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| On 3 years ago

Neerja-Film Review, Special article on International Civil Aviation Day

अंतराष्ट्रीय नागरिक/विमानन उड्डयन दिवस पर विशेष।
फ़िल्म " नीरजा"- फ़िल्म समीक्षा ।

फ़िल्म की शुरुआत मुख्य कलाकार सोनम की पारिवारिक मस्ती से होकर सीधे आतंकवाद के दृश्य पर पहुचती हैं। फ़िल्म का जेनर क्लासिक प्लस बायोपिक है । प्रथम दृश्य से ही फ़िल्म अपना प्रभाव डालना आरम्भ कर देती है।

पैन ऍम उड़ान ७३, पैन अमेरिकन वर्ल्ड एयरवेज़ की एक बोइंग 747-121 उड़ान थी, जिसका 5 सितंबर, 1986 को पाकिस्तान के कराची में अबु निदाल ऑर्गेनाइज़ेशन के चार हथियारबंद फिलिस्तीनी उग्रवादियों द्वारा अपहरण कर लिया गया था। इस प्लेन को मुंबई से अमेरिका जाना था। इस प्लेन में विभिन्न देशों के 360 यात्री सवार थे। इनमें से 20 यात्री मारे गए थे।

एयरहोस्टेस नीरजा भनोट ने ड्यूटी को निभाते हुए यात्रियों के बचाव का भरसक प्रयास किया था व अपनी जान न्यौछावर कर दी थी। फ़िल्म में हाइजेक व नीरजा की व्यक्तिगत जीवन को प्रस्तुत करने का बेहतरीन प्रयास किया गया है।

फ़िल्म माँ बेटी के रिश्ते को भी पेश किया गया है। इस मार्मिक रिश्ते में जुड़ाव ऐसा होता है मानों नाख़ून और मांस, जिसे अलग कर ही नहीं सकते। फ़िल्म में शबाना और सोनम ने इसे शानदार तरिके से पेश किया है। फ़िल्म में नीरजा के वैवाहिक रिश्तों को भी समझाने की कोशिश की गई है जो बताती है की सन् 1980 में पुरष सत्ता समाज में अहम थी।

फ़िल्म में सम्वाद बहुत

अच्छे है। पिता पुत्री संवाद बेहतर रचे गए हैं। म्युझिक आज के दौर के लिहाज़ से दुरस्त हैं। सोनम की ख़ास बात ये है कि वो अच्छी कलाकार है पर बुरी बात है कि उनको इसका आभास हैं। शबाना लंबे समय बाद पुराने रंग में हैं। इस फ़िल्म में सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है। फ़िल्म को शानदार तरीके से फिल्माया गया हैं । फ़िल्म यह सन्देश देने का भी प्रयास जरती है कि देश का पता नहीं पर सारे देशवासी अच्छे ही होते है, चाहे उसका नाम कुछ भी क्यों ना हो।फ़िल्म ये भी बताती है की आतंकवादी कितने कमज़ोर और डरे हुए किरदार होते है जो अपनी मज़बूरी किसी से बयान तक नहीं कर पाते। ये एक ऐसी कोम है जिनसे उनकी कोम तक वास्ता नहीं रखती।

भाषा हमेशा महत्व रखती है धीरे बोलो तो प्रेम और चिल्ला के बोलो तो आतंक का सूचक बन जाती है।

फ़िल्म ये भी बताती है की आतंकवादी कितने कमज़ोर और डरे हुए किरदार होते है जो अपनी मज़बूरी किसी से बयान तक नहीं कर पाते। ये एक ऐसी कोम है जिनसे उनकी कोम तक वास्ता नहीं रखती। ये एक डरी हुई मज़बूर हालात के लोग है जिनका इंसानियत से इंसान होने के बावजूद हक़ छीन लिया जाता है। ये पगलाये जानवर इंसानियत के दायरे में आकर भी नहीं आते और इसके लिए उनकी शिक्षा और संस्कार जिम्मेदार है।

फ़िल्म बताती है

की यदि आतंकवादियो को थोडा समय दे तो वे अपने पागलपन को छोड़ कर मानवता पर विचार कर सकते है और बस ये ही हमारी जंग हैं। फ़िल्म बस आतंकवाद के खतरे ही नहीं बताती बल्कि दहेज़ के खतरे पर भी ध्यानाकर्षण करती हैं। यह फ़िल्म भारतीय औरतों की मानसिकता पर भी प्रकाश डालती है और बतलाती है कि वे कितनी महान हैं

फ़िल्म थोड़ी डल है लेकिन बेहतर है। इसे देख लीजिये क्योकि नीरजा रोज़ पैदा नहीं होती।फ़िल्म यूट्यूब व अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर उपलब्ध है। फ़िल्म 2015 में रिलीज हुई थी।

सादर।

सुरेन्द्र सिंह चौहान।

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