथ

एक मजबूत शिक्षा प्रणाली के आधार पर नॉलेज सोसायटी की आवश्यकता होगी। इस संदर्भ में, प्रधानमंत्री द्वारा हाल ही में भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए चौथी औद्योगिक क्रांति का लाभ उठाने का आह्वान विशेष रूप से उपयुक्त पुनरावृति के जोखिम पर भी, यह समझना जरूरी होगा कि 10 ट्रिल्यन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने से हमें वह धन मिलेगा जिसकी हमें आवश्यकता है, लेकिन यदि हम अभी खर्च नहीं करेंगे तो इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था को प्राप्त करना और उसे बनाए रखना आसान नहीं होगा। जिस मानव संसाधन की जरूरत होगी उसे तैयार करने के लिए हम 10 ट्रिल्यन के लक्ष्य तक पहुँचने का इंतेजार नहीं कर सकते। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा ज्ञान अर्थव्यवस्था में परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण हिस्सा होंगी जो हाल में देश के कुछ हिस्सों में चल रही है, लेकिन पूरे देश को इसमें शामिल करने की आवश्यकता है। इसलिए, हमें अभी उस वित्त को जुटाने के प्रयास करने चाहिए जो शिक्षा की जरूरत है और इसे जल्दी करना चाहिए। परिपूर्णता की खातिर, हमने इस नीति को अगले दशक के भीतर हकीकत में बदलने के लिए वित्त पोषण की आवश्यकता का एक मोटा और प्रारंभिक अनुमान शामिल किया है। इसी प्रकार, इस नीति को लागू करने के लिए हमें जो व्यापक कदम उठाने की जरूरत है, वे भी परिशिष्ट में शामिल हैं। ये दोनों कार्यान्वयन के लिए ज्यादातर दिशा- निर्देशों की प्रकृति में है और सीधे तौर पर नीति का हिस्सा नहीं है।

नीति का कार्यान्वयन पूरी तरह सुनिश्चित करना

(Ensuring Implementation in spirit and Intent)

