श्राद्ध पक्ष 2022 | श्राद्ध पक्ष के बारे में यह प्रत्येक हिन्दू को अवश्य जान लेना चाहिए।

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पितृ श्राद्ध आरम्भ हो गए है। जैसा कि हम सभी जानते है कि 10 सितंबर 2022 से पितृ श्राद्ध हिन्दू धर्म मे विशेष महत्व रखते है लेकिन आम व्यक्ति को इसकी कोई जानकारी नहीं होती है। वह सिर्फ एक तिथि विशेष को ब्राह्मण भोज कर कुछ दान-पुण्य कर के अपना कर्तव्य पूर्ण समझ लेता है। यह आवश्यक है कि हम किसी भी धार्मिक कार्य को पहले पूर्णतया सैद्धान्तिक रूप से समझे तत्पश्चात उसे व्यवहारिक रूप से पूर्ण करें।

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पितृ पक्ष/ श्राद्ध पक्ष 2022 shivira.com

पितरों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी आप सभी के लिए प्रस्तुत की जा रही है । आप इसे पूरा अवश्य पढ़े क्योंकि जब हम श्राद्ध के बारे में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करते है अथवा पढ़ते हैं तो सही जानकारी पढ़ने से भी हमारे पितरों को शांति मिलती है। आइये, सबसे पहले हम वर्ष 2022 हेतु श्राद्ध के कैलेंडर की जानकारी प्राप्त करेंगे।

पितृ श्राद्ध 2022 की महत्वपूर्ण तिथियां | Important Dates of Pitru Shradh 2022

भाद्रपद मास की पूर्णिमा से पितृ पक्ष की शुरुआत हो जाती है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि तक पितृ पक्ष रहता है। इस साल 10 सितंबर 2021 से पितृ पक्ष आरंभ हो गया और 25 सितंबर 2022 को पितृ पक्ष का समापन हो जाएगा।

पितृ पक्ष में श्राद्ध की तिथियां | Dates of Shradh in Pitru Paksha

पूर्णिमा श्राद्ध -10/9/2022,शनिवार

1 प्रतिपदा श्राद्ध – 10/9/2022 रविवार
2 द्वितीया श्राद्ध – 11/9/2022 सोमवार
3 तृतीया श्राद्ध- 12/9/2022 मंगलवार
4 चतुर्थी श्राद्ध-13/9/2022 बुद्धवार
5 पंचमी श्राद्ध- 14/9/2022 गुरुवार
6 षष्ठी श्राद्ध-15/9/2022 शुक्रवार
7 सप्तमी श्राद्ध- 16/9/2022 शनिवार
8 अष्टमी श्राद्ध- 18/9/2022 रविवार
9 नवमी श्राद्ध- 19/9/2022 सोमवार
10 दशमी श्राद्ध- 20/9/2022 मंगलवार
11 एकादशी श्राद्ध- 21/9/2022 बुद्धवार
12 द्वादशी श्राद्ध- 22/9/2022 गुरुवार
13 त्रयोदशी श्राद्ध- 23/9 /2022 शुक्रवार
14 चतुर्दशी श्राद्ध- 24/9/ 2022 शनिवार
15 सर्वपितृ अमावस श्राद्ध 25/9/2022 रविवार

घर के प्रेत या पितर रुष्ट होने के लक्षण और उपाय | Symptoms and remedies for the happiness of ancestor of the house

आम व्यक्ति में यह बहुत जिज्ञासा होती है आखिर ये पितृदोष है क्या? पितृ -दोष की शांति के सरल उपाय क्या होते हैं? पितृ या पितृ गण कौन हैं ? आपकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए यह विस्तृत विवरण निम्नलिखित है।

पितृ गण हमारे पूर्वज हैं । हमारे पूर्वजों ने हमारा लालन-पोषण किया। हमारे लिए अनेक सुविधाओं का निर्माण किया। जिनका ऋण हमारे ऊपर है ,क्योंकि उन्होंने कोई ना कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया है। यहाँ हमको हिन्दू धर्म ग्रन्थ के सार को समझ लेना होगा कि मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है, पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है।

आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है ,वहाँ हमारे पूर्वज मिलते हैं अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो ये हमारे पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को धन्य मानते हैं। पूर्वज मानते है कि इस अमुक आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार पर सूर्य लोक की तरफ बढती है।

वहाँ से आगे ,यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक से आगे निकलकर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती है, लेकिन करोड़ों में एक आध आत्मा ही ऐसी होती है ,जो परमात्मा में समाहित होती है जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता । मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में बहुत सारी आत्माएं पुनः अपनी इच्छा वश ,मोह वश अपने कुल में जन्म लेती हैं।

पितृदोष क्या होता है ? | What is Pitra Dosh ?

पितृ दोष क्या होता है ? इसको अगर हम समझ लेते है तो हमारे जीवन मे पवित्रता आने लगती है। जैसा कि हम समझ चुके है पितृ से आशय हमारे दिवंगत पूर्वजो से होता है।

पितृ दोष एक अदृश्य बाधा है .ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण होती है पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं ,आपके आचरण से,किसी परिजन द्वारा की गयी गलती से ,श्राद्ध आदि कर्म ना करने से ,अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण भी हो सकता है।

हमारे ये ही पूर्वज सूक्ष्म व्यापक शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं ,और महसूस करते हैं कि हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति श्रद्धा रखते हैं और न ही इन्हें कोई प्यार या स्नेह है और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं,ना ही अपने ऋण चुकाने का प्रयास ही करते हैं तो ये आत्माएं दुखी होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं,जिसे “पितृ- दोष” कहा जाता है।

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इसके अलावा मानसिक अवसाद,व्यापार में नुकसान , परिश्रम के अनुसार फल न मिलना , विवाह या वैवाहिक जीवन में समस्याएं, कैरिअर में समस्याएं या संक्षिप्त में कहें तो जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता है । पितृ दोष होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति ,गोचर ,दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं मिल पाते चाहे कितना भी पूजा पाठ , देवी , देवताओं की अर्चना की जाए ,उसका शुभ फल नहीं मिल पाता।

पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है

1. अधोगति वाले पितरों के कारण
2. उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण


पितृगणों के निमित्त श्रद्धा पूर्वक किए जाने वाले कर्म विशेष को श्राद्ध कहते हैं ।
“श्रद्धया इदं श्राद्धम”

अधोगति वाले पितरों के दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण, पितरों की अतृप्त इच्छाएं ,जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत लोगों द्वारा उपभोग होने पर, विवाहादि में परिजनों द्वारा गलत निर्णय .परिवार के किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं , परिवार जनों को श्राप दे देते हैं और अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं।

उर्ध्व गति वाले पितर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते ,परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं।

इनके द्वारा उत्पन्न पितृदोष से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बिलकुल बाधित हो जाती है ,फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना किये जाएँ ,कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जाएँ,उनका कोई भी कार्य ये पितृदोष सफल नहीं होने देता। पितृ दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि किस गृह के कारण और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है ?

