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सातवें भाव में शनि का फल | स्वास्थ्य, करियर और धन | Saturn in 7th House in Hindi

सातवें भाव में शनि का फल | स्वास्थ्य, करियर और धन

वैदिक ज्योतिष के अनुसार शनि सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली ग्रहों में से एक है जिसे नंगी आंखों से देखा जा सकता है। यह मूल निवासी के जीवन को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूप से प्रभावित करता है। मूल निवासी जो इस स्थान है या तो बहुत अधिक वृद्धि या नीचे खड़ी गिर सकता है, सातवें भाव में शनि के स्थान की प्रकृति पर निर्भर करता है ।

सातवें भाव में शनि के शुभ फल (Positive Results of Shani in 7th House in Astrology)

  • सातवें भाव में शनि के शुभ फल: सप्तमस्थ शनि से पति की मृत्यु पत्नी से पहले होती है।
  • राशिबली और शुभ संबंध में शनि अशुभफल नहीं देता प्रत्युत शनि के विकसित गुणों से संयुक्त पत्नी मिलती है। विवाह से भाग्योदय होता है।
  • मिथुन, तुला, कुंभ में
    शनि होने से जातक की पत्नी का चेहरा गोल और तेजस्वी, केश चमकीले रेशम जैसे रंग कुछ गोरा, किन्तु स्वभाव झगड़ालू होता है। वृष, कन्या, मकर, कुंभ में शनि होने से जातक के दो विवाह होते हैं। दूसरे विवाह के अनन्तर भाग्योदय होता है। किन्तु पत्नी अनुकूल स्वभाव की नहीं होती अत: अच्छा पत्नीसुख नहीं मिलता।
  • शनि राशि बली और शुभ संबंध में होने से विवाह से धन और इस्टेट का लाभ होता है। शनि उच्च या स्वगृही होने से जातक अनेक स्त्रियों का उपभोग करता है। शनि मेष, मिथुन, सिंह, धनु, मकर तथा कुंभ में होने से शिक्षा उत्तम, वकील-मैजिस्ट्रेट आदि के रूप में अच्छी सफलता मिल सकती है।
  • मिथुन, तुला तथा कुंभ में शनि होने से बच्चों की पैदाइश में परस्पर काफी अन्तर रहता है। आजीविका के विषय में-व्यवसाय और नौकरी दोनों ठीक रहते हैं।

सातवें भाव में शनि के अशुभ फल (Negative Results of Shani in 7th House in Astrology)

  • सातवें भाव में शनि के अशुभ फल : सप्तमभाव के शनि के आचार्यो ने अशुभफल ही वर्णित किए हैं। जातक ढ़ोंगी, अंगहीन और मित्रों से मायाबी व्यवहार करनेवाला होता है। पत्नी वियोग (या वैधव्य) का निश्चित योग होता है। सप्तम शनि से जातक विधुर होता है और उसे दूसरा विवाह करना होता है। स्त्री अथवा सन्तान का नाश होने का योग भी होता है।
  • सप्तम में शनि के होने से जातक को बोझा उठाना पड़ता है, बोझा उठाकर दूरतक चलने की थकावट से मन में दु:ख होता है। जातक निर्धन होता है। मार्ग चलनेवाला और दु:खी होता है। प्राचीनकाल में पैदल चलना या यात्रा करना कष्ट का लक्षण माना जाता था। सप्तमभाव में शनि के होने से जातक का शरीर दोषयुक्त रहता है। सप्तमभाव में शनि हाने से जातक खराब
    चालवाला, थोड़ा बोलनेवाला, निर्बुद्धि और पराधीन होता है। अपनी वास्तविक आयु से बड़ा प्रतीत होता है।
  • शनि के सप्तमभाव में स्थित होने से जातक रोगों से पीडि़त अतएव निर्बल देह हो जाता है। जातक का चित्त स्थिर नहीं होता है। जातक कार्य मात्र में अनुत्साही, देह में अत्यन्त कृशता, शीघ्र ही रोगों की अधिकता और बुद्धि चंचंल होती है।
  • उत्साहहीन होने से दु:खी रहता है। जातक का मन छोटा रहता है। जातक का मन सदा घबड़ाया हुआ रहता है। क्रोधी, भ्रमणशील, आलसी, स्त्रीभक्त, विलासी एवं कामी होता है। जातक बहुत लोभी होता है। और दुष्ट प्रकृति का होता है। आजीविकाहीन होता है। यद्यपि जातक के पास गुजारे लायक धन रहता है। पत्नी और परिवार के दु:ख से दु:खी रहता है हालांकि जातक अपनी ओर से पत्नी को प्रसन्न रखने की चेष्टा करता है। सुन्दर स्त्री, योग्य हितकारी शुद्ध हृदय मित्र, अधिक धन का सुख बहुत
    समय नहीं मिलता है। जातक की पत्नी (या पति) उदास, दु:खी, निराश, कम बोलनेवाली होती है। विवाहसुख ठीक नहीं मिलता। व्यभिचार की प्रवृत्ति होती है।
  • सप्तम में शनि होने से जातक कुस्सित स्त्री अर्थात् बद चलन स्त्री में आसक्त रहता है। जातक वेश्यागामी होता है। जातक के सप्तमभाव में शनि होने से स्त्रियाँ निरादर करती हैं।
  • सातवें स्थान में शनि होने से जातक प्रमेह जैसे रोग से ग्रस्त होता है। जातक को पेट (आंत) या मूत्र संबंधी दीर्घ रोग (लंबे समय तक चलने वाले) होते हैं।
  • स्त्रीसुख गृहसुख तथा धन का सुख नहीं मिलता है। जातक का संसर्ग तथा संपर्क नीचवृत्ति के लोगों से रहता है। बदमाश, झूठ बोलनेवाले विश्वासघाती लोगों से एकदम शत्रुता होती है।
  • साझीदारी में नुकसान होता है।