भले ही इस नीति में बहुत कुछ सोचा गया हो, लेकिन यह हमारे लिए एक प्रतिभाशाली नॉलेज सोसायटी के सपने को साकार करने के लिए काफी नहीं है। नीति को प्रभावी बनाने के लिए ऐसे कई और कदम हमें राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर उठाने होंगे। यह
सावधानीपूर्वक योजना बनाने और एक अच्छी तरह से सोची समझी कार्यान्वयन रणनीति पर निर्भर करेगा, जो व्यवहारिकता और जमीनी वास्तविकताओं के अनुरूप हो। यह समाज के विभिन्न वर्गों के दृष्टिकोण से भी प्रभावित होगा (जो भारत के संदर्भ में स्वाभाविक रूप से जटिल है), साथ ही साथ हम इसके कार्यान्वयन में सभी योजनाओं और कार्यान्वयन
प्रयासों के केंद्र में राष्ट्रीय हित को रखते हुए सबसे कठोर/सख्त प्रॉफेश्नल्स, बौद्विक, नैतिक
और नीतिपरक सिद्वांतों को लागू करने के लिए कितने अच्छे से तैयार हैं।
नीतिगत उद्देश्यों और पहलों के व्यापक रूप रेखा के भीतर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को प्रोत्साहित किया जाएगा-
1. अपनी परिस्थितियों और संदर्भो के अनुसार नीति के व्यापक उद्देश्यों और लक्ष्यों को प्राथमिकता दें और उन्हें अपने अनुसार अनुकूलित करें;
2. राष्ट्रीय नीतिगत उद्देश्यों के व्यापक दायरे में राज्य अपने लिए विशिष्ट लक्ष्य तय करे और शिक्षा क्षेत्र के विकास/कार्यक्रम की योजनाएँ बनाए;
3. शिक्षा क्षेत्र में पूर्व की उपलब्धियों, उभरती राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं, संसाधनों की उपलब्धता और संस्थागत क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त मध्यवर्ती लक्ष्य (जैसे 2025 और 2030) तय करना चाहिए।
हाशिये और बहिष्कृत समूहों की शिक्षा में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए, शिक्षा प्रणाली
शिक्षार्थियों के विविध समूहों की परिस्थितियों और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उसके अनुकूल प्रतिक्रिया देने के लिए रणनीतियाँ और प्रोग्रामेटिक इंटरवेंशन को तैयार करेगी।
इसलिए चुनौती यह है कि नीति को उस भावना से लागू करना होगा जिसमें व्यक्त किया गया है। भरोसा है कि हम ऐसा कर पाएँगे। पूर्व में, कई समूहों ने भारत में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और मैं विश्वास करता हूँ कि वह ऐसा करना जारी रखेंगे। कई संगठनों और संस्थाओं के साथ-साथ हिंदू, मुस्लिम, बौद्व और सिख
समुदायों, ईसाई मिशनरी समूहों, जैन संप्रदायों और कई अन्य सांस्कृतिक, श्रद्वा-आधारित और सामुदायिक संगठनों द्वारा शुरुआती समय में बनाए गए काफी संस्थान हैं, जिनमें से कई आज भी देश के प्रमुख शिक्षण संस्थान हैं। इन सब और अन्य योगदानों को इस नीति द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधा को देखते हुए और भी ऊँचाइयों तक पहुँचाना चाहिए।
आगे बढ़ने पर, नीति के सफल कार्यान्वयन के लिए प्रत्येक भारतीय को अपना आवश्यक रूप से श्रेष्ठ योगदान देने की जरूरत होगी। हमने इस आवश्यकता को समझा है और इस नीति के माध्यम से सभी के योगदान को विधिसंगत बनाने के रास्ते तैयार करने की कोशिश की है, लेकिन इस योगदान को नीति में उल्लेखित गवर्नेस में सुधारों के माध्यम से सभी
को समग्र व सुसंगत तरीके से एक साथ रखा जाना चाहिए। यह उस तरह की प्रतिबद्धता और नेतृत्व चाहेगा जिसे हमने स्वतंत्रता आंदोलन के बाद से नहीं देखा है।
