Categories: Astrology
| On 2 months ago

पांचवें भाव में शनि का फल | स्वास्थ्य, करियर और धन

शनि पंचमभाव में होने से जातक प्रसन्न, चिरायु, सुखी, चपल, शत्रु समूह विजेता तथा धर्मात्मा होता है। शुभ सम्बन्ध का शनि शुभ फलदाता और अशुभ सम्बन्ध का शनि अशुभ फलदाता होता है।

पांचवें भाव में शनि का फल

पांचवें भाव में शनि का शुभ फल (Positive Results of Shani in 5th House in Astrology)

  • पांचवें भाव में शनि (Shani in 5th House) मिश्रित फल देता है। शुभ सम्बन्ध का शनि शुभ फलदाता और अशुभसम्बन्ध का शनि अशुभफलदाता होता है। इस तरह शुभ-अशुभ सम्बन्ध ही निर्णायक और नियामक मानने होंगे।
  • पांचवें भाव में शनि होने से जातक बुद्धिमान्, विद्वान्, उद्योगी तथा भ्रमणशील होता है।
  • शनि पंचमभाव में होने से जातक प्रसन्न, चिरायु, सुखी, चपल, शत्रु समूह विजेता तथा धर्मात्मा होता है। कभी-कभी एक सन्तान के बाद दूसरी सन्तान 57912 वर्षों के अन्तर से होती है। कभी कभी गोद लिए जाने के बाद औरस पुत्र की उत्पत्ति भी होती है। इसका योग पुरातन ग्रन्थकारों ने निम्नलिखित बतलाया है:-"पंचमेश शनि के नवमांश में हो और गुरु-शुक्र स्वगृह में होने से पहिले दत्तक पुत्र होकर फिर औरस पुत्र होता है।"
  • पंचमस्थ शनि आपत्तियाँ झेलकर ही समृद्ध होने देता है। पूर्वार्जित सम्पत्ति प्राप्त होकर नष्ट हो सकती है।      
  • पंचमस्थ शनि मेष, सिंह तथा धनुराशि में होने स्वभाव कुछ विलक्षण-सा होता है। अपने विचारों को छुपाना, तबीयत में संशय, दूसरों पर अविश्वास, मुँह पर प्रशंसा-पीछे निन्दा करना, घर में पत्नी के आगे-पीछे फिरना-किन्तु घर से बाहर नितान्त भूल जाना आदि-आदि अजीब स्वभाव होता है।
  • पंचमस्थ शनि मेष, सिंह तथा धनुराशि में होने से सन्तति बहुत होती है, किन्तु जीवित नहीं रहती। कुछ पुत्र बड़े होकर बाप से पहले ही मर जाते हैं। अन्त में एक या दो पुत्र और कन्याएं जीवित रहते हैं। विवाह एक ही होता है।       बली शनि होने से जातक स्त्रियों से युक्त होता है।      
  • पंचमस्थ शनि मेष और सिंह में हाने से शिक्षा पूरी होती है। भूगर्भशास्त्र, तकनीकि विषयों में निपुणता प्राप्त होती है।      
  • मेष, सिंह, धनु, कर्क, वृश्चिक, मीन में शनि होने से भाग्योदय का योग होता है। अपने बाहुबल से उन्नति होती है।

पांचवें भाव में शनि का अशुभ फल (Negative Results of Shani in 5th House in Astrology)

  • पांचवें भाव में शनि होने से जातक सदैव रोगयुक्त होने से अतीव निर्बलशरीर होता है।

  • पंचम भाव में शनि होने से जातक निरुद्यमी, आलसी होता है। जातक की बुद्धि शुद्ध नहीं होती है। अर्थात जातक निष्कपट हृदय नहीं होता है और सबके साथ कुटिलता से व्यवहार करता है। जातक शठ (शैतान) और दुराचारी, निर्बुद्धि, चिन्तायुक्त, दुष्टबुद्धिवाला होता है। बुद्धिहीन तथा हृदयहीन होता है और मूर्ख होता है।

  • जातक की पूर्ण श्रद्धा देवताओं में होती है और ना ही अपने धर्म तथा धर्मिक पुस्तकों पर होती है। मन्त्रों में सिद्धि कम प्राप्त होती है। चूँकि जातक श्रद्धा और निष्ठा से अर्थात् पूर्णविश्वास से मन्त्र जाप आदि नहीं करता है तदनुसार सिद्धि भी कम ही होती है।

  • जातक की विभूति-ऐश्वर्य अर्थात् सम्पत्ति स्थिर नहीं रहती है अर्थात् घटती-बढ़ती रहती

    है। लग्न से पंचमस्थान में शनि होने से निर्धन होता है। धनहीन होता है। सदैव दरिद्र होता है। धन तथा ऐश्वर्य थोड़ा होता है। धनहीनता से दु:खी होता है।
  • पंचम भाव में शनि होने से स्त्रियों के पेट में शूल होता है, ऋतु प्राप्ति के बहुत वर्षो बाद संतति होती है, दो संतानों में 5,7,9,11,13 वर्षों का दीर्घ अन्तर रहता है, प्रसूति का समय बहुत देर से होता है।

  • जन्मलग्न से पंचमभाव में शनि होने से जातक सन्तान होने से नित्य दु:खी रहता है। अर्थात् पुत्र नहीं होता है। शनि सन्तान सुख में बाधा डालता है, पुत्रों के लिए कष्टकारक होता है। जातक की संतति दुखी रहती है।

  • गुणहीन, अनीतिमान, तथा व्यसनयुक्त पुत्रों से जातक को भय रहता है क्योंकि ऐसे पुत्र पितृहंता भी हो सकते हैं। जातक वातरोगी, पेट की बीमारियों से पीडि़त रहता है। शस्त्र घात और गुल्म रोग होता हैं। विपत्तियों से ग्रस्त रहने के कारण चित्त विभ्रम, उन्माद रोग होता है। अपनी नासमझाी से जातक के कलेजे में पीड़ा

    होती है।
  • जातक की मृत्यु हृदय विकार से, या डूबने से होती है। जातक का मित्र से वैर होता है। मित्रों के साथ कलह होता है। शनि होने से जातक 'अनंगहीन' अर्थात "अतीव कामातुर नहीं होता है" जातक को कामचेष्टा थोड़ी अर्थात कामेच्छा कम होती है।

  • पंचमस्थ शनि से जन्मदाता माता-पिता का सुख नहीं होता दत्तक पुत्र बन जाने का योग सम्भावित होता है। शनि पीडि़त होने से जातक प्रेम प्रकरणों में असफल होता है, अपने से अधिक आयु वाले से प्रेम करता हैं।पीडि़त शनि से सट्टे के व्यवहार में, लाटरी में, तथा रेस में नुकसान होता है।      

  • दूषित शनि के अशुभ फल आचार्यों ने विशेषत: बतलाए हैं-सन्तति का अभाव, वृद्धावस्था में सन्तति का होना, सन्तति की प्रगति का अभाव, सन्तति से वैमनस्य-आदि संभव है।