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| On 3 years ago

Saluting the Heroes of Nation "मस्तक से लगा के रखो ,कफ़न, देश के शहीदों का"।

"मस्तक से लगा के रखो ,कफ़न, देश के शहीदों का"।

स्वार्थ तब तक स्वीकार्य है जब तक कि वह रोटी, कपड़ा और मकान तक सीमित हो। आज समाज मे बहुजन की महत्वाकांक्षा इनसे बहुत आगे बढ़ गयी है। भौतिकवाद चरम पर है एवम इसने शिक्षा व स्वास्थ्य को भी धनोर्पाजन का जरिया बना लिया है।

इतिहास के पन्ने पलटे तो भारतीय दर्शन व संस्कृति का मुख्य आधार धर्म सत्ता है एवम त्याग, परमार्थ, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय इसकी प्रमुख शिक्षाएं है। अपने "वसुधैव

कुटुम्बकम" व "सर्वे भवन्तु सुखिनः" के दर्शन के कारण हमने एक प्रतिष्ठा अर्जित की है।

ऐसे गौरवशाली राष्ट्र में प्रातःकाल में छपने वाले समाचारपत्रों में जब महिला उत्पीड़न, वर्ग संघर्ष, जातीय मांगो, धर्मिक उन्मादों, व्याभिचार एवम भृष्टाचार के समाचार प्रमुखता से प्रकाशित होते है तो प्रत्येक भारतीय स्वयम को आहत महसूस करता है।
वर्तमान के कर्म ही भविष्य की आधारशिला बनते है अतः हमें समाज मे उतपन्न स्तिथियों का अध्ययन कर कठोर निर्णय लेने ही पड़ेंगे ताकि आने वाले पीढियां हम पर दोषारोपण नही कर सके।

अनेकों बार बनने व बिगड़ने के बावजूद आज हम एक विशाल राष्ट्र है एवम हम में वो शक्ति है जिससे हम हमारे राष्ट्र को एक विकसित राष्ट्र के रूप में परिवर्तित कर सकते है। इस विशाल राष्ट्र के निर्माण में लाखों देशभक्तों का अमूल्य योगदान रहा है।

लाखों राष्ट्रभक्तों ने अपने जीवन न्यौछावर किये है, कारावास की कठोरतम यातनाओं को सहन किया है एवम अल्पायु में ही अपने प्रियजनों की करुणामय जुदाई को सहन किया है। यह सिलसिला अनवरत जारी है। सीमाओं की रक्षा के लिए रोजाना जवान शहीद हो रहे है और राष्ट्र के झंडे से लिपटे उनके शव पर उनके बिलखते परिजन कसम खा रहे है कि वे अपनी अगली पीढ़ी को भी सेना में भेजेंगे।

दूसरी तरफ विलासिता में आकंठ तक डूबे कुछ लोग भृष्टाचार के नए कीर्तिमान बना रहे है। सत्ता ही सर्वोपरि बन गयी है। आपसी सदविश्वास, भाईचारा, एकता जैसे शब्द किताबी लगने लगे है।

आज शांति काल है, यही वह समय है जबकि हम दूरगामी तैयारियों को मूर्तरूप से

दे सकते है। हम जहां है वही से राष्ट्र निर्माण आरम्भ करे। अगर शिक्षक है तो श्रेष्ठ शिक्षा प्रदान करते हुए राष्ट्र के भविष्य के लिए उपयुक्त पाठ्यक्रमों की रचना करे। व्यापारी है तो स्वेदशी तकनीकों का ईजाद करते हुए अधिकतम विदेशी मुद्रा का अर्जन करे व यथाकार्य यथायोग्य सेवा करे।

देशभक्ति की एकमात्र कसौटी शहादत ही नही है अपितु अपने कर्तव्यों का ईमानदारी पूर्वक निर्वहन भी एक सच्ची राष्ट्रभक्ति है। प्रातःस्मरणीय शहीदों को नमन।
जय राष्ट्र!