नीति की सफलता पूरी तरह से इसके कार्यान्वयन की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। डॉक्टर अंबेडकर ने संविधान के बारे में बहुत अच्छी बात कही थी... मुझे लगता है कि यह एक अच्छा संविधान है लेकिन इसका बुरा होना भी निश्चित है अगर वो लोग जो इस पर काम करेंगे वो बहुत बुरे हैं। वहीं पर अगर संविधान बुरा हो लेकिन अगर इस पर काम करने वाले
लोग बहुत अच्छे हैं तो यह अच्छा हो सकता है । संविधान का कार्य संविधान की प्रकृति पर पूरी तरह से निर्भर नहीं करता है. हालांकि एनईपी (NEP) की तुलना संविधान से नहीं की जानी चाहिए लेकिन इस देश के 50% से अधिक लोगों जो 25 साल से कम उम्र के हैं के जीवन पर इसका प्रभाव असाधारण होगा, और इसलिए इसे अत्यधिक सावधानी
और प्रतिबद्वता से लागू करने की जरूरत है। आने वाले वर्षों में जिस परिमाण से बच्चों और युवाओं को उच्च गुणवत्ता की शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए जाएँगे उस हिसाब से भारत और इसके लोगों के भविष्य की दिशा तय होगी। इस देश के भविष्य के लिए एक शिक्षा प्रणाली के बारे में विचार करते समय तथा वर्तमान की अपनी शिक्षा प्रणाली की अवस्था को देखते हुए ये बातें हमेशा हमारे दिमाग में थीं। चुनौतियां कई हैं, लेकिन निश्चित रूप से इसका दृढ़ता से सामना करना और इसे सफल बनाना इस महान राष्ट्र की क्षमता के अंदर है।
शैक्षिक प्रयासों का समाज पर या समाज का शैक्षिक प्रयासों पर जो असाधारण प्रभाव पड़ता है, पर विचार करते हुए यह जरूरी है कि नॉलेज सोसायटी के निर्माण के विभिन्न पहलुओं के लिए सामाज की प्रतिक्रिया को हम अनदेखा नहीं करें, जिसके लिए इस नीति द्वारा केंद्रीय भूमिका निभाए जाने की उम्मीद है। इसके लिए हमें कई सारी चीजों का
ध्यान रखना पड़ेगा जैसे, मानसिकता, दृष्टिकोण और संस्कृति के साथ-साथ व्यक्तिगत, संस्थागत, प्रणालीगत और सामाजिक स्तरों जैसे कई पहलू। हालाँकि आर्थिक और अमली जामा पहनाने के दृष्टिकोण से यह एक चुनौतीपूर्ण प्रस्ताव की तरह लग सकता है लेकिन जो हमने अभी तक नहीं पहचाना है वह यह है कि इस देश में ऐसी बहुत सारी एजेंसीयों
और व्यक्ति हैं जो स्वेच्छा से सहायता प्रदान करने के लिए आगे आएँगे यदि उन्हें आश्वस्त किया जाए कि नॉलेज सोसायटी के निर्माण एक नैतिक दृष्टिकोण है तथा इसे सत्यनिष्ठा और ईमानदारी से किया जा रहा है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 भारतीय लोगों, उनकी परंपराओं, संस्कृतियों और भाषाओं की
विविधता को ध्यान में रखते हुए तेजी से बदलते, ज्ञान आधारित समाजों की आवश्यकताओं को संबोधित करने तथा शिक्षा प्रणाली के रूपांतरण और उसमें एक जीवंतता लाने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करता है। वह यह सुनिश्चित करना चाहता है कि मानव पूंजी, जो पूंजी का सबसे महत्वपूर्ण रूप है, ही आवश्यक बदलाव को बढ़ावा देगा और यह सुरक्षित एवं मजबूत है। सबसे अधिक प्राथमिकता उच्च गुणवत्ता और व्यापक शिक्षा तक सबकी पहूँच को सुनिश्चित करने के लिए दी गई है, जो भारत के निरंतर विकास, प्रगति और वैश्विक मंच पर- आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और समानता, पर्यावरण की देख-रेख, वैज्ञानिक उन्नति और सांस्कृतिक संरक्षण के संदर्भ में नेतृत्व का समर्थन करेगा तथा व्यक्तिगत, देश और दुनिया की भलाई के लिए हमारे देश की समृद्व प्रतिभाओं और संसाधनों को विकसित करने के लिए करेगा। गुणवत्ता और समता की सोच पर स्थापित शिक्षा प्रणाली को स्थायी विकास के लिए अहम माना जाता है। यह उभरती हुई ज्ञान अर्थव्यवस्था और समाज, सामाजिक-आर्थिक बदलाव, और एक निष्पक्ष, न्यायसंगत और संवेदनशील समाज के निर्माण के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

