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| On 1 year ago

Rama Shyama: It's time to enjoy with family and friends.

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रामा श्यामा : आज अपनों से मिल के हो जाइए निहाल।

इतनी चिल्ल पों मचा कर घर की साफ-सफाई की। भीड़-भाड़ के बावजूद अंदुरुनी शहर के हलवाई की दुकान से मिठाई व नामचीन दुकान से नमकीन खरीदे। सुबह-सुबह जल्दी जागकर सफेद झक्क चोला-पायजामा पहना और पूरे घर मे कोहराम मचाकर मेमसाब को तैयार किया व बच्चों को जगाकर माना। आज रामा-श्यामा जो है।

मेमसाब व बच्चों को समझाया कि जो भी मेहमान आये उनकों बड़े एहतराम से माकूल जबाब देने है इस पर मेमसाब ने बड़ी कुटिलता से पूछा " सब ठीक है पर आएगा कौन?" उनके मुँह से निकला वाक्य निर्विघ्न मेरे ह्र्दय के पार हो गया। उन्होंने सच ही तो कहा है। माँ-पिताजी के गुजरने के बाद से हर साल यहीं आलम है।

रामा-श्यामा पर धोबी, चौकीदार, सफाईकर्मी, डाक वाले व अन्य आते है और गेट से अपनी बख्शीश लेकर चले जाते है लेकिन सजा-सजाया बैठकखाना और टेबल पर सजी मिठाई की थाली मेहमानों के इन्तेजार में उकता जाती है। शाम को थक-हार कर हम बैठक में ही उनींदे होकर थोड़ा पसर जाते है। दोपहर के खाने तक मेहमाननवाजी की तमन्ना को दरकिनार कर रोजमर्रा के काम में लिप्त हो जाते हैं।

आखिर क्यों? अब मेहमान नही आते? सीधा सा प्रश्न व उसका सीधा सा जबाब है कि पहले मेहमान हमसे नही बल्कि हमारे माता-पिता से मिलने आते थे। उनसे मिलने आते थे जो उनके हर सुख-दुःख में शरीक होते थे, जो हर हाल में उनके खैर-ख्वार थे, जो दिल से रिश्तों को सींचते थे।

हमसे मिलने भला आएगा कौन? हम साल भर अपने सेलेरी पैकेज को अशुक्ष्ण रखने की कोशिश में खुद के घर भी देर रात पहुंचते हैं। रिश्तेदारों की खैर-खबर अखबार के तीसरे पेज में देखते है। सोशल मीडिया पर उन लोगो के "लाइक" पर जानिसार करते है जो वास्तविक जीवन में सामने से गुजरे तो हम उनको जानते भी नही।

खैर। बीती ताही बिसारिये अब आगे की सुध ले। मैं तो चला आज अपने संगी-साथियों, रिश्ते-नातेदारों, मित्रो से मिलने उनके बूढ़े माता-पिता का आशीर्वाद लेने। इस बार नही तो अगली बार ही सही मेरे भी बैठकखाने को मेहमाननवाजी के लिए तरसना नही पड़ेगा।

आप क्या कर रहे है?