जन्म पत्रिका और पितृ दोष जन्म पत्रिका में लग्न , पंचम , अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि और राहू -केतु की स्थितियों से पितृ दोष का विचार किया जाता है।

इनमें से भी गुरु ,शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ दोष में महत्वपूर्ण होती है इनमें सूर्य से पिता या पितामह , चन्द्रमा से माता या मातामह ,मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है।

अधिकाँश लोगों की जन्म पत्रिका में मुख्य रूप से क्योंकि गुरु ,शनि और राहु से पीड़ित होने पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है ,इसलिए विभिन्न उपायों को करने के साथ साथ व्यक्ति यदि पंचमुखी ,सातमुखी और आठ मुखी रुद्राक्ष भी धारण कर ले , तो पितृ दोष का निवारण शीघ्र हो जाता है।

पितृ दोष निवारण के लिए इन रुद्राक्षों को धारण करने के अतिरिक्त इन ग्रहों के अन्य उपाय जैसे मंत्र जप और स्तोत्रों का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता है।

विभिन्न ऋण और पितृ दोष | Various debts and Pitru Dosha

हमारे ऊपर मुख्य रूप से 5 ऋण होते हैं जिनका कर्म न करने (ऋण न चुकाने पर ) हमें निश्चित रूप से श्राप मिलता है ,ये ऋण हैं : मातृ ऋण ,पितृ ऋण ,मनुष्य ऋण ,देव ऋण और ऋषि ऋण।

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मातृ ऋण


माता एवं माता पक्ष के सभी लोग जिनमें मामा, मामी , नाना ,नानी ,मौसा ,मौसी और इनके तीन पीढ़ी के पूर्वज होते हैं ,क्योंकि माँ का स्थान परमात्मा से भी ऊंचा माना गया है अतः यदि माता के प्रति कोई गलत शब्द बोलता है ,अथवा माता के पक्ष को कोई कष्ट देता रहता है,तो इसके फलस्वरूप उसको नाना प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं। इतना ही नहीं ,इसके बाद भी कलह और कष्टों का दौर भी परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है।

पितृ ऋण


पिता पक्ष के लोगों जैसे बाबा ,ताऊ ,चाचा, दादा-दादी और इसके पूर्व की तीन पीढ़ी का श्राप हमारे जीवन को प्रभावित करता है । पिता हमें आकाश की तरह छत्रछाया देता है, हमारा जिंदगी भर पालन -पोषण करता है ,और अंतिम समय तक हमारे सारे दुखों को खुद झेलता रहता है। आज के इस भौतिक युग में पिता का सम्मान क्या नयी पीढ़ी कर रही है ? पितृ -भक्ति करना मनुष्य का धर्म है ,इस धर्म का पालन न करने पर उनका श्राप नयी पीढ़ी को झेलना ही पड़ता है ,इसमें घर में आर्थिक अभाव, दरिद्रता , संतानहीनता ,संतान को विभिन्न प्रकार के कष्ट आना या संतान अपंग रह जाने से जीवन भर कष्ट की प्राप्ति आदि।

देव ऋण

माता-पिता प्रथम देवता हैं,जिसके कारण भगवान गणेश महान बने |इसके बाद हमारे इष्ट भगवान शंकर जी ,दुर्गा माँ ,भगवान विष्णु आदि आते हैं ,जिनको हमारा कुल मानता आ रहा है ,हमारे पूर्वज भी भी अपने अपने कुल देवताओं को मानते थे , लेकिन नयी पीढ़ी ने बिलकुल छोड़ दिया है इसी कारण भगवान /कुलदेवी /कुलदेवता उन्हें नाना प्रकार के कष्ट /श्राप देकर उन्हें अपनी उपस्थिति का आभास कराते हैं।

ऋषि ऋण


जिस ऋषि के गोत्र में पैदा हुए ,वंश वृद्धि की ,उन ऋषियों का नाम अपने नाम के साथ जोड़ने में नयी पीढ़ी कतराती है ,उनके ऋषि तर्पण आदि नहीं करती है इस कारण उनके घरों में कोई मांगलिक कार्य नहीं होते हैं, इसलिए उनका श्राप पीढ़ी दर पीढ़ी प्राप्त होता रहता है।

मनुष्य ऋण

माता -पिता के अतिरिक्त जिन अन्य मनुष्यों ने हमें प्यार दिया ,दुलार दिया ,हमारा ख्याल रखा ,समय समय पर मदद की गाय आदि पशुओं का दूध पिया जिन अनेक मनुष्यों ,पशुओं ,पक्षियों ने हमारी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मदद की ,उनका ऋण भी हमारे ऊपर हो गया।

लेकिन लोग आजकल गरीब ,बेबस ,लाचार लोगों की धन संपत्ति हरण करके अपने को ज्यादा गौरवान्वित महसूस करते हैं। इसी कारण देखने में आया है कि ऐसे लोगों का पूरा परिवार जीवन भर नहीं बस पाता है,वंश हीनता ,संतानों का गलत संगति में पड़ जाना,परिवार के सदस्यों का आपस में सामंजस्य न बन पाना ,परिवार कि सदस्यों का किसी असाध्य रोग से ग्रस्त रहना इत्यादि दोष उस परिवार में उत्पन्न हो जाते हैं।

ऐसे परिवार को पितृ दोष युक्त या शापित परिवार कहा जाता है रामायण में श्रवण कुमार के माता -पिता के श्राप के कारण दशरथ के परिवार को हमेशा कष्ट झेलना पड़ा,ये जग -ज़ाहिर है इसलिए परिवार कि सर्वोन्नती के पितृ दोषों का निवारण करना बहुत आवश्यक है।