(National Education Ploicy Draft)

अपडेट दिनाँक 29 जुलाई 2020

प्रेस कॉन्फ्रेंस में नई शिक्षा नीति के कुछ बिंदु

प्रेस कॉन्फ्रेंस में नई शिक्षा नीति के कुछ बिंदु

1. मल्टिपल एंट्री और एग्ज़िट सिस्टम में पहले साल के बाद सर्टिफिकेट, दूसरे साल के बाद डिप्लोमा और तीन-चार साल बाद डिग्री दी जाएगी: अमित खरे, सचिव उच्च शिक्षा विभाग

2. 4 साल का डिग्री प्रोग्राम फिर M.A. और उसके बाद बिना M.Phil के सीधा PhD कर सकते हैं: अमित खरे, सचिव उच्च शिक्षा विभाग

3. -ईपाठ्यक्रम क्षेत्रीय भाषाओं में विकसित किए जाएंगे। वर्चुअल लैब विकसित की जा रही है और एक राष्ट्रीय शैक्षिक टेक्नोलॉजी फोरम (NETF) बनाया जा रहा है: भारत सरकार

4. कैबिनेट ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020; को मंजूरी दी। उच्च शिक्षा में प्रमुख सुधारों

में 2035 तक 50% सकल नामांकन अनुपात का लक्ष्य और एक से ज्यादा प्रवेश/एग्ज़िट का प्रावधान शामिल है: भारत सरकार

5. देश में उच्च शिक्षा के लिए एक ही नियामक (Regulator) होगा, इसमें अप्रूवल और वित्त के लिए अलग-अलग वर्टिकल होंगे। वो नियामक 'ऑनलाइन सेल्फ डिसक्लोजर बेस्ड ट्रांसपेरेंट सिस्टम' पर काम करेगा: अमित खरे, उच्च शिक्षा सचिव

6. हमने लक्ष्य निर्धारित किया है कि GDP का 6% शिक्षा में लगाया जाए जो अभी 4.43% है: अमित खरे, सचिव उच्च शिक्षा विभाग

7. अभी हमारे यहां डीम्ड यूनविर्सिटी, सेंट्रल यूनिवर्सिटीज और स्टैंडअलोन इंस्टिट्यूशंस के लिए अलग-अलग नियम हैं। नई एजुकेशन पॉलिसी के तहते सभी के लिए नियम समान होगाः अमित खरे, हायर एजुकेशन सेक्रटरी

8. बोर्ड परीक्षाओं के लिए कई प्रस्ताव नई एजुकेशन पॉलिसी में है। बोर्ड परीक्षाओं के महत्व के कम किया जाएगा। इसमें वास्तविक ज्ञान की परख की जाएगी। 5 कक्षा तक मातृभाषा को निर्देशों का माध्यम बनाया जाएगा। रिपोर्ट कार्ड में सब चीजों की जानकारी होगीः केंद्र सरकार

पडेट दिनाँक 29 जुलाई 2020

प्रेस कॉन्फ्रेंस में नई शिक्षा नीति के कुछ बिंदु

प्रेस कॉन्फ्रेंस में नई शिक्षा नीति के कुछ बिंदु

1. मल्टिपल एंट्री और एग्ज़िट सिस्टम में पहले साल के बाद सर्टिफिकेट, दूसरे साल के बाद डिप्लोमा और तीन-चार साल बाद डिग्री दी जाएगी: अमित खरे, सचिव उच्च शिक्षा विभाग

2. 4 साल का डिग्री प्रोग्राम फिर M.A. और उसके बाद बिना M.Phil के सीधा PhD कर सकते हैं: अमित खरे, सचिव उच्च शिक्षा विभाग

3. -ईपाठ्यक्रम क्षेत्रीय भाषाओं में विकसित किए जाएंगे। वर्चुअल लैब विकसित की जा रही है और एक राष्ट्रीय शैक्षिक टेक्नोलॉजी फोरम (NETF) बनाया जा रहा है: भारत सरकार

4. कैबिनेट ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020; को मंजूरी दी। उच्च शिक्षा में प्रमुख सुधारों में 2035 तक 50% सकल नामांकन अनुपात का लक्ष्य और एक से ज्यादा प्रवेश/एग्ज़िट का प्रावधान शामिल है: भारत सरकार

5. देश में उच्च शिक्षा के लिए एक ही नियामक (Regulator) होगा, इसमें अप्रूवल और वित्त के लिए अलग-अलग वर्टिकल होंगे। वो नियामक 'ऑनलाइन सेल्फ डिसक्लोजर बेस्ड ट्रांसपेरेंट सिस्टम' पर काम करेगा: अमित खरे, उच्च शिक्षा सचिव

6. हमने लक्ष्य निर्धारित किया है कि GDP का 6% शिक्षा में लगाया जाए जो अभी 4.43% है: अमित खरे, सचिव उच्च शिक्षा विभाग

