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| On 3 years ago

Rights of Labour in Rajasthan: Government Schemes, Various Acts and facilities.

श्रमिकों के अधिकार

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श्रमिक समाज का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। राष्ट्र के निर्माण विकास एवं अर्थव्यवस्था में श्रमिकों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। देश की विकसित
अर्थव्यवस्था श्रमिकों की अच्छी स्थिति पर निर्भर करती है। श्रमिकों की बेहतर कार्य व्यवस्था एवं उनके कल्याण के लिए कई कानून बनाये गये हैं तथा केन्द्र/राज्यसरकारों द्वारा कई योजनायें प्रारम्भ की गई हैं। कुछ प्रमुख कानून व योजनायें निम्न हैं-

असंगठित श्रमिकों के कल्याण हेतु कानून व योजनायें!

श्रमिकों को उचित व न्यूनतम मजदूरी दिलाना सुनिश्चित करने के अतिरिक्त बंधुआ व ठेका मजदूर प्रथा को समाप्त करने हेतु, मजदूर महिलाओं को प्रसूति के दौरान विभिन्न सुविधायें प्रदान करने के लिए न्यूनतम मजदूरी कानून 1948 बंधुआ मजदूर प्रथा (उन्मूलन) अधिनियम, 1976, ठेका मजदूर (उन्मूलन एवं विनियमन) अधिनियम, 1970 व मातृत्व अभिलाभ अधिनियम1961 बनाये गये हैं। मजदूरों का एक बड़ा तबका भवन निर्माण से जुड़ा हुआ है!जिनके कल्याण के लिए भवन और अन्य निर्माण श्रमिक अधिनियम, 1996 अधिनियम बनाया गया है। इस अधिनियम मे मजदूरों के स्वास्थ्य व बीमा के लिए प्रावधान करने के अतिरिक्त उनके बच्चों की शिक्षा हेतु सहायता भी दी जाती है।

राजस्थान सरकार की योजनायें-

राजस्थान में असंगठित प्रकार के श्रमिकों की संख्या काफी है। ऐसे श्रमिकों के दुर्घटना, बीमा, स्वास्थ्य एवं शिक्षा के लिये निम्न प्रमुख योजनायें बनाई गई हैं:

निर्माण श्रमिकों के बच्चों हेतु छात्रावास :

निर्माण श्रमिकों के बच्चों हेतु प्रत्येक जिले में एक-एक करोड़ रुपए की लागत से छात्रावासों के निर्माण कार्य करने की योजना है।

दुर्घटना मृत्यु पर सहायता राशि में वृद्धि :

निर्माण श्रमिक की दुर्घटना में मृत्यु होने पर पूर्व में 75 हजार रुपए की राशि दी जाती थी जिसे अब बढ़ाकर 5 लाख रुपए किया गया है।

चिकित्सा अनुदान राशि में वृद्धि:

चिकित्सा अनुदान की राशि को 50 हजार रुपए से बढ़ाकर 1 लाख रुपए किया गया है।

निर्माण श्रमिकों के बच्चों को दोगुनी छात्रवृत्ति :

निर्माण श्रमिकों के पुत्र-पुत्रियों को वर्तमान में दी जा रही छात्रवृत्ति दर बढ़ाकर दुगुनी की गई है। अब कक्षा 6 से 8 के छात्रों को 1000 रुपए व छत्राओं को 1500 रुपए कक्षा 9 से 12 के छात्रों को 2000 रुपए व छात्राओं को 2400 रुपए स्नातक स्तर पर छात्रों को 3000 रुपए व छात्राओं को 4000 रुपए डिप्लोमा स्तर पर छात्रों को 4000 रुपए व छात्राओं को 5000 रूपए एवं स्नातकोत्तर स्तर पर छात्रों को 6000 रुपए व छात्राओं को 8000 रुपए की वार्षिक छात्रवृत्ति संबंधित परीक्षा उत्तीर्ण करने पर देय है।

प्रसूति सहायता योजना :

महिला हिताधिकारी को दो प्रसव के लिए प्रति प्रसव 6000 रुपए प्रसूति सहायता तथा जननी सुरक्षा योजना में नकद हितलाभ प्राप्त न होने पर 1000 रुपए अतिरिक्त सहायता।

निर्माण श्रमिकों के लिए गंभीर बीमारियों पर व्यय का पुनर्भरण योजना,2011:

