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शिक्षक स्वयम् में एक पूर्ण इकाई (Teacher is a Complete Unit in Himself in Hindi)

शिक्षक स्वयम् में एक पूर्ण इकाई

"गुरु गोविन्द दोउ खड़े, किसके लागु पाय।
बलिहारी गुरु आपकी, गोविन्द दियो बताय।।"

शिक्षक स्वयम् में एक पूर्ण इकाई (Teacher is a Complete Unit in Himself in Hindi) :

दुनिया का हर प्रोफेशन अपने ज्ञान क्षेत्र में संकलन, अध्ययन, वर्गीकरण व निर्णय हेतु बाह्य कारको पर निर्भर रहता है, इसके विपरीत शिक्षक जब शिक्षण कार्य में सलग्न होता है तब यह प्रक्रिया स्वतः ही स्वाभाविक रूप से घटित होती हैं।

रामायण व महाभारत युग में भी एक गुरु के नाम से उनका गुरुकुल स्थापित, संचालित व विकसित होता था, जैसे

द्रोणाचार्य जी का गुरुकुल, कृपाचार्य जी का गुरुकुल इत्यादि। ये गुरु ही अपने ज्ञान के अनुसार अपने गुरुकुल का पाठ्यक्रम, दशा-दिशा, नियम-विधान तय करते थे। राज्य का उन पर सीधा नियंत्रण नहीं था। राजा इन गुरुकुलो को पूर्ण स्वायतता के साथ ही सम्मान प्रदान करते थे।

साधारण नागरिको के बच्चे " पोशाल" में अध्ययन करते थे। इनकी प्रमुख विशेषता अनुशासन व एकल शिक्षक होना था। शिक्षा के यह केंद्र सामान्य नागरिको हेतु जीवनयापन हेतु प्राथमिक शिक्षा प्रदान करते थे। इनके संचालक " गुरासा" समाज से अत्यंत अल्प सहयोग प्राप्त कर अपने विचारानुसार ही अपनी संस्था संचालित करते थे।

आज के इस प्रोफेशनल युग में निजी क्षेत्रो के प्रतिष्ठीत शिक्षण संस्थान भी किसी एक व्यक्ति विशेष की सोच के अनुसार ही पल्लवित हुए है। इन संस्थानों की सफलता में प्रवर्तक शिक्षक की सोच, विचारधारा व कार्यशैली की सीधी दखल देखी जा सकती हैं।

एक संस्थान अपने जीवन में कई दौर देखता है। अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि किसी एक व्यक्ति विशेष के कार्यकाल में संस्थान ने अभूतपूर्व ख्याति अर्जित की थी। उस दौर में उस व्यक्ति विशेष द्वारा अपनी सोच के साथ अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा का निवेश कर सभी को नेतृत्व प्रदान किया था।

आज जितने भी शिक्षण तरीके या नवाचार है वे कठोरतम सामजिक स्थितियों में एकल प्रयासों से ही प्रस्फुटित हुए है। शिक्षा क्षेत्र के ये " स्कुल ऑफ़ थॉट्स" एकल व्यक्ति ही रहे हैं।

एकल व्यक्ति अवधारणा का यह मतलब कदापि नहीं है कि " समूह " महत्वहीन है, अपितु ये कहना उचित है कि शिक्षा में " एकल " व " समूह " एक दूसरे को गतिमान करते है, मोमेंटम प्रदान करते है। "एकल" रूप में शिक्षक अन्वेषण करता है एवम् " समूह " रूप में कार्य कर उदाहरण प्रस्तुत करता है एवम् परिणाम में सामूहिक सम्पति रूप में समाज को श्रेष्ट संस्था प्राप्त होती है।
सादर।
सुरेन्द्र सिंह चौहान।

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