7. अभी हमारे यहां डीम्ड यूनविर्सिटी, सेंट्रल यूनिवर्सिटीज और स्टैंडअलोन इंस्टिट्यूशंस के लिए अलग-अलग नियम हैं। नई एजुकेशन पॉलिसी के तहते सभी के लिए नियम समान होगाः अमित खरे, हायर एजुकेशन सेक्रटरी

8. बोर्ड परीक्षाओं के लिए कई प्रस्ताव नई एजुकेशन पॉलिसी में है। बोर्ड परीक्षाओं के महत्व के कम किया जाएगा। इसमें वास्तविक ज्ञान की परख की जाएगी। 5 कक्षा तक मातृभाषा को निर्देशों का माध्यम बनाया जाएगा। रिपोर्ट कार्ड में सब चीजों की जानकारी होगीः केंद्र सरकार

अपडेट दिनाँक 08 अगस्त 2020

कैबिनेट ने नई शिक्षा नीति (New Education Policy 2020) को हरी झंडी दे दी है. 34 साल बाद शिक्षा नीति में बदलाव किया गया है. नई शिक्षा नीति की उल्लेखनीय बातें सरल तरीके की इस प्रकार हैं:

----5 Years Fundamental---
1. Nursery @4 Years
2. Jr KG @5 Years
3. Sr KG @6 Years
4. Std 1st @7 Years
5. Std 2nd @8 Years

---- 3 Years Preparatory---
6. Std 3rd @9 Years
7. Std 4th @10 Years
8. Std 5th @11 Years

----- 3 Years Middle---
9. Std 6th @12 Years
10.Std 7th @13 Years
11.Std 8th @14 Years

---- 4 Years Secondary---
12.Std 9th @15 Years
13.Std SSC @16 Years
14.Std FYJC @17Years
15.STD SYJC @18 Years

खास बातें :

----केवल 12वीं क्‍लास में होगा बोर्ड, MPhil होगा बंद, कॉलेज की डिग्री 4 साल की

---10वीं बोर्ड खत्‍म, MPhil भी होगा बंद,

---- अब 5वीं तक के छात्रों को मातृ भाषा, स्थानीय भाषा और राष्ट्र भाषा में ही पढ़ाया जाएगा. बाकी विषय चाहे वो अंग्रेजी ही क्यों न हो, एक सब्जेक्ट के तौर पर पढ़ाया जाएगा।

----अब सिर्फ 12वींं में बोर्ड की परीक्षा देनी होगी. जबकि इससे पहले 10वी बोर्ड की परीक्षा देना अनिवार्य होता था, जो अब नहीं होगा.

----9वींं से 12वींं क्लास तक सेमेस्टर में परीक्षा होगी. स्कूली शिक्षा को 5+3+3+4 फॉर्मूले के तहत पढ़ाया जाएगा।

----वहीं कॉलेज की डिग्री 3 और 4 साल की होगी. यानि कि ग्रेजुएशन के पहले साल पर सर्टिफिकेट, दूसरे साल पर डिप्‍लोमा, तीसरे साल में डिग्री मिलेगी.।

----3 साल की डिग्री उन छात्रों के लिए है जिन्हें हायर एजुकेशन नहीं लेना है. वहीं हायर एजुकेशन करने वाले छात्रों को 4 साल की डिग्री करनी होगी. 4 साल की डिग्री करने वाले स्‍टूडेंट्स एक साल में MA कर सकेंगे.

---अब स्‍टूडेंट्स को MPhil नहीं करना होगा. बल्कि MA के छात्र अब सीधे PHD कर सकेंगे.

---10वीं में नहीं होगा बोर्ड एग्‍जाम.

----स्‍टूडेंट्स बीच में कर सकेंगे दूसरे कोर्स. हायर एजुकेशन में 2035 तक ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो 50 फीसदी हो जाएगा. वहीं नई शिक्षा नीति के तहत कोई छात्र एक कोर्स के बीच में अगर कोई दूसरा कोर्स करना चाहे तो पहले कोर्स से सीमित समय के लिए ब्रेक लेकर वो दूसरा कोर्स कर सकता है.