कैंसर ट्यूमर, क्षयहृदय रोग व अन्य चयनित गंभीर बीमारियों में हिताधिकारी के उपचार पर व्यय की गई राशि का 50 प्रतिशत अथवा 50,000 रुपए असंगठित क्षेत्रों के श्रमिकों एवं खेतिहर मजदूरों के कल्याण कार्यक्रमों केन्द्र सरकार द्वारा असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम2008 बनाया गया है ।
जिसका उददेश्य असंगठित क्षेत्रों के 20 व्यवसायों में कार्यरत कामगारों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है।

राजस्थान विश्वकर्मा गैर-संगठित कामगार अंशदायी पेन्शन योजना

असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के जीवन सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण योजना है जिसके तहत श्रमिकों को पेंशन लाभ दिया जाता है।

संगठित क्षेत्र के श्रमिकों के कल्याण हेतु योजनाएं:

संगठित क्षेत्र के श्रमिकों के कल्याण हेतु सामाजिक सुरक्षा को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है :

(1) सामाजिक बीमा और

(2) सामाजिक सहायता।

सामाजिक बीमा की योजनाओं के लिए प्राय: कर्मचारियों, नियोजकों और राज्य द्वारा अंशदान किया जाता है। इन योजनाओं से मिलने वाले लाभ प्राय: कर्मचारियों जिनका बीमा होता है, उनके योगदान से जुड़ा होता है। सामाजिक सहायता की योजनाओं के अन्तर्गत गरीब और जरूरतमन्द लोगों को आर्थिक सहायता दी जाती है और इसके लिए किसी तरह के योगदान की शर्त नहीं होती है। संगठित क्षेत्र के श्रमिकों से संबंधित प्रमुख कानूनी प्रावधान एवं योजनाएं निम्न हैं:

कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 (Employee's compensation

Act, 1923)

भारत में सामाजिक सुरक्षा की शुरूआत 1923 में हुई जब 'श्रमिक क्षतिपूर्ति अधिनियम" पारित किया गया। इस अधिनियम के अन्तर्गत केवल कारखानों और दूसरे उद्योगों में काम करने वाले श्रमिक आते हैं और इसमें औद्योगिक दुर्घटना और काम करते हुए व्यावसायिक रोग लग जाने की स्थिति में श्रमिकों और उनके परिवार के लोगों को हर्जाने की व्यवस्था है। श्रमिक क्षतिपूर्ति अधिनियम में मृत्यु ,स्थायी और
अस्थायी रूप से विकलांग होने की स्थिति में अलग-अलग दरों पर क्षतिपूर्ति की व्यवस्था है! 23 दिसम्बर 2009 को किए गए संशोधन में श्रमिक क्षतिपूर्ति अधिनियम का नाम ‘कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम" कर दिया गया है।

मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (Maternity BenefitAct, 1961)

मातृत्व लाभ अधिनियम1961 महिला श्रमिकों को मातृत्व लाभ की व्यवस्था करता है। इस अधिनियम के अन्तर्गत महिला श्रमिकों को बच्चे के जन्म से 6 सप्ताह पहले और 6 सप्ताह बाद तक मजदूरी सहित छुट्टी पाने का अधिकार है। जिन महिला के श्रमिकों को कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम1948 के अन्तर्गत सामाजिक सुरक्षा मिली हुई है वे मातृत्व लाभ अधिनियम1961 के अन्तर्गत नहीं आती हैं। मातृत्व लाभ अधिनियम1961 में लाभ प्राप्त करने के लिए मजदूरी के बारे में कोई प्रतिबन्ध नहीं हैं।

कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (Employee's state InsuranceAct, 1948)

इस अधिनियम के अन्तर्गत बिजली से चलने वाले ऐसे गैर-मौसमी कारखाने
(non-seasonal factories) जिनमें 10 या अधिक श्रमिक काम करते हों तथा बिजली से न चलने वाले ऐसे कारखाने जिनमें 20 या अधिक श्रमिक काम करते हों, आते हैं।
1 मार्च 2010 से इस अधिनियम के अन्तर्गत उन कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा लाभ प्राप्त है जिनकी मासिक मजदूरी 15000 रुपए से कम है।

कर्मचारी भविष्य-निधि तथा विविध प्रावधान अधिनियम1952 (Employees Provident Fund and Miscellaneous

Provisions Act, 1952)

कर्मचारी भविष्य निधि तथा विविध प्रावधान अधिनियम, 1952 के अन्तर्गत कर्मचारियों को भविष्य निधि, परिवार पेंशन तथा जमाओं से जुड़े बीमा (Deposit linked insurance) के रूप में सेवानिवृत्ति लाभ की व्यवस्था की गई है।

कर्मचारी भविष्य-निधि योजना ( Employee's Provident Fund Scheme)

