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Privileged Poor : A New Social Subject, a New Reality.

"प्रिविलेज्ड पुअर": एक नया सोशल सब्जेक्ट, एक नई हकीकत।

सामाजिक अध्धयन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जहाँ आप किसी भी विषय को समाप्त करते है, दूसरा विश्लेषक उसे नए सिरे से आरम्भ कर सकता है। समाज विज्ञान के क्षेत्र में अनेक नए शब्द आते है, उनकी परिभाषा गठित की जाती है एवम वे अध्ययन में शामिल हो जाते है।

अगर हम थोड़ा सा गौर से देखे तो समझ सकते है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कुछ लोग ऐसे होते है जो मुख्य धारा में दिखाई देते है

लेकिन उनका वजूद नही होता। ऐसा वर्ग सिर्फ लिए गए निर्णयों की अनुपालना करता है उसको निर्णयन प्रक्रिया में सम्मिलित नहीं किया जाता है।

पश्चिम जगत में छपी एक न्यूज़ में इस शब्द "प्रिविलेज्ड पुअर" को उन विद्यार्थियों के संदर्भ में प्रयुक्त किया गया है जो कि विभिन्न सहायता केंद्रों के कारण इन विशिष्ट महाविद्यालयों में प्रवेश तो ले लेते है परंतु उनका अस्तित्व उन शक्तिशाली विद्यार्थियों की हजूरी में निकलता है जिनका की इन केंद्रों पर वास्तविक नियंत्रण हो।

पाश्चात्य देशों विशेषकर अमेरिकी विश्विद्यालयों में हुई शोध इस तरफ संकेत

देती है हालिया अध्ययनों के अनुसार विद्यार्थियों के निष्पादन उपलब्धि में अब नस्ली वर्ग भेद का असर कम हो रहा है लेकिन आर्थिक कारक अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हो रहा है।

एक धनाढ्य वर्ग से आने वाला विद्यार्थी कमजोर आयवर्ग वाले विद्यार्थियों की तुलना में अपनी कुशलता विकास हेतु पहले ही काफी संसाधनों का विनियोग कर चुके होते है एवम यह विनियोग निरन्तर जारी रहता है। इस निरन्तर विनियोग के कारणों से उनमें आत्मविश्वास व अभिव्यक्ति निरन्तर बढ़ती जाती है।

दूसरी तरफ, प्रिविलेज्ड पुअर वर्ग बढ़ी मुश्किल से नवीन संसार मे अपने अस्तित्व को

बनाये रखने की जद्दोजहद में न्यूनतम कुशलता ही प्राप्त कर पा रहे है। व्यक्तित्व का धीमी दर से निर्माण उनके व्यक्तित्व एवम आत्मविश्वास को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करते है।

हकीकत बन कर उभर रहे इस वर्ग "प्रिविलेज्ड पुअर" की प्रत्यक्ष पहचान एवम सम्बलन का कोई तरीका इस समय इन संस्थाओं के सामने नही है एवम ना ही इस दिशा में कार्य हेतु उत्सुकता दिखा रहे है क्योंकि पहले ही शिक्षा क्षेत्र में मूलभूत विनियोग अत्यंत उच्च स्तर को छू चुका है।

"प्रिविलेज्ड पुअर" आज की हकीकत है एवम यह सच्चाई कल के

समाज मे निश्चित रूप से दिखाई देगी। समाज मे ऐसे दोहरे चरित्रों की भरमार दिखाई देगी जो सिर्फ स्वयम के अस्तित्व की सुरक्षा को सुनिश्चित करेंगे एवम जानबूझकर भी वे शाश्वत मूल्यों से नजर चुरा लेंगे।

आज संस्था प्रधानों का एक दायित्व बनता जा रहा है कि वे प्रिविलेज्ड पुअर केटेगरी में झुंझते समूह को पहचानने के साथ ही उनके विकास की तरफ एक ऐसी योजना तैयार करे जो कि संसाधनों की उपलब्धता पर आधारित नही होकर कुशलता की कसौटी पर खरी उतरती हो।