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| On 1 year ago

Poshal: You would not agree but there used to be schools like this.

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पोशाल : आप मानोगे नही लेकिन ऐसे भी स्कूल होते थे। भाग -1

वर्तमान एजुकेशन सिस्टम में अनेक प्रकार की सुविधाएं विद्यार्थियों हेतु उपलब्ध है सिवा " गुरोसा की पोशाल " के। इन पोशालो का संचालन स्वतंत्र रूप से निजी स्तर पर किया जाता था। ये अपने आप मे कम्प्लीट स्कूल नही होते थे बल्कि ये पूर्व प्राथमिक शिक्षा केन्द्र थे। कमजोर विद्यार्थी ग्रीष्मावकाश में बेसिक पढाई करते थे अथवा पुनरावृत्ति करते थे।

गुरोसा की पोशाल

गुरोसा की पोशाल

इकहरे बदन के हमारे गुरोसा पोलियो के कारण दोनों पैरों से अपाहिज थे। उनकी पोशाल यानी"एकल अध्यापक सामाजिक मान्यता प्राप्त स्कूल" उनके छोटे से घर के बाहरी कमरे में संचालित होती थी। एक 10 गुना 16 के लंबे कमरे में छोटे शिशुओं से कदरन बड़े 35-40 बच्चे एक साथ बैठ कर पढ़ते थे।

कठोर अनुशासन

कठोर अनुशासन
उस स्कूल की सबसे बड़ी बात उसका डिसिप्लिन था। उस लंबूतरे कमरे में सिर्फ और सिर्फ गुरोसा का कानून चलता था। गृहकार्य, कक्षाकार्य, रटन्त कार्य , सहभागी कार्य पूरा नही करने पर दण्ड देना सिर्फ उनकी मर्जी व स्टूडेंट की शारिरिक दम-खम पर मुनहसर था। एक ही गलती पर वो किसी पर बेइंतहा जुल्म भी ढा सकते थे वही दूसरे को पुचकार कर समझा भी सकते थे।

स्वतंत्र पाठ्यक्रम

अपना कॅरिकुलम।
पोशाल का मतलब था कि जितना गुरोसा को खुद को ज्ञान था उतना ही विद्यार्थियों को सिखाया जाना। जब विद्यार्थियों का ज्ञान कमोबेश गुरोसा के बराबर हो जाता तो वे औपचारिक शिक्षा हेतु नजदीकी स्कूल में दाखिला पा जाते। उनके पोशाल में भाषा, गणित व सामाजिक अध्ययन ही पढाया जाता था। भाषा मे अक्षर ज्ञान, वाक्य विन्यास व सुलेख पर बल दिया जाता था। गणित में जोड़, बाकी, गुना व भाग के साथ ही पहाड़ो को सिखाया जाता था।

न्यूनतम औपचारिकता

कोई नियम नही।
गली-मोहल्ले में संचालित इन पोशालो मे संचालन हेतु कोई नियम, औपचारिकता, कानून व राजकीय नियंत्रण नही था। बस बच्चे को भर्ती करा दो और गुरोसा का अध्यापन आरम्भ। कोई एडमिशन टेस्ट नही, कोई नियत शुल्क नही व कोई टीसी नही।

समय की पाबंदी

समय की पाबंदी।
सुबह ठीक 7 बजे से 12 बजे तक इनका संचालन होता था। बच्चे स्वयममेव समय पर पहुँच जाते। मध्यांतर 30 मिनट का होता था लेकिन गुरोसा के अनुशासन व दण्ड के डर से बच्चे 2 मिनट पहले पहुँच जाते थे। रविवार को हर विद्यार्थी गुरोसा के खोफ से मुक्त था बाकी दिनों में होली-दीपावली के अलावा छुट्टी असम्भव थी। गुरोसा बीमार पड़ जाए तो बात अलग थी लेकिन सामान्य जीवन शैली व सादा दिनचर्या के चलते गुरोसा का बीमार पड़ना "दूर की कौड़ी" था।

पूर्व प्राथमिक शिक्षा का बेजोड़ मॉडल

बेसिक शिक्षा का बेजोड़ नमूना।
बहुत अल्प समय मे इन "पोशालो" के विद्यार्थियों को 30 तक के पहाड़े, गणित के बेसिक्स, हिंदी वर्णमाला, वाक्य विन्यास इत्यादि का ज्ञान हो जाता था। रटन्त विद्या व बार-बार पुनरावृत्ति के कारण अर्जित ज्ञान स्थाई सम्पति बन जाता था। इन सबसे बढ़कर विद्यार्थियों के हस्तलेख में आशातीत सुधार होता था।

शिक्षा मनोवैज्ञानिक का पूर्ण पालन

बस्ते के बोझ से दूर।
इन पोशालो में बस्ते के नाम पर सिर्फ "एक पाटी व बरते के चंद टुकड़े" विद्यार्थियों को कैरी करने होते थे। कोई पुस्तक नही कोई, अभ्यास पुस्तिका नही व कोई शैक्षिक सामग्री की आवश्यकता नही।

इंटीग्रेटेड एजुकेशनल टेक्निक

बेजोड़ शिक्षण विधा।
इन "पोशालो" की शिक्षण विधा कमोबेश सभी आधुनिक टीचिंग स्किल्स व टेक्नोलॉजी का "कॉम्बो पैकेज" होती थी। इनमे शिक्षक एक साथ मल्टीलेवल व मल्टीग्रेड टीचिंग के साथ इंडिविजुअल डिफरेंस को ध्यान में रखते हुए पर्सनल अटेंशन के बेसिक्स को लेकर शिक्षण करवाते थे। यहाँ विद्यार्थियों को एकल व समूह दोनों प्रकार से शिक्षण अनुभव दिया जाता था। प्रत्येक दिन सामुहिक पाठ के द्वारा पहाड़ो, बारहखड़ी इत्यादि का समवेत पाठ किया जाता था।

न्यूनतम भौतिक संसाधनों की आवश्यकता

जीरो कोस्ट सामुदायिक सरोकारी सिस्टम।
इन स्कूलों की कोई नियत फीस नही थी। ये पोशाल व्यक्तिगत सम्बन्धों व सामुदायिक हितों से सम्बंधित थे। धनाढ्य वर्ग थोड़ा अधिक दे देते जिनसे गुरोसा का जीवन बसर हो जाता व कमजोर तबके पर कोई आर्थिंक भार नही पड़ता था। स्कूल टाइम्नके बाद गुरोसा भी कुछ काम करते थी जिसके परिणामस्वरूप उनका जीवनयापन हो जाता था।

ऐसे पोशाल कदरन हर जिलों में संचालित थे। आप शायद नही मानेंगे लेकिन यहाँ के विद्यार्थियों को किसी सर्टिफिकेट के अभाव में आप बेशक "अनपढ़" मान ले लेकिन उनकी गणित व हिंदी भाषा पर बेजोड़ पकड़ थी।