पितृों के रूष्ट होने के लक्षण | Signs of Ancestor’s Anger

पितरों के रुष्ट होने के कुछ असामान्‍य लक्षण जो मैंने अपने निजी अनुभव के आधार एकत्रित किए है वे क्रमशः इस प्रकार हो सकते है।

खाने में से बाल निकलना | Unwanted loose hairs in your food

अक्सर खाना खाते समय यदि आपके भोजन में से बाल निकलता है तो इसे नजरअंदाज न करें. बहुत बार परिवार के किसी एक ही सदस्य के साथ होता है कि उसके खाने में से बाल निकलता है, यह बाल कहां से आया इसका कुछ पता नहीं चलता। यहां तक कि वह व्यक्ति यदि रेस्टोरेंट आदि में भी जाए तो वहां पर भी उसके ही खाने में से बाल निकलता है और परिवार के लोग उसे ही दोषी मानते हुए उसका मजाक तक उडाते है।

बदबू या दुर्गंध | stink or foul smell

कुछ लोगों की समस्या रहती है कि उनके घर से दुर्गंध आती है, यह भी नहीं पता चलता कि दुर्गंध कहां से आ रही है। कई बार इस दुर्गंध के इतने अभ्‍यस्‍त हो जाते है कि उन्हें यह दुर्गंध महसूस भी नहीं होती लेकिन बाहर के लोग उन्हें बताते हैं कि ऐसा हो रहा है अब जबकि परेशानी का स्रोत पता ना चले तो उसका इलाज कैसे संभव है

पूर्वजों का स्वप्न में बार बार आना | Repeated visits of ancestors in dreams

मेरे एक मित्र ने बताया कि उनका अपने पिता के साथ झगड़ा हो गया है और वह झगड़ा काफी सालों तक चला पिता ने मरते समय अपने पुत्र से मिलने की इच्छा जाहिर की परंतु पुत्र मिलने नहीं आया, पिता का स्वर्गवास हो गया हुआ। कुछ समय पश्चात मेरे मित्र मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि उन्होंने अपने पिता को बिना कपड़ों के देखा है ऐसा स्‍वप्‍न पहले भी कई बार आ चुका है।

शुभ कार्य में अड़चन | obstruction of good work

कभी-कभी ऐसा होता है कि आप कोई त्यौहार मना रहे हैं या कोई उत्सव आपके घर पर हो रहा है ठीक उसी समय पर कुछ ना कुछ ऐसा घटित हो जाता है कि जिससे रंग में भंग डल जाता है। ऐसी घटना घटित होती है कि खुशी का माहौल बदल जाता है। मेरे कहने का तात्‍पर्य है कि शुभ अवसर पर कुछ अशुभ घटित होना पितरों की असंतुष्टि का संकेत है।

घर के किसी एक सदस्य का कुंवारा रह जाना | Not getting marriage purposal for one of the members in family

बहुत बार आपने अपने आसपास या फिर रिश्‍तेदारी में देखा होगा या अनुभव किया होगा कि बहुत अच्‍छा युवक है, कहीं कोई कमी नहीं है लेकिन फिर भी शादी नहीं हो रही है। एक लंबी उम्र निकल जाने के पश्चात भी शादी नहीं हो पाना कोई अच्‍छा संकेत नहीं है। यदि घर में पहले ही किसी कुंवारे व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है तो उपरोक्त स्थिति बनने के आसार बढ़ जाते हैं। इस समस्‍या के कारण का भी पता नहीं चलता।

मकान या प्रॉपर्टी की खरीद फरोख्त में दिक्कत आना | Difficulty in buying a house or property

आपने देखा होगा कि कि एक बहुत अच्छी प्रॉपर्टी, मकान, दुकान या जमीन का एक हिस्सा किन्ही कारणों से बिक नहीं पा रहा यदि कोई खरीदार मिलता भी है तो बात नहीं बनती। यदि कोई खरीदार मिल भी जाता है और सब कुछ हो जाता है तो अंतिम समय पर सौदा कैंसिल हो जाता है। इस तरह की स्थिति यदि लंबे समय से चली आ रही है तो यह मान लेना चाहिए कि इसके पीछे अवश्य ही कोई ऐसी कोई अतृप्‍त आत्‍मा है जिसका उस भूमि या जमीन के टुकड़े से कोई संबंध रहा हो।

संतान ना होना | not having children

मेडिकल रिपोर्ट में सब कुछ सामान्य होने के बावजूद संतान सुख से वंचित है हालांकि आपके पूर्वजों का इस से संबंध होना लाजमी नहीं है परंतु ऐसा होना बहुत हद तक संभव है जो भूमि किसी निसंतान व्यक्ति से खरीदी गई हो वह भूमि अपने नए मालिक को संतानहीन बना देती है

उपरोक्त सभी प्रकार की घटनाएं या समस्याएं आप में से बहुत से लोगों ने अनुभव की होंगी इसके निवारण के लिए लोग समय और पैसा नष्ट कर देते हैं परंतु समस्या का समाधान नहीं हो पाता। क्या पता हमारे इस लेख से ऐसे ही किसी पीड़ित व्यक्ति को कुछ प्रेरणा मिले इसलिए निवारण भी स्पष्ट कर रहा हूं।

पितृ दोष कि शांति के उपाय | Remedies for peace of Pitra Dosh

1. सामान्य उपायों में षोडश पिंड दान ,सर्प पूजा ,ब्राह्मण को गौ -दान ,कन्या -दान,कुआं ,बावड़ी ,तालाब आदि बनवाना ,मंदिर प्रांगण में पीपल ,बड़(बरगद) आदि देव वृक्ष लगवाना एवं विष्णु मन्त्रों का जाप आदि करना ,प्रेत श्राप को दूर करने के लिए श्रीमद्द्भागवत का पाठ करना चाहिए।

2. वेदों और पुराणों में पितरों की संतुष्टि के लिए मंत्र ,स्तोत्र एवं सूक्तों का वर्णन है जिसके नित्य पठन से किसी भी प्रकार की पितृ बाधा क्यों ना हो ,शांत हो जाती है अगर नित्य पठन संभव ना हो , तो कम से कम प्रत्येक माह की अमावस्या और आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या अर्थात पितृपक्ष में अवश्य करना चाहिए। वैसे तो कुंडली में किस प्रकार का पितृ दोष है उस पितृ दोष के प्रकार के हिसाब से पितृदोष शांति करवाना अच्छा होता है।

