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Sheetla Mata Ashtami | Photo, Muhurat, Pooja Vidhi. Story

शीतला माता| Sheetla Mata

शीतला माता का वर्णन हिन्दू साहित्य के स्कंद पुराण में किया गया है।  स्कंद पुराण में शीतला माता को चेचक व त्वचा  रोगों की देवी बताया गया है। शीतला माता के साथ ज्वरासुर [ज्वर का दैत्य] हैजे की देवी, चौंसठ रोग, घेंटुकर्ण त्वचा रोग के देवता एवं रक्तवती देवी विराजमान होती हैं। सम्पूर्ण भारत मे शीतला माता की पूजा परिवार के बच्चों को चेचक, खसरा इत्यादि त्वचा रोगों से दूर रखने के लिए किया जाता है। शीतला माता की जनमानस में बहुत अधिक मान्यता हैं।

शीतला माता की पूजा चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को की जाती हैं।  इस त्योहार को कुछ क्षेत्रों में बसौड़ या बसौरा भी कहते हैं। शीतला माता की पूजा अष्टमी को की जाती है। इस त्योहार के आयोजन हेतु भोजन  सप्तमी को बनाया जाता है और दूसरे दिन यानी अष्टमी को भोजन को ही खाया जाता है। इस त्यौहार पर विशेष प्रकार का भोजन बनाया जाता है। इस भोजन को ठंडा भी कहते है।  कहते हैं कि शीतला माता की पूजा से चेचक का रोग ठीक होता है।

शीतला माता का चित्र | Photo of Sheetla Mata

Sheetla Mata Ji Photo | शीतला माता की फोटो

स्कंद पुराण में शीतला माता के विवरण व पुरातन मंदिरों में शीतला माता की मूर्ति के अनुसार शीतला माता  अपने हाथों में कलश, सूप, झाडू और नीम के पत्ते धारण करती है। शीतला माता की सवारी गर्दभ हैं। शीतला माता के मंदिर में माताजी के साथ  ज्वरासुर ( ज्वर का दैत्य) , हैजे की देवी, चौंसठ रोग, घेंटुकर्ण त्वचा रोग के देवता एवं रक्तवती देवी की मूर्तियों की भी स्थापना की जाती हैं।

शीतला माता की पूजा का मुहूर्त | Pooja Muhurat of Sheetla Mata

शीतला अष्टमी 4 अप्रैल को मनाई जाएगी। पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 06:08 AM से शाम 06:41 PM तक रहेगा। कुल अवधि 12 घण्टे 33 मिनट की होगी। शीतला सप्तमी शनिवार को मनाई जाएगी। अष्टमी तिथि का प्रारम्भ 4 अप्रैल को 04:12 AM बजे से होगा और इसकी समाप्ति 5 अप्रैल 2:59 AM बजे होगी।

शीतला माता की पुजा की विधि | Pooja Vidhi of Sheetla Mata

शीतला माता की पूजा विधि निम्नानुसार है

Sheetla Mata Pooja Vidhi | शीतला माता की पूजा की विधि

शीतला अष्टमी के दिन सुबह स्नान करके शीतला माता की पूजा की जाती है। ठंडे और बासी व्यंजन का शीतला माता को भोग लगाया जाता हैं।

शीतला माता की पूजा इस तरह कीजिये -

पूजा करने शीतला सप्तमी के एक दिन पहले मिठाई, करबा, केर-

सांगरी की सब्जी, भट (ओलिया), खाजा, चुरमा, मगद, नमक पारे, शकर पारे,  पकौड़ी, राबड़ी, बाजरे की रोटी, पूड़ी सब्जी आदि बना लें। कुल्हड़ में मोठ, बाजरा भिगो दें। पूजा करने से पहले इस सामग्री में से कुछ  नहीं खाना चाहिए। माता जी की पूजा के लिए ऐसी रोटी बनानी चाहिए जिनमे सिकाई के निशान नहीं हों। इसी दिन यानि सप्तमी के एक दिन पहले छठ को रात को सारा भोजन बनाने के बाद रसोई की साफ सफाई करके पूजा करें। रोली,
मौली, पुष्प, वस्त्र आदि अर्पित कर पूजा करें। इस पूजा के बाद चूल्हा नहीं जलाया जाता है।

शीतला सप्तमी के एक दिन पहले नौ Conavare, एक कुल्हड़ और एक दीपक कुम्हर के यहाँ से मंगला लेने चाहिए। बासोड़े के दिन सुबह जल्दी उठकर ठंडे पानी से नहायें । एक प्लेट में कंडवारे भरें। कनवारे में थोड़ा दही, राबड़ी, चावल (ओलिया), पुआ, पकौड़ी, नमक पारे, रोटी, शक्कर पारे, भीगा मोठ बाजरा आदि जो भी बनाया हो रखें। एक अन्य थाली में रोली, चावल, मेहंदी, काजल, हल्दी, लच्छा (मोली), वस्त्र, होली की रखी हुई बड़कुले की एक माला, सिक्क और जल कलश रखें एवं पानी से बिना नमक के आटा गूंथकर इस आटे से एक छोटा दीपक बना लें। इस दीपक में रुई की बत्ती घी में डुबोकर लगा लें। यह दीपक बिना जलाये ही माता जी को चढ़ाया जाता है।

