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| On 2 months ago

चौथे भाव में सूर्य का फल | स्वास्थ्य, करियर और धन

चौथे भाव में सूर्य होने से जातक लोकप्रिय तथा सर्वजनप्रिय होता है। कोमल हृदय होता है । गीत और वाद्यकलाओं में प्रेम होता है। मनुष्य सुखहीन, बन्धुहीन, भूमिहीन, मित्र रहित तथा भवनहीन होता है। घर-गृहस्थी और धन सम्पत्ति को नष्ट करनेवाला होता है।

चौथे भाव में सूर्य का फल

चौथे भाव में सूर्य का शुभ फल (Positive Results of Surya in 4th House in Astrology)

  • चौथे भाव में सूर्य (Surya in 4th House) होने से मां से अनेक प्रकार के सुख मिलते हैं। मित्रों से कई तरह के लाभ एवं सुख प्राप्त होते हैं। राजकुल से धन और मान की प्राप्ति होती है। राज्यसत्ता, राजसेवा प्राप्त होती है। राजप्रिय होता है। अतिशोभायुक्त अधिकार प्राप्त होता है।
  • चौथे स्थान में सूर्य होने से जातक लोकप्रिय तथा सर्वजनप्रिय होता है। कोमल हृदय होता है गीत और वाद्यकलाओं में प्रेम
    होता है। युद्ध में आगे होकर लड़ता है कभी पीठ नहीं दिखाता है। स्त्री सुख तथा विपुलधन-सुख मिलता है।
  • चौथे भाव में सूर्य होने से जातक की एक स्त्री, संतति भी थोड़ी, नौकरी अच्छी, मध्यायु में वाहनसुख होता है। 22वें वर्ष में सभी काम ठीक हो जाते हैं सुप्रतिष्ठित हो जाता है।
  • मध्यावस्था (28 से 50 वर्ष) में स्थिति अच्छी रहती है। अपनी कमाई से घर आदि बना लेता है। वाहनसुख होता है। आयु के अन्तिम भाग में यश की प्राप्ति होती पिता को भी सुख देता है। रवि बलवान वा शुभग्रहों से दृष्ट हो तो अच्छी स्थिति प्राप्त होती है।      
  • चौथे स्थान में सूर्य के शुभफल तब मिलते हैं जब सूर्य मिथुन, कन्या, तुला, धनु, मकर और मीन में हो। चतुर्थेश बलवान् हो अपनी राशि में त्रिकोण में वा केन्द्र में हो तो
    सवारी मिलती है।

चौथे भाव में सूर्य का अशुभ फल (Negative Results of Surya in 4th House in Astrology)

  • जन्मलग्न से चौथे स्थान में सूर्य (Surya in 4th House) होने से जातक चिन्ताग्रस्त, कठोर, पितृधन नाशक, भाइयों से वैर करनेवाला, गुप्त विद्याप्रिय एवं वाहन सुखहीन होता है। शरीर गर्म रहता है। हीनांग होता है, अर्थात् उसके शरीर में कोई अंग विकल या कम होता है। अहंकारी (घमण्डी) होता है।

  • चौथे स्थान में सूर्य होने से जातक प्राय: आम लोगों से लड़ाई झगड़ा करता रहता है। दुर्बल, निष्ठुर तथा बुरों की संगति में रहनेवाला होता है। प्रभावशाली नहीं होता है-अर्थात् अपने व्यक्तित्व से किसी को प्रभावित नहीं कर सकता है।

  • जातक सर्वदा सन्देहयुक्त और परेशान रहता है। हृदय में दु: का अनुभव करता है। मन में पीड़ा रहती है। प्रसन्नचित नहीं रहता है वेश्याओं में आसक्त, निरानन्द तथा व्यर्थ

    घूमनेवाला होता है।
  • भाई-बन्धुओं से विग्रह अर्थात् लड़ाई-झगड़ा रहता है। बन्धु-बान्धवों के सुख से वंचित रहता है।शत्रुओं से संघर्ष होने पर पराजय का मुख देखना पड़ता है। मानभंग होता है। पिता से विरोध करने वाला होता है। बुद्धि स्थिर नहीं होती है।

  • चौथे स्थान में सूर्य होने से जातक का चित्त शान्त नहीं रहता है अर्थात् चित्त में घबराहट और उद्विग्नता रहती है। पिता के द्वारा अर्जित धन का नाश हो जाने के कारण चिन्तायुक्त रहता है।

  • जीविका की तलाश में प्राय: परदेश वास या घूमना-फिरना पड़ता है। अपने घर में स्थायीरूपेण रहने नहीं पाता है-अर्थात् देश-विदेश घूमता-भटकता फिरता है। अत: गृहसुखहीन भी होता है। सुख से भी वंचित रहता है। एक स्थान पर टिक कर नहीं रहता है परदेश में भटकता फिरता है।

  • मनुष्य सुखहीन, बन्धुहीन, भूमिहीन, मित्र रहित तथा भवनहीन होता है। घर-गृहस्थी और धन सम्पत्ति को नष्ट करनेवाला

    होता है। धनहीन और धान्यहीन होता है। धन का सुख नहीं होता है।
  • चरित्रहीन राजा के आश्रय में रहता है। बचपन में माता या पिता की मृत्यु होती है। बचपन में कई एक और भी कष्ट होते हैं। वृद्धावस्था (उत्तरवय) कष्टमय बीतता है। किन्तु मृत्यु शांति से और शीघ्र होती है। चतुर्थ रवि का सामान्यफल निम्न है:-पहिली अवस्था में दु:, मध्य में सुख, में पुन: दु:ख।

  • चतुर्थेंश के साथ कोई पापग्रह होने से अथवा पापग्रह की दृष्टि होने से अथवा चतुर्थेश किसी दुष्टस्थान में स्थित होने से अच्छी सवारी नहीं मिलती। जातक के पास जमीन नहीं होती। दूसरे के घर पर निवास करना होता।