3. भगवान भोलेनाथ की तस्वीर या प्रतिमा के समक्ष बैठ कर या घर में ही भगवान भोलेनाथ का ध्यान कर निम्न मंत्र की एक माला नित्य जाप करने से समस्त प्रकार के पितृ- दोष संकट बाधा आदि शांत होकर शुभत्व की प्राप्ति होती है |मंत्र जाप प्रातः या सायंकाल कभी भी कर सकते हैं :

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय च धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।

4. अमावस्या को पितरों के निमित्त पवित्रता पूर्वक बनाया गया भोजन तथा चावल बूरा ,घी एवं एक रोटी गाय को खिलाने से पितृ दोष शांत होता है।

5. अपने माता -पिता ,बुजुर्गों का सम्मान,सभी स्त्री कुल का आदर /सम्मान करने और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहने से पितर हमेशा प्रसन्न रहते हैं।

6. पितृ दोष जनित संतान कष्ट को दूर करने के लिए “हरिवंश पुराण ” का श्रवण करें या स्वयं नियमित रूप से पाठ करें।

7. प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती या सुन्दर काण्ड का पाठ करने से भी इस दोष में कमी आती है।

8. सूर्य पिता है अतः ताम्बे के लोटे में जल भर कर ,उसमें लाल फूल ,लाल चन्दन का चूरा ,रोली आदि डाल कर सूर्य देव को अर्घ्य देकर ११ बार “ॐ घृणि सूर्याय नमः “ मंत्र का जाप करने से पितरों की प्रसन्नता एवं उनकी ऊर्ध्व गति होती है।

9. अमावस्या वाले दिन अवश्य अपने पूर्वजों के नाम दुग्ध ,चीनी ,सफ़ेद कपडा ,दक्षिणा आदि किसी मंदिर में अथवा किसी योग्य ब्राह्मण को दान करना चाहिए।

10. पितृ पक्ष में पीपल की परिक्रमा अवश्य करें अगर १०८ परिक्रमा लगाई जाएँ ,तो पितृ दोष अवश्य दूर होगा।

विशिष्ट उपाय :

1. किसी मंदिर के परिसर में पीपल अथवा बड़ का वृक्ष लगाएं और रोज़ उसमें जल डालें ,उसकी देख -भाल करें ,जैसे-जैसे वृक्ष फलता -फूलता जाएगा,पितृ -दोष दूर होता जाएगा,क्योकि इन वृक्षों पर ही सारे देवी -देवता ,इतर -योनियाँ ,पितर आदि निवास करते हैं।

2. यदि आपने किसी का हक छीना है,या किसी मजबूर व्यक्ति की धन संपत्ति का हरण किया है,तो उसका हक या संपत्ति उसको अवश्य लौटा दें।

3. पितृ दोष से पीड़ित व्यक्ति को किसी भी एक अमावस्या से लेकर दूसरी अमावस्या तक अर्थात एक माह तक किसी पीपल के वृक्ष के नीचे सूर्योदय काल में एक शुद्ध घी का दीपक लगाना चाहिए,ये क्रम टूटना नहीं चाहिए।

एक माह बीतने पर जो अमावस्या आये उस दिन एक प्रयोग और करें

इसके लिए किसी देसी गाय या दूध देने वाली गाय का थोडा सा गौ -मूत्र प्राप्त करें उसे थोड़े जल में मिलाकर इस जल को पीपल वृक्ष की जड़ों में डाल दें इसके बाद पीपल वृक्ष के नीचे ५ अगरबत्ती ,एक नारियल और शुद्ध घी का दीपक लगाकर अपने पूर्वजों से श्रद्धा पूर्वक अपने कल्याण की कामना करें,और घर आकर उसी दिन दोपहर में कुछ गरीबों को भोजन करा दें ऐसा करने पर पितृ दोष शांत हो जायेगा।

4. घर में कुआं हो या पीने का पानी रखने की जगह हो ,उस जगह की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें,क्योंके ये पितृ स्थान माना जाता है इसके अलावा पशुओं के लिए पीने का पानी भरवाने तथा प्याऊ लगवाने अथवा आवारा कुत्तों को जलेबी खिलाने से भी पितृ दोष शांत होता है।

5. अगर पितृ दोष के कारण अत्यधिक परेशानी हो,संतान हानि हो या संतान को कष्ट हो तो किसी शुभ समय अपने पितरों को प्रणाम कर उनसे प्रण होने की प्रार्थना करें और अपने द्वारा जाने-अनजाने में किये गए अपराध / उपेक्षा के लिए क्षमा याचना करें ,फिर घर अथवा शिवालय में पितृ गायत्री मंत्र का सवा लाख विधि से जाप कराएं जाप के उपरांत दशांश हवन के बाद संकल्प ले की इसका पूर्ण फल पितरों को प्राप्त हो ऐसा करने से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं ,क्योंके उनकी मुक्ति का मार्ग आपने प्रशस्त किया होता है।

6. पितृ दोष की शांति हेतु ये उपाय बहुत ही अनुभूत और अचूक फल देने वाला देखा गया है,वोह ये कि- किसी गरीब की कन्या के विवाह में गुप्त रूप से अथवा प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक सहयोग करना |(लेकिन ये सहयोग पूरे दिल से होना चाहिए ,केवल दिखावे या अपनी बढ़ाई कराने के लिए नहीं )|इस से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं ,क्योंकि इसके परिणाम स्वरुप मिलने वाले पुण्य फल से पितरों को बल और तेज़ मिलता है ,जिस से वह ऊर्ध्व लोकों की ओरगति करते हुए पुण्य लोकों को प्राप्त होते हैं.|

7. अगर किसी विशेष कामना को लेकर किसी परिजन की आत्मा पितृ दोष उत्पन्न करती है तो तो ऐसी स्थिति में मोह को त्याग कर उसकी सदगति के लिए “गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र ” का पाठ करना चाहिए।

8. पितृ दोष दूर करने का अत्यंत सरल उपाय : इसके लिए सम्बंधित व्यक्ति को अपने घर के वायव्य कोण (N -W )में नित्य सरसों का तेल में बराबर मात्रा में अगर का तेल मिलाकर दीपक पूरे पितृ पक्ष में नित्य लगाना चाहिए+दिया पीतल का हो तो ज्यादा अच्छा है ,दीपक कम से कम 10 मिनट नित्य जलना आवश्यक है।