पूजा के लिए स्वच्छ सुथरे और सुंदर वस्त्र पहनना चाहिए। पूजा की थाली पर, कंवरों पर और घर के सभी सदस्यों को रोली. हल्दी से केक करें। स्वयं के भी टीका कर लें। हाथ जोड़ कर माता से प्रार्थना करें की ' हैं माता, मान लेना और हम पूजा करने वालो पर शीतल बने रहना।' इसके बाद मन्दिर में गो पूजा तो घर पर पूजा कर सकती हैं। करें। यदि शीतला माता के घर पर हो तो सबसे पहले माता जी को जल से स्नान कराएँ। रोली और हल्दी से केक करें। कलगल, मेहंदी, लच्छा, वस्त्र अर्पित करें । तीन कनवारे का सामान अर्पित करें। बड़े माता, बोदरी और अचपड़े (खसरा) के लिए बड़कुले की माला अर्पित करें। आटे का दीपक बिना जलाये अर्पित करें। आरती या गीत आदि गा कर माँ की अर्चना करें। शीतला माता की आरती के लिए यहाँ क्लीक करें। हाथ जोड़ कर आशीर्वाद लें। अंत में वापस जल चढ़ाए, और चढ़ाने के बाद जो जल बहता है, उसमें से थोड़ा जल लोटे में डाल दें। यह जल पवित्र होता है। यह घर है।  जल घर के हर हिस्से में छिड़कना चाहिए। इससे घर की शुद्धि होती है।

पथवारी जी की पूजा

शीतलामाता की पूजा के बाद पथवारी की पूजा करनी चाहिए। एक कुंडवारे का सामान यहाँ अर्पित करें। शीतला माता की कहानी, पथवारी की कहानी और गणेश जी की कहानी सुने। इसके बाद जहां कहीं होली का कार्यक्रम हुआ था वहां आकर पूजा करें एवं थोड़ा पुआ, पकौड़ी, बाजरा व एक कुंडवारे का सामान अर्पित करें ।  घर आने के बाद परिंदे पर मटकी की पूजा करें।  बचे हुए कनवारे का सामान कुम्हारी को या गाय को और ब्राह्मणी को दें।

इस प्रकार शीतला माता की पूजा संपन्न होती है।  ठन्डे व्यंजन सपरिवार मिलजुल कर खाएँ और बासोरा त्यौहार का आनंद लीजिये। शीतला पूजा के दिन सिर नहीं धोते, सिलाई नहीं करते, सुई नहीं पायोते, चक्की या चरखा नहीं चलाते हैं। यह अगता माँ और पिताजी रखते हैं। इसी दिन गणगौर की पूजा के लिए जवारे बोये जाते है।

शीतला माता की कहानी | Story of Sheetla Mata

शीतला माता की कथा

शीतला माता की कथा व कहानी एक ही हैं । यह अत्यंत पुरानी कहानी है एवम शीतला माता की पूजा के दौरान ही इसका वाचन किया जाता है। कहानी इस प्रकार है कि  एक बार शीतला माता ने सोचा कि  धरती

पर मेरी पूजा कौन करता है? एवम कौन मुझे मान्यता देता है। यही सोचकर शीतला माता धरती पर राजस्थान के डुंगरी गाँव में अवतरित हुई उन्हें यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि डूंगरी गाँव में उनका मंदिर भी नही है एवम ना ही ग्रामवासियों द्वारा उनकी पुजा की जाती है। माता शीतला जब गाँव कि गलियो में भृमण करने लगी तभी एक मकान के ऊपर से किसी ने चावल का उबला पानी (मांड) छत से फेंका तो वह उबलता पानी शीतला माता के ऊपर गिरा जिससे शीतला माता के शरीर में (छाले) फफोले पड गये। शीतला माता के पुरे शरीर में जलन होने लगी।

शीतला माता गाँव में इधर उधर जलन व दर्द के कारण  भाग भाग के चिल्लाने लगी। शीतला माताजी दर्द में चिल्लाते हुए कहने लगी कि "अरे। मैं जल गई!  मेरा शरीर तप रहा है! मेरा शरीरजल रहा हैं।  कोई मेरी मदद करो"।

उस गाँव में किसी ने शीतला माता कि मदद नही करी। गावँ की एक झोपड़ी के  बाहर एक कुम्हारन (कुम्हार जाती की महिला) बैठी हुई थी। उस कुम्हारन ने देखा बूढी माई तो बहुत जल गई है। इसके पुरे शरीर में तपन है। इसके पुरे शरीर में (छाले) फफोले पड़ गये है। यह तपन सहन नही कर पा रही है। तब उस कुम्हारन ने विनम्रतापूर्वक बूढ़ी माई के रूप में शीतला माता को अपने पास बैठाया व बड़ी सेवा से  बूढ़ी माई के शरीर के ऊपर ठंडा पानी डाला।  कुम्हारन ने उस बूढी माई पर खुब ठंडा पानी डाला और बोली की  है माँ मेरे घर में रात कि बनी हुई राबड़ी रखी है थोड़ा दही भी है। आप  दही-राबड़ी खा लें। जब बूढी माई ने ठंडी (जुवार) के आटे कि राबड़ी और दही खाया तो उसके शरीर को ठंडक मिली।