----हायर एजुकेशन में भी कई सुधार किए गए हैं. सुधारों में ग्रेडेड अकेडमिक, ऐडमिनिस्ट्रेटिव और फाइनेंशियल ऑटोनॉमी आदि शामिल हैं. इसके अलावा क्षेत्रीय भाषाओं में ई-कोर्स शुरू किए जाएंगे. वर्चुअल लैब्स विकसित किए जाएंगे. एक नैशनल एजुकेशनल साइंटफिक फोरम (NETF) शुरू किया जाएगा. बता दें कि देश में 45 हजार कॉलेज हैं.

----सरकारी, निजी, डीम्‍ड सभी संस्‍थानों के लिए होंगे समान नियम।

29जुलाई_केन्द्रीय_कैबिनेट_मीटिंग

#केंद्रीय_कैबिनेट_के_महत्वपूर्ण_निर्णय

🔻 मानव संसाधन विकास मंत्रालय को अब शिक्षा मंत्रालय कहा जायेगा।

🔶 क़रीब तीस साल बाद नई शिक्षा नीति को मंजूरी मिली, शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुधार का रास्ता खुला।

🔻 अब उच्च शिक्षा के लिए एक ही नियामक संस्था होगी, त्रिभाषा फ़ार्मूला लागू रहेगा।

👉 #नई_शिक्षा_नीति

1) SSRA (State School Regulatory Authority) बनेगी जिसके चीफ शिक्षा विभाग से जुड़े होंगे।

2) 4 ईयर इंटेग्रेटेड बीएड, 2 ईयर बीएड or 1 ईयर B Ed course चलेंगें।

3) ECCE (Early Childhood Care and Education) के अंतर्गत प्री प्राइमरी शिक्षा आंगनबाड़ी ओर स्कूलों के माध्यम से।

4) TET लागू होगा up to सेकंडरी लेवल।

5) शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों से हटाया जाएगा, सिर्फ चुनाव ड्यूटी लगेगी, BLO ड्यूटी से शिक्षक हटेंगे, MDM se भी शिक्षक हटेंगे।

6) स्कूलों में एसएमसी/एसडीएमसी के साथ SCMC यानी स्कूल कॉम्प्लेक्स मैनेजमेंट कमेटी बनाई जाएगी।

7) शिक्षक नियुक्ति में डेमो/स्किल टेस्ट और इंटरव्यू भी शामिल होंगे।

8) नई ट्रांसफर पॉलिसी आयेगी जिसमें ट्रांसफर लगभग बन्द हो जाएंगे, ट्रांसफर सिर्फ पदोन्नति पर ही होंगे।

9) ग्रामीण इलाकों में स्टाफ क्वार्टर बनाए जाएंगे, केंद्रीय विद्यलयों की तर्ज पर।

10) RTE को कक्षा 12 तक या 18 वर्ष की आयु तक लागू किया जाएगा।

11) मिड डे मील के साथ हैल्थी ब्रेकफास्ट भी स्कूलों में दिया जाएगा।

12) Three language based स्कूली शिक्षा होगी।

13) Foreign language course भी स्कूलों में शुरू होंगे।

14) विज्ञान ओर गणित को बढ़ावा दिया जाएगा, हर सीनियर सैकंडरी स्कूल में science or math विषय अनिवार्य होंगे।

15) स्थानीय भाषा भी शिक्षा का माध्यम होगी।

16) NCERT पूरे देश में नोडल एजेंसी होगी।

17) स्कूलों में राजनीति व सरकार का हस्तक्षेप लगभग समाप्त हो जाएगा।

18) क्रेडिट बेस्ड सिस्टम होगा जिससे कॉलेज बदलना आसान और सरल होगा बीच मे कोई भी कॉलिज बदला जा सकता है।

19) नई शिक्षा नीति में सिर्फ बीएड इण्टर के बाद 4 वर्षीय बीएड, स्नातक के बाद 2 वर्ष बीएड, परास्नातक के बाद 1 वर्ष का बीएड कोर्स होगा

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