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आठवें भाव में राहु का फल | स्वास्थ्य, करियर और धन

आठवें भाव में राहु होने से जातिका शरीर से पुष्ट, पुष्टदेही, नीरोग होती है। परदेस में रहने वाली होती है।अष्टम में राहु होने से जातिका श्रेष्ठकर्म करती है। जातिका को पुत्र सन्तति थोड़ी होती है। गाय आदि पशुओं की समृद्धि प्राप्त होती है।

आठवें भाव में राहु का फल

आठवें भाव में राहु का शुभ फल (Positive Results of Rahu in 8th House in Astrology)

  • आठवें भाव में राहु (Rahu in 8th House) होने से जातिका शरीर से पुष्ट, पुष्टदेही, नीरोग होती है। परदेस में रहने वाली होती है।
  • आठवें भाव में राहु हो तो जातिका राजाओं तथा पण्डितों से आदरणीय, माननीय और प्रशंसित होती है। कदाचित् राजा से प्रचुर धन का लाभ होता है और कभी धन का नाश भी होता है। जातिका को व्याकुल अर्थात् विजित शत्रु से लाभ होता है। जातिका धनाढ़्य
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    होती हैं।
  • अष्टमभाव में राहु हो तो जातिका राजा द्वारा सम्मानित होती है। अष्टम में राहु होने से जातिका श्रेष्ठकर्म करती है। जातिका को पुत्र सन्तति थोड़ी होती है। गाय आदि पशुओं की समृद्धि प्राप्त होती है। जातिका बुढ़ापे में सुखी होती है। मिथुन में राहु होने से महापराक्रमी और यशस्वी होती है। द्रव्यलाभ होने की संभावना होती है।
  • राहु से पति घन, किसी सम्बन्धी के वसीयत का धन प्राप्त होता है। किन्तु इस धन की प्राप्ति में कई एक उलझनें भी आती हैं। फायदा तात्कालिक होता है। पति की मृत्यु पत्नि से पहले होती है। मृत्यु सावधनता में होती है। मृत्यु का ज्ञान कुछ काल पहले हो जाता है। 26 से 36 वें वर्ष तक भाग्योदय होता है।

आठवें भाव में राहु का अशुभ फल (Negative Results of Rahu in 8th House in Astrology)

  • आठवें भाव में राहु (Rahu in 8th House) होने से जातिका दुर्बल देह, भीरु, आलसी, उतावली, अतिधूर्त, दु:खी, निर्दय, भाग्यहीन और स्वभाव से कामी और वाचाल होती है।

  • अष्टमस्थ राहु से जातिका क्रोधी, व्यर्थभाषी, मूर्ख, कुकृत्य कर्ता, अपवित्र काम करने वाली, चोर, ढ़ीठ, कातर, मायावी होती है।

  • अष्टमराहु से जातिका अल्पायु वातरोगी और विकल होती है। जातिका का भाग्योदय तो एकबार होता है किन्तु हानि बार-बार होती रहती है। कभी भाग्योदय तो कभी हानि होती है। अष्टमस्थ राहु से आयु का पहला भाग कष्टकारक होता है। अशुभ सम्बन्ध से राहु बुढ़ापे में भी कष्टकारक होता है। पूर्वार्जित धन अर्थात् पैतृकधन (पिता के धन) से वंचित रहती है। पैतृक धन ओर पैतृक सम्पत्ति नहीं मिलती है। निर्धन और दरिद्र होती है। भाई-बन्धुओं से पीडि़त रहना जातिका के जीवन की विडम्बना बन जाती है। जातिका के कुटुम्ब

    के लोग छोड़ जाते हैं।
  • राहु अष्टमभाव में होने से सज्जन लोग अपनी इच्छा से अकारण ही छोड़ देते हैं। अष्टम में राहु होने से जातिका खर्चीली, भाइयों से झगड़ने वाली, प्रवासी तथा पुरूष सुखहीन होती है।

  • अष्टमभाव में राहु होने से पतिसुख, पुत्रसुख, मान और विद्यासुख नहीं मिलते। लोग जातिका की निन्दा करते हैं।

  • आठवें स्थान मे राहु जातिका को दीर्घ सूत्री, रक्त पित्त की रोगी, उदररोगी बनाता है। सदा बीमार रहना जातिका की नियति है। अष्टम भाव में राहु से जातिका को गुप्तरोग (गुदरोग) मस्से, भगंदर जैसे रोग होते हैं, प्रमेह और अंडकोष वृद्धि जैसी व्याधियां पीडि़त करती हैं। गुप्तरोग, प्रमेहरोग तथा वृषणवृद्धि रोग होते हैं।

  • बहुत परिश्रम करने से जातिका के पेट में वायुगोला या गुल्म आदि रोग होते हैं। ददु्ररोग (दाद-खुजली की बीमारी) से युक्त होती है। चोरी का इलजाम (अपवाद) लगता है।

    कष्ट और यातना होती है। जातिका को धनप्राप्ति नहीं होती। अदम्य धनपिपासा से रिश्वत ली जाती है किन्तु रहस्योद्घाटन हो जाता है और बन्धन होता है।
  • जातिका पति से पहले मृत्यु पाती है-मृत्यु समय सावधनता नहीं रहती-बेहोशी में मृत्यु होती है। भाग्योदय नहीं होता-स्वतन्त्र व्यवसाय में लाभ होने से नौकरी करनी पड़ती है।

  • राहु अष्टमभाव में होने से जातिका बहुत देर बीमार रहकर 32 वें वर्ष में मरता है या 32 वें वर्ष में संकट आता है। पुरुष राशि का राहु अच्छा नहीं होता, पति अच्छा नहीं मिलता-विश्वासपात्र नहीं होता-कलहप्रिय होता है। प्राय: सभी आचार्यो के मत में अष्टमभाव का राहु अशुभफल देता है।