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| On 2 months ago

छठे भाव में शनि का फल | स्वास्थ्य, करियर और धन

छठेभाव में शनि जातक की जठराग्नि प्रबल होती है, भूख बहुत तीव्र होती है और बहुत खाने वाला होता है। अपने शत्रुओं का मान मद्रन करता है, शत्रु पराजित होते हैं। शनि के साथ मंगल भी हो तो जातक विदेशों में घूमता फिरता है।

छठे भाव में शनि का फल

छठे भाव में शनि का शुभ फल (Positive Results of Shani in 6th House in Astrology)

  • छठेभाव में शनि (Shani in 6th House) होने को सभी प्राचीन ग्रन्थकारों ने प्राय: शुभ ही बताया हैं। षष्ठस्थान दु:ष्टस्थान है। इसमें बैठा हुआ पापग्रह शनि शुभफल दाता होता है।
  • छठेभाव में शनि होने से जातक का शरीर सुन्दर, पुष्ट-नीरोग, तथा शक्तिशाली होता है। जातक की जठराग्नि प्रबल होती है, भूख बहुत तीव्र होती है और बहुत खाने वाला होता है।
  • षष्ठ में शनि से आहार के बारे में रुचि बहुत तीव्र होती है। शरीर से बलिष्ठ होने के कारण किसी की परवाह नहीं करती है। जातक प्रगल्भ वक्ता तथा तर्ककुशल होता है। अत: प्रतिवादियों के लिए अतीव भयंकर होता है
  • षष्ठभाव में शनि होने
    से जातक दानियों में श्रेष्ठ, गुणों की कद्र करने वाली, पण्डितों की आज्ञा का पालन करने वाली होती है। गुणों की परीक्षक, श्रेष्ठ कर्मों को जानने वाली, अनेकों को आश्रय देने वाली होती है। बन्धु-बान्धवों से युक्त, अपने बंधु-बांधवों की पालक होती है। बहुत से नौकर-चाकर, पृष्टपोषक तथा अनुयाइयों से युक्त होता है
  • षष्ठस्थ शनि प्रभावान्वित जातिका महाबली होता है। अत: जातिका के शत्रु भयाक्रांत रहते हैं। अपने शत्रुओं का मान मद्रन करता है, शत्रु पराजित होते हैं। जातक शत्रुहन्ता, संपूर्ण शत्रुगण को जीतने वाला होता है शनि शत्रुभाव में होने से जातक शत्रुओं से भी सम्मानित होता है जातक को पशुओं चौपाए जानवर भैंस-गाय-घोड़ हाथी आदि से प्रेम रहता है। महिषी आदि का सुख मिलता है। जातक के घर में दूध देने वाले भैंस आदि चौपाए जानवर रहते हैं।
  • षष्ठ भावस्थ शनि प्रभावान्वित लोग जातक पालकर लाभ उठा सकते हैं। जातक कुकर्म-कर्ता नहीं होती है। न्यायवृत्ति से जीवन निर्वाह करता है। अत: राजा, राजकुल से कोई दंडभय नहीं होता है। जातक को चोरभय भी नहीं होता है। सर्वदा चतुर्दिशाओं में फैलने
    वाली अतुलकीर्ति का लाभ होता है। जातक यशस्वी होती है। नौकरों द्वारा अनुशासन कायम रखकर अच्छा काम कराने की योग्यता प्राप्त होती है।
  • जातक भाग्यवान, भोगों, भूषणों तथा वाहनों से सम्पन्न, सुशिक्षित, धनी, सुखी होती है। जातक पर राजा की कृपा रहती है।राजा जैसा धनधान्य समृद्ध किन्तु किसी दु: से पीडि़त होती है। पति-पुत्रों से सुख मिलता है। कई एक काव्यों की रचयिता भी होती है। शनि के साथ मंगल भी हो तो जातक विदेशों में घूमता फिरता है।
  • जातक को परिस्थिति से लड़ना होता है, बाद में संसार में अग्रसर होती है तथा प्रगति करता है। जातक को एक साथ कीर्ति, सम्पत्ति या अधिकार नहीं मिल पाते हैं यदि कीर्ति है तो सम्पत्ति नहीं है और यदि सम्पत्ति है तो अधिकार नहीं है। विवाह से पहली आयु में स्वास्थ्य अच्छा नहीं होता-विवाह के अनन्तर अच्छा हो जाता है। मेष, सिंह, धनु, मिथुन, कर्क, वृश्चिक तथा मीन में शुभफल का अनुभव होता है।अन्य राशियों में शनि होने से शत्रु का नाश होता है।
  • षष्ठभाव में बलवान्, शुभ सम्बन्ध में
    शनि यशस्वी अधिकारी के गुण देता है।

छठे भाव में शनि का अशुभ फल (Negative Results of Shani in 6th House in Astrology)

  • छठे भाव में शनि (Shani in 6th House) के प्रभाव से जातक ढ़ीठ, अभिमानी, विषयासक्त, स्वच्छन्द प्रकृति की दुराचारी होता है। षष्ठ स्थान का शनि पूर्व आयु में बहुत कष्ट देता है। काम में रुकावटें आती हैं-किसी भी तरफ से सहायता नहीं मिलती, एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ता है-इस तरह भारी कष्ट से प्रगति करनी पड़ती है।
  • वृद्धावस्था में जातक को भारी आर्थिक कष्ट होता है-यदि नौकरी में हों तो असामयिक अवकाश प्राप्त करना पड़ता है और इसका कारण शरीरिक व्यंग होता है।
  • छठे भाव में शनि के होने से जातक को देशान्तर में भी सुख नहीं मिलता। स्थानान्तर में भी प्रगति नहीं होती। प्रकृति सदा रोगी और अशक्त रहती है। दीर्घकाल चलने वाले कठिन रोगों से शरीर त्रस्त होता है। अन्न, वस्त्र की कमी से अस्वस्थता रहती है। छठे स्थान में शनि होने से कटिप्रदेश में पीड़ा होती है।
  • षष्ठ स्थान में शनि
    होने से कण्ठरोगी, श्वासरोगी होती है। प्रमेह तथा गुप्तरोग होता है। नारायण भट्ट ने के अनुसार 'मामा का नाश' होता है। जातक के मामा की मृत्यु होती है या मामा से वैमनस्य भी मामा से प्राप्त होने वाले सुख की बाधक हो सकती है। मामा, मौसियों के लिए षष्ठस्थान का शनि बहुत अशुभ है-यह बात तो नि:संदिग्ध है। मामा, मौसियों का गृहस्थ ठीक-ठीक नहीं चलता, सन्तति या तो होती नहीं अथवा होकर मृत्युमुख में जाती है।      
  • द्विस्वभाव राशियों में शनि होने से फेफड़ों के विकार, दमा, आमाशय और पैरों के विकार होता है।      
  • छठेभाव का शनि दूषित होने से दारिद्रय, असाफल्य, स्थैर्याभाव, शत्रु भूयस्त्व, अपकीर्ति, बुद्धि होते हुए भी लोकदृष्टि में मूर्ख होना, दीर्घकालीन कारावास आदि अशुभफल अनुभव में आते हैं कर्क, वृश्चिक, मीन में शनि होने से मधुमेह, बहुमूत्रता आदि रोग होता हैं