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नवे भाव में सूर्य का फल | स्वास्थ्य, करियर और धन

नवे भाव में सूर्य होने से कुल के लोगों का हित चाहने वाली, देवताओं, ब्राह्मणों में श्रद्धा रखने वाली होती है। साहसी, सदाचारी, योगी, तपस्वी तथा सत्यवक्ता होती है।

नवे भाव में सूर्य का फल

नवे भाव में सूर्य का शुभ फल (Positive Results of Surya in 9th House in Astrology)

  • नवमभाव में सूर्य (Surya in 9th House) होने से जातिका रूपवान् होती है और उसके केश सुन्दर होते हैं। कुल के लोगों का हित चाहने वाली, देवताओं, ब्राह्मणों में श्रद्धा रखने वाली होती है। साहसी, सदाचारी, योगी, तपस्वी तथा सत्यवक्ता होती है।

  • जातिका शुभकर्म

    करती है तो उसके मूल में दंभ होता है-दिखावा होता है-परन्तु यह भी मान-प्रतिष्ठा और यश का कारण हो जाता है। जातिका में नेतृत्व के गुण होते हैं।
  • नवें भाव में सूर्य होने से जातिका संसार में प्रसिद्ध, दूसरों के धन से सुखी और सुशोभित होती है। युवाअवस्था में स्थिरता मिलती है तथा धनाढ़्य होती है। नौकर-चाकरोें तथा वाहन का सुख मिलता है।

  • सम्पत्ति और सम्पत्ति जनित सुखों का उपभोग करती है तथा अपने वर्चस्व से समाज में पूजित हुआ करती है। मातृसुख एवं पुत्रसुख प्राप्त होती है। पुत्र सर्वथा योग्य होते हैं।गुरुजनों तथा देवताओं में

    श्रद्धा रखती है।
  • जातिका कुल परम्परा प्राप्त श्रोतस्मार्त धर्म में तथा क्रियाकाण्ड (कर्मकाण्ड) में रुचि रखता है। नवमभाव का रवि कुछ कुछ ख्याति अवश्य देता है।

  • नवें भाव में सूर्य होने से जातिका धार्मिक होती है तथा सूर्य आदि देवताओं की पूजक होती है। जलराशि (4, 8, 12) में हो तो सागर पर्यटन करने वाली होती है।     

  • कर्क, वृश्चिक और मीन में सूर्य होने से जातिका कवि, नाटककार या रसायन विद्या की संशोधक हो सकता है।

नवे भाव में सूर्य का अशुभ फल (Negative Results of Surya in 9th House in Astrology)

  • नवें भाव में

    सूर्य (Surya in 9th House) होने से जातिका अभागा, विद्याहीन, विवेकहीन और दुष्ट स्वभाव की होती है। जातिका की तपस्या शुभ भावनामूलक नहीं होती, अत: चित्त अशान्त ही रहता है। परदेश में रहने से मन उद्विग्न और असन्तृप्त रहता है।
  • नवें भाव में सूर्य होने से जातिका के काम में बहुत विघ्न होते हैं। सहोदर भाइयों से तथा अन्य लोगों से चिन्ता बराबर बनी रहती है। पिता से और पति से प्रेम नहीं होता है अर्थात् इनके साथ विरोध रखता है।

  • जातिका के सम्बन्ध मातृकुल से अच्छे नहीं रहते प्रत्युत इसका व्यवहार और बर्ताव मामा-मामी आदि से शत्रु

    जैसा होता है।
  • जातिका रोगी और दीन होती है। बचपन में रोग होते हैं। जातिका का गुरुजनों से वैमनस्य रहता है। अपने कुलपरम्परागत धर्म को छोड़कर दूसरे के धर्म को अपनाती है। अर्थात् विधर्मी हो जाती है।

  • नवमभाव स्थित सूर्य का सामान्य फल इस प्रकार है:-पूर्ववय में कष्ट, मध्यवय में सुख और उत्तर आयु में पुन: दु:ख।