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| On 3 years ago

शिक्षा पर व्यय का सामाजिक अंकेक्षण भी जरूरी।

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रोटी, कपड़ा व मकान के बाद शिक्षा व स्वास्थ्य एक अनिवार्य विषय वस्तु है। गर्व से कहा जा सकता है कि सनातन समय से ही भारत मे शिक्षा को बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। हमारी गुरुकुल शिक्षा प्रणाली विश्व की सर्वोत्तम प्रणाली रही है।

हमारे नालन्दा व तक्षशिला के विश्वविद्यालयों का नाम आज भी बड़ी इज़्ज़त से लिया जाता है। वेद, पुराण, मीमांसा, साहित्य, उपनिषद, ग्रन्थो इत्यादि की प्रचुरता व उत्कृष्टता के कारण सम्पूर्ण विश्व मे भारत को "विश्व गुरु" का दर्जा दिया गया है।

1 फरवरी को वित्त मंत्री  ने साल 2017-18 का आम बजट पेश किया। इस बजट में शिक्षा क्षेत्र के लिए कुल 79, 685.95 करोड़ रूपए का आवंटन किया गया। इसमें से स्कूली शिक्षा (प्राथमिक और सीनियर सेकेंडरी) के लिए  46,356.25 करोड़ रूपए और शेष उच्च शिक्षा के लिए आवंटित किया गया है।

उपरोक्त बजट राशि के अतिरिक्त राज्यो द्वारा जारी बजट राशि का योग सम्मिलित करने पर एक विशाल राशि का उपयोग होना दर्शित होता है। इस राशि से इतर निजी क्षेत्र में किया गया शैक्षणिक व्यवस्था हेतु निवेश के वास्तविक समंक उपलब्ध नही है।

किसी भी अर्थव्यवस्था में उपलब्ध संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग सुनिश्चित करना राज्य व नागरिक दोनों की सामुहिक जिम्मेदारी है। संसाधनों के अपव्यय होने से राज्य का कल्याण नही हो सकता है। शिक्षा जगत में मात्र धनराशि ही प्रयुक्त नही होती बल्कि अनगिनत मानवीय वर्षो का भी विनियोग होता है।

अब यह समय आ गया है कि हम शिक्षा में हुए व जारी विनियोग का अंकेक्षण करे व यह सुनिश्चित करे कि इस विशाल विनियोग से हमे अधिकतम रिटर्न प्राप्त हो सके। आज कई प्रकार के लीकेज भी देखने मे आ रहे है।

एक विद्यार्थी को प्रारम्भिक शिक्षा से पूर्व ही 3 महत्वपूर्ण वर्षो का विनियोग "पूर्व प्राथमिक शिक्षा" के नाम पर करना पड़ रहा है। स्कूली शिक्षा अब 3+8+2+2=15 वर्ष की हो गयी है। इसके पश्चात भी किसी उन्नत प्रोफेशनल कोर्स को करने हेतु एक या दो वर्ष का तैयारी समय अतिरिक्त है। कुल जमा किसी प्रोफेशनल कोर्स को करने में 15+1+4=20 वर्ष का विनियोग हो जाता है। इसके पश्चात विशेषज्ञ बनने हेतु 2 वर्ष का अतिरिक्त समय भी लगता है।

यह सही है कि "ज्ञान मिले तो चीन जाने में भी हर्जा" नही लेकिन यह ज्ञान सिर्फ मौद्रिक कारणों से मिलना उचित नही। आज विभिन्न बैंकों द्वारा एजुकेशनल लोन दिए जा रहे है। इस वर्ष इन बैंकों के 1173 करोड़ के एजुकेशनल लोन एनपीए हो गए है।

बहुत अफसोस कि बात यह है कि देश मे इंजीनियरिंग, एमबीए जैसी व्यवसायिक शिक्षा प्राप्त किये हुए लाखो युवा छोटी से छोटी राजकीय सेवा हेतु आवेदन कर रहे है जो कि यह प्रमाणित करता है कि इन व्यवसायिक शिक्षा केंद्रों में पूर्ण शिक्षा प्रदान नही की जा रही है।

इस विशाल विनियोग के पश्चात भी वर्तमान में कोई भी भारतीय शिक्षा संस्थान विश्व के प्रथम 100 की सूची में सम्मिलित नही है। इस प्रश्न का उत्तर आज आवश्यक है। इसी के प्रत्युत्तर व सामाजिक अंकेक्षण से ही हम भविष्य हेतु कार्ययोजना का निर्माण कर सकेंगे। शुरुआत होनी चाहिए मात्र व्यवस्था को  दोष देने मात्र से ही उज्जवल भविष्य का निर्माण सम्भव नही होगा।