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| On 3 years ago

Soorma versus Sanju : It's time to decide the future of Nation.

Soorma versus Sanju : It's time to decide the future of Nation.

पूरे देश के सिनेमाघरों में अभी दो बायोपिक रिलीज हुई है, पहली हॉकी के अंतरराष्ट्रीय मशहूर "ड्रैग फ्लिकर" संदीप सिंह पर बनी " सूरमा " व दूसरी प्रसिद्ध फ़िल्म स्टार संजय दत्त पर निर्मित "संजू"।

बॉक्स ऑफीस कलेक्शन।

"संजू" ने पहले दो सप्ताह में 300 करोड़ के कलेक्शन का रिकॉर्ड बना लिया है, फ़िल्म का पहले दिन का कलेक्शन भी "रेस 3" से भी ज्यादा करीबन 35 करोड़ रहा। फ़िल्म पूरे इंडिया तकरीबन 4 हजार से ज्यादा स्क्रीन पर रिलीज हुई।
इसके विपरीत "सूरमा" 1100 स्क्रीन पर रिलीज हुई और इसने पहले दिन 3.5 करोड़ का कलेक्शन किया है। बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के

अनुसार जहाँ "संजू" साल की सबसे बड़ी कमाई देने वाली एक फ़िल्म है वहीं " सूरमा" लागत निकाल ले तो भी गनीमत रहेगी।

संदीप सिंह व सुरमा

अर्जुन अवार्डी संदीप सिंह चीते की तेजी व बाज की रफ्तार से 145 किलोमीटर की स्पीड से बॉल को विपक्षी टीम के गोलपोस्ट पर बजा देते थे। संदीप सिंह को सिर्फ एक खिलाड़ी के रूप में ही नही देखा जा सकते बल्कि वे हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जबरदस्त "रोल मॉडल" है।
अपने अंतरराष्ट्रीय खेल जीवन की पहली सफलता मिलते ही एक हादसे में उन्हें गोली लग गई और वे कम्पलीट लाचार हो गए। गोली लगने के बाद वो कोमा में चले गए और उनकी कमर से नीचे

का शरीर कम्पलीट पेरेलाइज़ हो गया।
संदीप ने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति, खेल फेडरेशन व परिवार के सहयोग से रिहैबिलिटेशन सेंटर में 6 महीने रहकर खुद को पैरों पर खड़ा किया लेकिन तब तक वे गुमनामी के काले अंधेरे में खो गए थे।
एक बार फिर उनका अंतरराष्ट्रीय पर एक कप्तान के तौर पर खेलना हमारी आने वाली पीढियों के लिए हमेशा उत्प्रेरक का कार्य करेगा। जब भी जिंदगी किसी युवा को मुश्किलों में डालेगी तो वह संदीप सिंह के किरदार से प्रेरणा लेकर खुद को संभाल लेगा।

संजय दत्त और "संजू"

संजय दत्त के प्रति आवश्यक हमदर्दी , सहानुभूति व उनके साथ विभिन्न घटनाओं के बावजूद भी हमे यह तो मानना ही पड़ेगा कि उन्होंने अपने आरम्भिक

जीवन में हासिल सुविधाओं का बेजा दुरपयोग किया।
संजय दत्त ने अपने जीवन मे बहुत बुरे समय का सामना भी किया, उन्होंने तकलीफे भी झेली व कुछ हद तक कमबैक भी किया लेकिन विराट भारतीय संस्कृति व उच्च भारतीय मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में संजय दत्त को हम कमसेकम "रोल मॉडल" तो कदापि नही स्वीकार कर सकते।

जनमानस का संदेश।

संदीप सिंह सैद्धान्तिक बढ़त के बावजूद भी बाजार में बहुत पीछे रह गए है। उन के जीवन पर बनी "सूरमा" क्वालिटी व कंटेंट में "संजू" पर भारी है लेकिन बॉक्स ऑफिस की कसौटी पर बहुत हल्की है।
जनता-जनार्दन "संजू" की हर हरकत पर तालियाँ बजा-बजा कर उनकी हर बेजा हरकत को परोक्ष स्वीकृति प्रदान कर रही है वही जाबांज सितारे संदीप सिंह के जीवट भरे जीवन को देखने के लिए चंद लोग ही सिनेमाघरों में बैठे है।

मीडिया भी कठघरे में।

आज से संजय दत्त के बारे में हम सबकुछ जानते है लेकिन विश्व के सर्वश्रेष्ठ "ड्रैग फ्लिकर" के बारे में हमारी जानकारी बहुत सीमित है। ऐसा क्यों? क्योकि मीडिया देश के इन वास्तविक हीरोज पर बहुत कम लिखता है जबकि इन सेलेब्स की छोटी से छोटी हरकत पर घण्टो बहस जारी रखता है।

अब फैसला आप पर।

"उपभोक्ता बाजार का राजा है"। अगर आप सूरमा जैसी श्रेष्ठ फिल्में पसन्द करेंगे व सिनेमाघरों में पहुँच कर सकारात्मक फिल्मों की हौसलाअफजाई करेंगे भविष्य में और बेहतरीन फिल्में मिलेंगी।