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| On 3 years ago

Rajasthan Education: A unique donor, Bhamasha, Jagat Mama of Jayal, Nagaur, Rajasthan

एक अनोखा दानदाता : जायल का जगत मामा।

शिक्षा विभाग उन हजारों भामाशाहों का सदैव ऋणी है जिन्होने अपनी कठोर मेहनत से अर्जित धनराशि का निवेश राजकीय विद्यालयों के भौतिक उन्नयन व विद्यार्थियों को शैक्षिक, सहशैक्षिक व खेलकूद सुविधाओं के विकास हेतु किया।

सामाजिक सरोकारों के अनेक रूप है। स्कूली विद्यार्थियों से एक विशेष लगाव का अनुपम उदाहरण है जायल के निवासी श्री पूर्णाराम गोदारा। इन्हें स्थानीय वाशिंदे जगत मामा कह कर स्नेह से बुलाते है। आइये, इस अनोखे "जगत मामा" के बारे में जानते है।

जगत मामा: सबको कहता है "भान्जा"

ये है जगत मामा , जिनका नाम शायद आपने भी सुना होगा।

आज दुनिया जहाँ पल - पल पैसे के पीछे दोड रही है , वहीँ जगत मामा हर पल पैसे को पानी की तरह बहा रहे है। उन्हें पैसा बाँटने की धुन सी है। सिर पर दुधिया रंग का साफा, खाकी रंग में फटी सी धोती , नोटों से भरा थेला दबाये अपने हाथ मे थामे जगत मामा जब लाठी के सहारे तेजी से चलते है तो एक अत्यंत साधारण व्यक्ति लगते है, लेकिन दिल के वे बहुत अमीर व प्यार के सागर से भरे है। इनके चेहरे पर झुर्रिया व सफ़ेद बाल उनके बुढ़ापे की कहानी कहते है लेकिन मामा जिस स्कूल में दाखिल हो जाते है , उस विद्यालय का माहौल बदल जाता है।

सबको देता है प्रोत्साहन

85 वर्षीय जगत मामा की दिनचर्या अलसुबह शुरू होती है और देर शाम जहाँ कही आसरा मिल जाये वहीँ रुक जाती है। मामा अचानक किसी स्कूल में जा पहुचते है और बच्चों के बीच ऐसे चेहरे पहचानने की कोशिश करते

है जो आगे जाकर कुछ बन सके , फिर उन्हें अपनी मर्जी से नकद इनाम देते है। पिछले 70 साल में मामा बच्चो को 100 व 500 के कड़क नोटों के रूप में विपुल राशि बाँट चुके है। कभी - कभी स्कूली खेल कूद प्रतियोगिता में हलवा पूरी भी बनावा देते है। प्रवेश फीस से लेकर किताबे , स्टेशनरी , बैग व छात्रवर्ती तक की व्यवस्था कर मामा अब तक हजारो लडको को स्कूल से जोड़ चुके है।

संस्था प्रधान करते है प्रमाणित

करीब 85 वर्ष के जगत मामा ने हजारों स्कूलों में करोड़ों रुपए नकद और पुरस्कार के रुप में बच्चों में बांट दिए। किस विद्यालय में कितनी राशि बच्चों में बांटी, इसका प्रमाण वे रजिस्टरों में लिखकर शाला प्रधान से मय हस्ताक्षर व मोहर के प्रमाणित भी कराते हैं। उनके पास रखे ऐसे दर्जनों रजिस्टरों को देखा जाए तो इन्होंने अब तक करीब करोड़ो में राशि बांटी है।

गाँव-गाँव स्कूलों में फिरते रहने के कारण मामा ने

शादी भी नही की। अपनी 300 बीघा जमीन भी मामा ने गाँव की स्कूल, ट्रस्ट व गौशाला को निमित्त कर दी।

बच्चो में निस्वार्थ प्यार बाँटने वाला यह शख्स हर किसी छोटे-बड़े को 'भानिया' कहता है और लोग इन्हें बच्चे से लेकर बूढ़े तक ''जगतमामा '' ही कहते है।

इनकी जीवन शैली पर एक गाना खरा उतरता है, आप भी गुनगुनाइए।

किसी की मुस्कुराहटो पर हो निसार,

किसी का दर्द मिल सके तो ले उठा,

ये जीना इसी का नाम है।

ये जीना इसी का नाम है।