कर्मचारी भविष्य-निधि योजना कर्मचारियों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में एक प्रयास है। इसके अधीन अनिवार्य बचत (Compulsory saving) की व्यवस्था है। कर्मचारी भविष्य-निधि योजना के अधीन एक मृत्यु राहत फंड(Death relief fund) स्थापित किया गया है। इसके अधीन सदस्य की मृत्यु होने पर उसके उत्तराधिकारी को आर्थिक सहायता देने की व्यवस्था है।
अन्य योजनाओं में कर्मचारी जमा बीमा योजना तथा ग्रेच्युटी भुगतान योजना हैं जो

ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम 1972 (Payment of Gratuity Act,1972) से संचालित होती हैं।

न्यूनतम पारिश्रमिक अधिनियम (Minimum
Wages Act, 1948) आजादी के बाद श्रमिक सुधारों की दिशा में पहला महत्वपूर्ण प्रयास था। वहीं औद्योगिक श्रमिकों के कल्याण के लिए

उद्योग अधिनियम 1951 (Industries Regulation and Development Act,
1951) मील का पत्थर है। कार्मिकों को अतिरिक्त लाभ में से बोनस दिलाने हेतु
बोनस भुगतान अधिनियम1965 (Payment of Bonus Act1965) लागू किया गया है। इसी प्रकार कर्मचारी पेंशन योजना 1995 भी महत्वपूर्ण है।

इतने सारे कानून व योजनायें बनाये जाने के बावजूद भी श्रमिकों की दशा में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। श्रमिकों को उनके परिश्रम के अनुरूप वेतन नहीं मिलता है। महिला व पुरूष श्रमिकों के वेतन में असमानता असंतोष का बडा कारण है। कार्यस्थल पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। श्रमिकों के लिए दिन रात मेहनत करने पर भी बच्चों को उचित शिक्षा दिलाना व परिवार का पालन करना कठिन है।

खनन क्षेत्र के श्रमिक सिलीकोसिस, ट्यूबरकुलोसिस व अस्थमा जैसी गम्भीर रोजगार जनित बीमारियों से पीड़ित हैं जिसकी भयावह परिणिति गाव की अधिकांश महिलाओं के असमय विधवा के रूप

में सामने आ रही है। संगठित क्षेत्र के अपेक्षा असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की स्थिति और भी खराब है जो अधिकांशत: भवन निर्माण जैसे अस्थाई कार्यों में नियोजित होते हैं जिनका कार्यस्थल बदलता रहता है।संगठन के अभाव में वे शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की स्थिति में नहीं बढते मशीनीकरण के दौर में नियमित कार्य नहीं मिलने से अधिकांश श्रमिकों के समक्ष आंशिक बेरोजगारी की स्थिति रहती है जो उन्हें नियोजकों की शोषणकारी शर्तों पर कार्य करने पर विवश करती है। ऐसी हालातों में श्रमिकों के जीवन में उल्लास, उमंग एवं संतुष्टि का बेहद अभाव है जिससे उनकी कार्यक्षमता भी निरंतर गिर रही है जो अर्थव्यवस्था के साथ साथ समाज के सर्वागीण विकास के लिये घातक है, अत: श्रमिकों की स्थिति में सुधार किया जाना समय की माँग है।

उक्त कानूनों और योजनाओं का लाभ पूरी तरह श्रमिकों को नहीं मिल पाने का प्रमुख कारण अशिक्षा व जानकारी का अभाव है जिसके चलते श्रमिक इन कानूनों व योजनाओं का लाभ प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। इसे दृष्टिगत रखते हुए राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने पूरे राज्य में जिला एवं तालुका स्तर पर पैनल अधिवक्ता व पैरालीगल वोलेन्टीयर की टीमें बनाई है जो श्रमिकों को उनके अधिकारों तथा उनके कल्याण के लिए सरकार द्वारा बनाई गई योजनाओं की जानकारी देती हैं और इन
योजनाओं का लाभ प्राप्त करने में उनकी पूरी सहायता करती हैं।

श्रमिकों की समस्याओं के समाधान के लिए सभी संस्थाओं को मिलकर चौतरफा एकीकृत प्रयास करने की आवश्यकता है। प्राथमिकता इस बात की हैं कि श्रमिकों को उनके अधिकारों व कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी दी जाये तथा इन योजनाओं का लाभ उठाने के लिए आवश्यक सहायता प्रदान की जावे। विधिक सेवा संस्थायें इस दिशा में प्रयास कर रही हैं तथा श्रमिकों के हितों के लिए प्रतिबद्ध हैं।

(विधिक चेतना अभियान -2018)