इन उपायों के अतिरिक्त वर्ष की प्रत्येक अमावस्या को दोपहर के समय गूगल की धूनी पूरे घर में सब जगह घुमाएं ,शाम को आंध्र होने के बाद पितरों के निमित्त शुद्ध भोजन बनाकर एक दोने में साड़ी सामग्री रख कर किसी बबूल के वृक्ष अथवा पीपल या बड़ किजद में रख कर आ जाएँ,पीछे मुड़कर न देखें। नित्य प्रति घर में देसी कपूर जाया करें। ये कुछ ऐसे उपाय हैं,जो सरल भी हैं और प्रभावी भी,और हर कोई सरलता से इन्हें कर पितृ दोषों से मुक्ति पा सकता है। लेकिन किसी भी प्रयोग की सफलता आपकी पितरों के प्रति श्रद्धा के ऊपर निर्भर करती है।

पितृदोष निवारण के लिए करें विशेष उपाय ( नारायणबलि नागबलि) | Take special measures to get rid of Pitra Dosh (Narayan Bali Nagbali)

अक्सर हम देखते हैं कि कई लोगों के जीवन में परेशानियां समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती। वे चाहे जितना भी समय और धन खर्च कर लें लेकिन काम सफल नहीं होता। ऐसे लोगों की कुंडली में निश्चित रूप से पितृदोष होता है।

यह दोषी पीढ़ी दर पीढ़ी कष्ट पहुंचाता रहता है, जब तक कि इसका विधि-विधानपूर्वक निवारण न किया जाए। आने वाली पीढ़ीयों को भी कष्ट देता है। इस दोष के निवारण के लिए कुछ विशेष दिन और समय तय हैं जिनमें इसका पूर्ण निवारण होता है। श्राद्ध पक्ष यही अवसर है जब पितृदोष से मुक्ति पाई जा सकती है। इस दोष के निवारण के लिए शास्त्रों में नारायणबलि का विधान बताया गया है। इसी तरह नागबलि भी होती है।

क्या है नारायणबलि और नागबलि

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नारायणबलि और नागबलि दोनों विधि मनुष्य की अपूर्ण इच्छाओं और अपूर्ण कामनाओं की पूर्ति के लिए की जाती है। इसलिए दोनों को काम्य कहा जाता है। नारायणबलि और नागबलि दो अलग-अलग विधियां हैं। नारायणबलि का मुख्य उद्देश्य पितृदोष निवारण करना है और नागबलि का उद्देश्य सर्प या नाग की हत्या के दोष का निवारण करना है। इनमें से कोई भी एक विधि करने से उद्देश्य पूरा नहीं होता इसलिए दोनों को एक साथ ही संपन्न करना पड़ता है।

इन कारणों से की जाती है नारायणबलि पूजा

जिस परिवार के किसी सदस्य या पूर्वज का ठीक प्रकार से अंतिम संस्कार, पिंडदान और तर्पण नहीं हुआ हो उनकी आगामी पीढि़यों में पितृदोष उत्पन्न होता है। ऐसे व्यक्तियों का संपूर्ण जीवन कष्टमय रहता है, जब तक कि पितरों के निमित्त नारायणबलि विधान न किया जाए।प्रेतयोनी से होने वाली पीड़ा दूर करने के लिए नारायणबलि की जाती है।परिवार के किसी सदस्य की आकस्मिक मृत्यु हुई हो। आत्महत्या, पानी में डूबने से, आग में जलने से, दुर्घटना में मृत्यु होने से ऐसा दोष उत्पन्न होता है।

क्यों की जाती है यह पूजा …?

शास्त्रों में पितृदोष निवारण के लिए नारायणबलि-नागबलि कर्म करने का विधान है। यह कर्म किस प्रकार और कौन कर सकता है इसकी पूर्ण जानकारी होना भी जरूरी है। यह कर्म प्रत्येक वह व्यक्ति कर सकता है जो अपने पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता है। जिन जातकों के माता-पिता जीवित हैं वे भी यह विधान कर सकते हैं।संतान प्राप्ति, वंश वृद्धि, कर्ज मुक्ति, कार्यों में आ रही बाधाओं के निवारण के लिए यह कर्म पत्नी सहित करना चाहिए। यदि पत्नी जीवित न हो तो कुल के उद्धार के लिए पत्नी के बिना भी यह कर्म किया जा सकता है।यदि पत्नी गर्भवती हो तो गर्भ धारण से पांचवें महीने तक यह कर्म किया जा सकता है। घर में कोई भी मांगलिक कार्य हो तो ये कर्म एक साल तक नहीं किए जा सकते हैं। माता-पिता की मृत्यु होने पर भी एक साल तक यह कर्म करना निषिद्ध माना गया है।

कब नहीं की जा सकती है नारायणबलि नागबलि | When Narayan Bali can not be done Nagbali

नारायणबलि गुरु, शुक्र के अस्त होने पर नहीं किए जाने चाहिए। लेकिन प्रमुख ग्रंथ निर्णण सिंधु के मतानुसार इस कर्म के लिए केवल नक्षत्रों के गुण व दोष देखना ही उचित है। नारायणबलि कर्म के लिए धनिष्ठा पंचक और त्रिपाद नक्षत्र को निषिद्ध माना गया है।धनिष्ठा नक्षत्र के अंतिम दो चरण, शततारका, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद एवं रेवती, इन साढ़े चार नक्षत्रों को धनिष्ठा पंचक कहा जाता है। कृतिका, पुनर्वसु, विशाखा, उत्तराषाढ़ा और उत्तराभाद्रपद ये छह नक्षत्र त्रिपाद नक्षत्र माने गए हैं। इनके अलावा सभी समय यह कर्म किया जा सकता है।

पितृपक्ष सर्वाधिक श्रेष्ठ समय

नारायणबलि- नागबलि के लिए पितृपक्ष सर्वाधिक श्रेष्ठ समय बताया गया है। इसमें किसी योग्य पुरोहित से समय निकलवाकर यह कर्म करवाना चाहिए। यह कर्म गंगा तट अथवा अन्य किसी नदी सरोवर के किनारे में भी संपन्न कराया जाता है। संपूर्ण पूजा तीन दिनों की होती है।


संकलित
श्री पित्रलोक अधीश्वर अर्यमा पित्रराजाय नमः
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एक विशेष उपाय | a special remedy

