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आठवें भाव में सूर्य का फल | स्वास्थ्य, करियर और धन | Sun in Eighth House in Hindi

आठवे भाव में सूर्य होने से जातक त्यागशील और ख्यातिमान् होता है। पण्डित और विद्वानों की सेवा करता है।

आठवें भाव में सूर्य का फल

आठवें भाव में सूर्य का शुभ फल (Positive Results of Surya in 8th House in Astrology)

  • आठवें भाव में सूर्य होने से जातक का रुप मनोहर तथा स्वभाव चंचल होता है। जातक त्यागशील और ख्यातिमान् होता है।पण्डित और विद्वानों की सेवा करता है। जातक का धन लोग चुरा ले जाते हैं या मूर्खतावश स्वयं ही गंवा देता है।
  • आठवें भाव में सूर्य होने से जातक मिथ्या भाषण करने वाला
    तथा भाग्यहीन होता है। व्यवहार सदैव कष्ट भोगता है। जातक लड़ने झगड़ने में विशेष चतुर होता है। जातक कभी भी सन्तुष्ट नहीं होता है। जातक को पुत्र सुख में कमी रहती है।
  • जातक को नीचवृत्ति के लोगों की सेवा करनी पड़ती है। विदेश में वास करता है। जातक के शत्रुओं की संख्या में अधिकता होती है। सूर्य पित्तरोग, अण्डवृद्धि, कुष्ठ, प्रमेह जैसे रोग करता है तथा अपनी दशा में दूसरे ग्रहों के सहचार से मृत्यु तुल्य कष्ट दिया करता है।
  • आठवें भाव में सूर्य होने से जातक को गुदा रोग अर्थात बवासीर होता है।
    बाल्यावस्था में शारीरिक कष्ट बहुत होते हैं    
  • अष्टम भाव में सूर्य उच्च अथवा स्वक्षेत्री होने से जातक दीर्घायु होता है।   अष्टमेश बलवान होने से जमीन का स्वामी होता है।

आठवें भाव में सूर्य का अशुभ फल (Negative Results of Surya in 8th House in Astrology)

  • आठवें भाव में सूर्य (Surya in 8th House) होने से जातक को चिन्तातुर, धैर्यहीन, निर्धन और व्यसनी बनाता है। जातक का धन लोग चुरा ले जाते हैं या मूर्खतावश स्वयं ही गंवा देता है।

  • आठवें भाव में सूर्य होने से जातक मिथ्या भाषण करने वाला, भाग्यहीन

    तथा आचरणहीन होता है। व्यवहार अति चालाक होता है। सदैव कष्ट भोगता है। जातक लड़ने झगड़ने में विशेष चतुर होता है। जातक कभी भी सन्तुष्ट नहीं होता है।
  • आठवें भाव में सूर्य से जातक के चरित्र का अंग हो जाती है इसलिये स्वास्थ्य और सम्पत्ति का नाश इसके परिणाम के रूप में प्राप्त होता हैं।जातक को पुत्र सुख में कमी रहती है। चौपाये जानवर आदि की हानि होती है।

  • जातक को नीचवृत्ति के लोगों की सेवा करनी पड़ती है। विदेश में वास करता है। जातक के शत्रुओं की संख्या में अधिकता होती है। सूर्य पित्तरोग, अण्डवृद्धि, कुष्ठ, प्रमेह जैसे रोग करता है तथा अपनी दशा में दूसरे ग्रहों के सहचार से मृत्यु तुल्य कष्ट दिया करता है।

  • आठवें भाव में सूर्य होने से जातक को गुदा रोग अर्थात बवासीर होता है। जातक की स्त्री पर-पुरुषगामिनी होती है। स्वयं की मृत्यु स्त्री की मृत्यु से पहले होती है। वृद्धावस्था में दरिद्रता योग होता है। बाल्यावस्था में शारीरिक कष्ट बहुत होते हैं