तब उस कुम्हारन ने कहा "आ माँ ! बेठ जा तेरे सिर के बाल बिखरे हे ला में तेरी चोटी गुथ देती हूँ।" और कुम्हारन माई कि चोटी गूथने हेतु (कंगी) कागसी बालो में करती रही। अचानक कुम्हारन की  नजर उस बुडी माई के सिर के पिछे पड़ी तो कुम्हारन ने देखा कि एक आँख बालो के अंदर छुपी हैं। यह देखकर वह कुम्हारन डर के मारे कांप गई व घबराकर भागने लगी।तब बूढी माई के वेश में आई शीतला माता ने कहा कि " रुक जा ।बेटी,  तु डर मत। मैं कोई भुत प्रेत नही हूँ। मैं शीतला देवी हूँ। मैं तो इस घरती पर देखने आई थी कि मुझे कौन मानता है। कौन मेरी पुजा करता है। इतना कह माता चारभुजा वाली हीरे जवाहरात के आभूषण पहने सिर पर स्वर्णमुकुट धारण किये अपने असली रुप में प्रगट हो गई

माता के दर्शन करके  कुम्हारन निहाल हो गई व सोचने लगी कि अब मैं  गरीब शीतला  माता जी की आवभगत कैसे करूँ?  माताजी को किस आसन पर बिठाऊ? कुम्हारन को पेशोपेश में देखकर शीतला  माता बोली कि " हे बेटी।  तु किस सोच मे पड गई हैं?"  तब उस कुम्हारन ने हाथ जोड़कर आँखो में आसु बहाते  हुए कहा- "है शीतला माँ।  मेरे घर में तो चारो तरफ दरिद्रता पसरी हुई  हैं।  मैं एक गरीब स्त्री आपकी आवभगत कैसे करूँ?  मेरे घर में ना तो चौकी है, ना बैठने का आसन। तब शीतला माता प्रसन्न होकर उस कुम्हारन के घर पर खड़े हुए गधे पर बैठ कर एक हाथ में झाड़ू उठाया एवम  दूसरे हाथ में डलिया लेकर उस कुम्हारन के घर कि दरिद्रता को  हमेशा के लिए झाड़कर उस  डलिया (ग्रामीण क्षेत्र में प्रयुक्त एक पात्र)  में भरकर फेक दिया और उस कुम्हारन से कहा की "  है बेटी , में तेरी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हु अब तुझे जो भी चाहिये मुझसे वरदान मांग ले।"

तब कुम्हारन ने हाथ जोड़ कर कहा कि " है शीतला माता,  मेरी इच्छा है

अब आप इसी (डुंगरी) गाँव मे स्थापित होकर यही रहिये एवम जिस प्रकार आपने आपने मेरे घर कि दरिद्रता को अपनी झाड़ू से साफ़ कर दूर किया हैं उसी प्रकार  आपकी जो भी व्यक्ति  होली के बाद आने व सप्तमी को भक्ति भाव से पुजा कर आपको ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन अर्पित करेगा  उसके घर की  दरिद्रता आप साफ़ करना।  आपकी पुजा करने वाली नारी  जाति (महिला) सुहाग अखण्ड  रखना। उसकी गोद हमेशा भरी रखना। साथ ही जो पुरुष शीतला सप्तमी को नाई के यहा बाल ना कटवाये , धोबी को कपडे धुलने के लिए नही देवे । जो  पुरुष आप पर ठंडा जल चढ़ाकर, नरियल फूल चढ़ाकर परिवार सहित ठंडा बासी भोजन करे उसके काम धंधे व्यापार में कभी दरिद्रता ना आये।"

तब शीतला माता बोली " तथाअस्तु!!"  है बेटी!  जो तुने वरदान मांगे वह समस्त वरदान मैं तुझे देती हूँ एवं  तुझे आर्शिवाद देती हूँ कि मेरी पुजा का मुख्य अधिकार इस धरती पर सिर्फ कुम्हार जाति का ही होगा।  उसी दिन से डुंगरी गाँव में शीतला माता स्थापित हो गई और उस गाँव का नाम हो गया शील कि डुंगरी।   डुंगरी ग्राम में शीतला माता जी  का मुख्य मंदिर है। शीतला सप्तमी पर वहाँ बहुत विशाल मेला भरता है। इस कथा को पढ़ने से घर कि दरिद्रता का नाश होने के साथ सभी मनोकामना पुरी होती है।

जोधपुर में शीतला माता पूजा

राजस्थान के जिला जोधपुर में शीतला माता की पूजा अष्टमी के स्थान पर सप्तमी को आयोजित की जाती है। ऐसा कहा जाता हैं की शीतला अष्टमी को जोधपुर के प्रमुख परिवार में ऐतिहासिक समय में किसी दुर्घटना के कारण शीतला माता की पूजा यहाँ सप्तमी को करनी की परम्परा हैं।