पितृ पक्ष में प्रतिदिन दक्षिण दिशा में मुंह कर के दिन में देढ़ बजे के पहले कंडा गर्म कर के उस पर गुड़ घी की 5-7 आहुतियां सर्व पितरेभ्यो स्वधा या पुरखों के नाम से छोडे बाद में सीधी हथेली में जल ले कर धूप पर तीन बार घुमाकर अंगूठे से जमीन पर छोड़ें । जिन पुरखों का गया श्राद्ध हो चूका हो उनके लिए भी किया जा सकता है
शास्त्रों में कोई मनाही नहीं है। भ्रम में न रहे कि किसी को भोजन पर आमंत्रित करने से कोई कैसे नाराज हो सकता है

आप अपने सभी दिवंगत संबंधियों नातेदारों रिश्ते दालों ननिहाल पक्ष दादा दादी का परिवार सहित अपने दिवंगत मित्र मंडली सहित अपने दिवंगत पालतू पशु पक्षियों सहित देश पर शहीद जवानों को भी आमंत्रित कर उनसे आपका आतिथ्य ग्रहण करने की प्रार्थना कर सकते हैं। कई लोग अकाल मृत्यु मर जाते हैं आप उनसे भी निवेदन कर सकते हैं। अभी कयी गोवंश गायों की लिंपी वायरस बिमारी से अकाल मृत्यु हुई है । आप उन्हें भी आमंत्रित कर उनकी आत्म शांति के लिए प्रार्थना कर सकते हैं। ये एक नया आध्यात्मिक अनुभव होगा।
जो कर सकते हैं अवश्य ही करें

पितृपक्ष सोलह श्राद्ध के समय एवं नियमों की रूपरेखा | Outline of time and rules of Pitru Paksha Sixteen Shradh

०१)10/09/22- शनिवार- पूर्णिमा
०२) 11/09/22- रविवार- प्रतिपदा
०३) 12/09/22- सोमवार- द्वितीया
०४) 13/09/22- मंगलवार- तृतीया
०५) 14/09/22- बुधवार- चतुर्थी
०६) 15/09/22-। गुरुवार- पंचमी
०७) 16/09/22- शुक्रवार- षष्ठी
०८) 17/09/22- शनिवार- सप्तमी
०९) 18/09/22- रविवार- अष्टमी
१०) 19/09/22- सोमवार- नवमी
११) 20/09/22- मंगलवार-दशमी
१२) 21/09/22- बुधवार- एकादशी
१३) 22/09/22- गुरुवार- द्वादशी
१४) 23/09/22- शुक्रवार- तृयोदशी
१५) 24/09/22- शनिवार- चतुर्दशी
१६) 25/06/22- रविवार- अमावस्या


👉श्राद्ध कर्म से जुड़े कुछ बिन्दुओं को सेव कर रखें-🙏


👉 श्राद्ध कर्म करने और ब्राह्मण भोजन का समय प्रातः 11:36 बजे से मध्याह्न 12:24 बजे तक का है। इस समय को कुतप वेला कहते हैं। यह समय मुख्य रूप से श्राद्ध के लिए प्रशस्त है।
👉 धर्मग्रन्थों के अनुसार श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी तिथि पर श्राद्ध करते हैं।
👉 ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है। वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है।
👉 पूर्णिमा तिथि के दिन देहान्त होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है। इसी दिन से महालय (श्राद्ध) का प्रारम्भ भी माना जाता है।
👉 श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए।
👉 पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्षभर तक प्रसन्न और तृप्त रहते हैं।
👉 धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि पितरों को पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।
👉 श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्ड दान तथा तिलांजलि प्रदान कर सन्तुष्ट करेंगे। इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं। यही कारण है कि धर्मशास्त्रों में प्रत्येक गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य रूप से करने के लिए कहा गया है।

🌞 कुछ विशेष बातें🌞


👉 1- श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए। दस दिन के अन्दर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।
👉 2- श्राद्ध में चॉंदी के बर्तनों का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही, राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है। पितरों के लिए चॉंदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिया जाए तो वह अक्षय और तृप्तिकारक होता है। पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चॉंदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।
👉 3- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।
👉 4- ब्राह्मण को भोजन ‘मौन रहकर’ एवं व्यञ्जनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए, क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं, जब तक ब्राह्मण मौन रहकर भोजन करें !
👉 5- जो पितृ, शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए। इससे वे प्रसन्न होते हैं।
👉 श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए। पिण्डदान पर कुदृष्टि पड़ने से वह पितरों तक नहीं पहुॅंचता है।
👉 6- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते हैं। वे शाप देकर लौट जाते हैं।
👉 7- श्राद्ध में जौं, कांगनी, मटर और सरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है। तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है। तिल वास्तव में पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं। कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाती है।
👉 8- दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए। वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मन्दिर दूसरे की भूमि पर श्राद्ध किया जा सकता है, क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है।
👉 9- चाहे मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण का चयन करते समय न सोचे, लेकिन पितृ कार्य में योग्य ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए, क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।
👉 10- जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहने वाली अपनी बहिन, दामाद और भाऩजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहॉं पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।
👉 11- श्राद्ध करते समय यदि कोई भिक्षुक आ जाए तो उसे आदरपूर्वक भोजन करवाना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसे समय में घर आए याच़क को भगा देता है उसका श्राद्ध कर्म पूर्ण नहीं माना जाता है।
👉 धर्मग्रन्थों के अनुसार सायंकाल का समय राक्षसों के लिए होता है, यह समय सभी कार्यों के लिए निन्दित है। अत: शाम के समय श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।
👉 13- श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करते हैं। श्राद्ध के लिए कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया है।
👉 14- जैसा कि रात्रि को राक्षसी समय माना गया है, रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। वैसे ही दोनों सन्ध्याओं के समय प्रातः काल व सायं भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए। दिन के आठवें मुहूर्त्त (कुतपकाल) अपराह्न में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है।

👉 15- श्राद्ध में ये चीजें होना महत्त्वपूर्ण हैं- गङ्गा जल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल।
👉 केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है। सोने, चॉंदी, कांसे, ताम्बा,पीतल के पात्र उत्तम हैं। इनके अभाव में पत्तल उपयोग में लाई जा सकती है।
👉 16- तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णुलोक चले जाते हैं। तुलसी से पिण्ड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक सन्तुष्ट रहते हैं।
👉 17- रेशमी, कम्बल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं। आसन में लोहा (स्टील) किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।
👉 18- चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।


🌞 श्राद्ध के प्रमुख अङ्ग इस प्रकार हैं🌞
👉 तर्पण- इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गन्ध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।
👉 भोजन व पिण्ड दान- पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है। श्राद्ध करते समय चावल या जौं के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।
👉 वस्त्र दान करना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।
👉 यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है। जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता।
👉 21 – श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें
👉 22- पितरों की पसन्द का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है।
👉 23- तैयार भोजन में से गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें।
👉 इसके बाद हाथ में जल, अक्षत (चावल), चन्दन, फूल और तिल लेकर संकल्प करें।
👉 24- श्वान और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं, किन्तु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं। इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं।
👉 पूर्ण तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मण को तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान देकर आशीर्वाद पाएं।
👉 25- इसके बाद परिजनों, मित्रों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।
👉 26- पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है। पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में सपिण्डों (एक ही परिवार के) को श्राद्ध करना चाहिए । एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करता है।
👉 पितृ पक्ष सोलह दिन की समयावधि होती है, जिसमें पुत्र या सगोत्र अपने पूर्वजों को भोजन अर्पण कर श्रद्धांजलि देते हैं।🌞

पितृपक्ष ( महालय ) के आरंभ होने से कुछ दिन पूर्व ही लोगों में पितृपक्ष को लेकर अनेक तरह की शंकाये उत्पन्न होती हैं और वे पंडितों से इस के संदर्भ में प्रश्न करना शुरू कर देते हैं ।
श्राद्ध क्या है, कब करें, कैसे करें, तिथि कौन सी होगी इत्यादि। प्रस्तुत लेख में मैंने इस तरह की सभी शंकाओं का समाधान करने का प्रयास किया है । साथ ही इस वर्ष किस तिथि का श्राद्ध किस तारीख में पड़ेगा उसकी सूची संलग्न की है । सभी लोग इसका लाभ उठावे ।

श्राद्ध किसे कहते है ? What is the meaning of Shardha?

श्राद्ध क्या है? यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। प्रत्येक हिन्दू व सनातनी को इसका अर्थ ज्ञात होना चाहिये।


श्राद्ध कर्म में वाक्य की शुद्धता तथा क्रिया की शुद्धता मुख्य रूप से आवश्यक है ।


पितरों वाक्यमिच्छन्ति भावमिच्छन्ति देवता

महालय में मुख्यतः दो तरह के श्राद्ध किए जाते

  1. पार्वण श्राद्ध 2. एकोदिष्ट श्राद्ध, परंतु कुछ लोग जो मृत्यु के समय सपिण्डन नहीं करवा पाए वे इन दिनों में सपिण्डन भी करवाते हैं ।
    जिस श्राद्ध में प्रेत पिंड का पितृ पिण्डों में सम्मेलन किया जाता है उसे सपिण्डन श्राद्ध कहते हैं । इसी सपिण्डन श्राद्ध को सामान्य बोलचाल की भाषा में पितृ मेलन या पटा में मिलाना कहते हैं ।
    प्रश्न उठता है सपिण्डन कब करना चाहिए?
    सपिण्डन के विषय में तत्वदर्शी मुनियों ने अंत्येष्टि से 12 वे दिन, तीन पक्ष, 6 माह में या 1 वर्ष पूर्ण होने पर सपिण्डन करने को कहा है । 1 वर्ष पूर्ण होने पर भी यदि सपिण्डन नहीं किया गया है तो 1 वर्ष उपरांत कभी भी किया जा सकता है परंतु जब तक सपिण्डन क्रिया संपन्न नहीं हो जाती तब तक सूतक से निवृत्ति नहीं मानी जाती जिसका उल्लेख गरुड़ पुराण के 13 वे अध्याय में किया गया है और कर्म का लोप होने से दोष का भागी भी बनना पड़ता है ।
  2. श्राद्ध करना क्यों आवश्यक है ?
    इस सृष्टि में हर वस्तु का जोड़ा है सभी चीजें अपने जोड़े की पूरक हैं उन्हीं जोड़ों में एक जोड़ा दृश्य और अदृश्य जगत का भी है और यह दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं । पितृलोक भी अदृश्य जगत का हिस्सा है और अपनी सक्रियता के लिए दृश्य जगत के श्राद्ध पर निर्भर है । तो उनकी सक्रियता के निमित्त हमें श्राद्ध करना चाहिए । अर्यमा भगवान श्री नारायण का अवतार हैं एवं संपूर्ण जगत के प्राणियों के पितृ हैं । तो जब हम पितरों के निमित्त कोई कार्य करते है।

पितृ गीत से क्या आशय है ? What is meant by the Pitra Geet ?

👉 विष्णुपुराण में पितरों के द्वारा कहे गये वे श्लोक हैं जो पितृ गीत के नाम से जाने जाते हैं।

इस गीत से पता लगता है कि पितरगण अपने वंशजों (संतानों) से पिण्ड-जल और नमस्कार आदि पाने के लिए
कितने लालायित रहते हैं।

यह अनुभूति ही पितरों की अपने वंशजों से भावनात्मक लगाव की परिचायक है।

कूर्मपुराण के अनुसार पितर अपने पूर्व गृह यह जानने के लिए आते हैं कि उनके परिवार के लोग उन्हें विस्मृत तो नहीं कर चुके हैं।

इस पितृ गीत का सार यह है कि मनुष्य को अपनी शक्ति व सामर्थ्यानुसार पितरों के उद्देश्य से अन्न,फल,जल,फूल आदि कुछ-न-कुछ अवश्य अर्पण करना चाहिए।

जिनको भगवान ने सम्पत्ति दी है,उनको तो दिल खोल कर पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध व दान करना चाहिए।

जिनकी आय सीमित है उनको भी परलोक में पितरों को सुख पहुंचाने के लिए स्वयं कष्ट सहकर श्राद्ध-तर्पण आदि करना चाहिए।

जो लोग अपने मृत माता-पिता और प्रियजनों को भूल जाते हैं और श्राद्ध के माध्यम से पितृपक्ष में उन्हें याद नहीं करते हैं, उनके लिए कुछ भी नहीं करते हैं, उनके पितर दु:खी व निराश होकर शाप देकर अपने लोक वापिस लौट जाते हैं फिर इस अभिशप्त परिवार को जीवन भर कष्ट-ही-कष्ट झेलना पड़ता है और मरने के बाद नरक में जाना पड़ता है।

मार्कण्डेयपुराण में बताया गया है कि जिस कुल में श्राद्ध नहीं होता है, उसमें दीर्घायु, नीरोग व वीर संतान जन्म नहीं लेती है और परिवार में कभी मंगल नहीं होता है ।

यदि परिजन श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करते हैं तो पितर उन्हें आशीर्वाद देकर अपने लोक चले जाते हैं । श्राद्ध से बढ़कर और कोई कल्याणकारी कार्य नहीं है और वंशवृद्धि के लिए तो पितरों की आराधना ही एकमात्र उपाय है । परिवार में किसी संतान का जन्म होने वाला हो तो पितर अच्छी आत्माओं को संतान रूप में भेजने में सहयोग करते हैं, पितरगण हमारी मदद करते हैं, प्रेरणा देते है, प्रकाश देते हैं, तथा आनन्द और शान्ति देते हैं।

पितृ गीत – हिन्दी अर्थ सहित….

अपि धन्य: कुले जायादस्माकं मतिमान्नार: ।
अकुर्वन्वित्तशाठ्यं य: पिण्डान्नो निर्वपिष्यति ।।

पितृगण कहते हैं — हमारे कुल में भी क्या कोई ऐसा बुद्धिमान, धन्य पुरुष पैदा होगा जो धन के लोभ को छोड़कर हमें पिण्डदान करेगा ।

रत्नं वस्त्रं महायानं सर्वभोगादिकं वसु ।
विभवे सति विप्रेभ्यो योऽस्मानुद्दिश्य दास्यति।।

जो प्रचुर सम्पत्ति का स्वामी होने पर हमारे लिए ब्राह्मणों को बढ़िया-बढ़िया रत्न, वस्त्र, सवारियां और सब प्रकार की भोग-सामग्री देगा।

अन्नं न वा यथाशक्त्या कालेऽस्मिन्भक्तिनम्रधो:।
भोजयिष्यति विप्राग्रयांस्तन्मात्रविभवो नर: ।।

बड़ी सम्पत्ति न होगी, केवल खाने-पहनने लायक होगी तो जो श्राद्ध के समय भक्ति के साथ विनम्र बुद्धि से श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्ति भर भोजन ही करा देगा।

असमर्थोऽन्नदानस्य धान्यमामं स्वशक्तित: ।
प्रदास्यतिद्विजाग्येभ्य: स्वल्पाल्पां वापि दक्षिणाम् ।।

भोजन कराने में भी असमर्थ होने पर जो श्रेष्ठ ब्राह्मणों को कच्चा धान और थोड़ी सी दक्षिणा ही दे देगा।

तत्राप्यसामर्थ्ययुत: कराग्राग्रस्थितांस्तिलान् ।
प्रणम्य द्विजमुख्याय कस्मैचिद्भूप दास्यति ।।

यदि इसमें भी असमर्थ होगा तो किन्हीं श्रेष्ठ ब्राह्मण को एक मुट्ठी तिल ही दे देगा।

तिलैस्सप्ताष्टभिर्वापि समवेतं जलांजलिम् ।
भक्तिनम्रस्समुद्दिश्य भुव्यस्माकं प्रदास्यति ।।

अथवा हमारे उद्देश्य से भक्तिपूर्वक विनम्र-चित्त से सात-आठ तिल से युक्त जल की अंजलि ही दे देगा।

यत: कुतश्चित्सम्प्राप्य गोभ्यो वापि गवाह्निकम्।
अभावे प्रोणयन्नस्मांछ्रद्धायुक्त: प्रदास्यति ।।

इसका भी अभाव होगा तो कहीं से एक दिन का चारा ही लाकर प्रेम और श्रद्धापूर्वक हमारे लिए गौ को खिला देगा।

सर्वाभावे वनं गत्वा कक्षमूलप्रदर्शक: ।
सूर्यादिलोकपालानामिदमुच्चैर्वदिष्यति ।।

इन सभी वस्तुओं का अभाव होने पर जो वन में जाकर दोनों हाथ ऊंचे उठाकर कांख दिखाता हुआ पुकार कर सूर्य आदि लोकपालों से कहेगा कि—

न मेऽस्ति वित्तं धनं च नान्यंच्छ्राद्धोपयोग्यंस्वपितृन्नतोऽस्मि ।
तृप्यन्तु भक्त्यापितरो मयैतौ कृतौ भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य ।।

मेरे पास श्राद्ध के योग्य न वित्त है, न धन है, न कोई अन्य सामग्री है, अत: मैं अपने पितरों को नमस्कार करता हूँ । वे मेरी भक्ति से ही तृप्त हों। मैंने अपनी दोनों भुजायें दीनता से आकाश में उठा रखी हैं।

इस प्रकार पितरों के प्रति श्रद्धाभाव ही उन्हें सबसे बड़ी तृप्ति प्रदान करता है….

सदैव प्रसन्न रहिये। जो प्राप्त है, पर्याप्त है…. बस इसी सोच के साथ आप अपना व अपने परिवार का ख्याल रखते हुयें सदा हंसते – मुस्कुराते रहें और सदा चलते रहें जोश, जुनून और जज्बे के साथ। सोशल मीडिया पर जारी एक कविता बहुत सुंदर है।

|| पितरों को नमन||🙏


वो कल थे तो आज हम हैं*
*उनके ही तो अंश हम हैं |
*जीवन मिला उन्हीं से*
उनके कृतज्ञ हम हैं ||
सदियों से चलती आयी
श्रंखला की कड़ी हम हैं |
गुण धर्म उनके ही दिये
उनके प्रतीक हम हैं ||
रीत रिवाज़ उनके हैं दिये
*संस्कारों में उनके हम हैं |
*देखा नहीं सब पुरखों को*
*पर उनके ऋणी तो हम हैं ||
*पाया बहुत उन्हीं से पर*
न जान पाते हम हैं |
दिखते नहीं वो हमको
*पर उनकी नज़र में हम हैं ||
*देते सदा आशीष हमको*
धन्य उनसे हम हैं |
खुश होते उन्नति से
दुखी होते अवनति से |
देते हमें सहारा
*उनकी संतान जो हम हैं ||
*इतने जो दिवस मनाते*
मित्रता प्रेम आदि के |
पितरों को भी याद कर लें
*जिनकी वजह से हम हैं ||
*आओ नमन कर लें कृतज्ञ हो लें*
क्षमा माँग लें आशीष ले लें |
पितरों से जो चाहते हमारा भला
उनके जो अंश हम हैं ||
|| पितृ देवाय नम: ||🙏
🌾🌾जय श्री राम 🌾🌾

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