The great martyr: Gangu Mehtar, Gangu Baba, GanguDeen of Kanpur.

देश के अमर शहीद: गंगू मेहतर।

“भारत की माटी में हमारे पूर्वजों का खून व कुर्बानी कि गंध है, एक दिन यह मुल्क आजाद होगा।”-स्वतंत्रता सेनानी गंगू मेहतर (5.6.1858)

गंगू मेहतर को कई नामों से पुकारा जाता है। मेहतर जाति के होने से गंगू मेहतर, पहलवानी का शौक होने से गंगू पहलवान, सती चौरा गांव में इनका पहलवानी का अखाड़ा था, कुश्ती के दांव पेच एक मुस्लिम उस्ताद से सीखने के कारण गंगूदीन और लोग इन्हें श्रद्धा प्रकट करने के लिए गंगू बाबा कहकर भी पुकारते हैं।

गंगू मेहतर के पुरखे जिले कानपुर के अकबरपुरा गांव के रहने वाले थे। उच्चवर्णों की बेगार, शोषण और अमानवीय व्यवहार से दुखी होकर इनके पुरखे कानपुर शहर के चुन्नी गंज इलाके में आकर रहने लगे थे।

अंग्रेज शासक लॉर्ड डलहौजी की राज्य हड़प नीति के चलते तथा मराठों की हार होने पर मराठों के अंतिम पेशवा बाजीराव वहाँ से भागकर कानपुर जिले के बिठुर नगर में बस गए। यहाँ आने के बाद बाजीराव ने 5 विवाह और किए, इससे पहले छह विवाह कर चुके थे, 11 पत्नियों के होते हुए भी उनके कोई संतान नहीं हुई। 1827 में उसने धोड़पत नाना साहब को गोद लिया। 1851 में बाजीराव की मृत्यु के बाद कंपनी ने नाना को दत्तक वारिस मानने से इंकार कर दिया और पेंशन बंद कर दी। फिर भी नाना साहब अंग्रेजों की सरपरस्ती में बड़े हुए। किंतु नाना साहब को पेशवा का दर्जा नहीं मिला।

कानपुर शहर से 15 किलोमीटर दूर गंगा नदी के तट पर भारत की ऐतिहासिक धरोहर बिठुर नगर है। बिठुर नगर के इतिहास में बौद्ध साहित्य की गाथाओं का मानना है कि बिठूर में महास्थविर बोधिसत्व का यहाँ संघाराम है और इसमें मेहतर जाति के लोग अधिकतर रहते हैं।

नाना साहब ने जब अपनी फौज का विस्तार किया तो बहुत सी अछूत जातियों पासी मल्लाह धानुक और मेहतर के लोगों को उसमें स्थान दिया था। गंगू बाबा नगाड़ची के रूप में भर्ती हुए थे और अपनी योग्यता के बल पर सूबेदार ( गंगादीन के रूप में) के पद तक पहुंचे थे। गंगू मेहतर, नाना साहब का विश्वास पात्र सेवक था। गंगू मेहतर में देशभक्ति का जबरदस्त जज्बा था।

25.6.1857 को नाना साहब का अंग्रेजों से समझौता हो गया। इधर सती चौरा गांव में समाधान मल्लाह, बुद्ध चौधरी तथा बिठूर के लोचन मल्लाह व ब्रिगेडियर ज्वाला प्रसाद को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया, उन्हें कठोर यातनाएं दी। फिर अंग्रेजों ने बिठूर पर चढ़ाईकर 19 जुलाई 1857 को नाना साहब के किले पर तोपें बरसा दी। नाना साहब और तात्या टोपे अपने अंगरक्षक आभा धानुक के हाथों 11वीं पत्नी मैनावती को सौंप कर भाग गए। आभा धानुक महीनों अंग्रेजों से लड़ते रहे। अंततः आभा धानुक और मेनावती अंग्रेजों के हाथों मारे गए। उसी दिन हेवलोक ने गंगू मेहतर के अखाड़े पर चढ़ाई कर दी। गंगू मेहतर घोड़े पर सवार हो वीरता पूर्वक लड़ते रहे। अंत में गिरफ्तार कर लिये गए। 5 जून 1818 कानपुर में चुन्नी गंज चौराहे के पर नीम के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी गई। अंतिम तक अंग्रेजों को ललकारते रहे–

“भारत की माटी में हमारे पूर्वजों का खून व कुर्बानी कि गंध है, एक दिन यह मुल्क आजाद होगा।”

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ऐसा कहकर उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को क्रांति का संदेश दिया और देश के लिए शहीद हो गए। कानपुर के चुन्नी गंज में इनकी प्रतिमा लगाई गई है। वहां इनकी स्मृति में हर वर्ष मेला लगता है। लोग श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।

संदर्भ
पुस्तक-दलित वीर और वीरांगनाएं
प्रथम अजिल्द हिंदी संस्करण 2015
लेखक-चंदनमल नवल
मूल्य-₹100 मात्र
प्रकाशक-सम्यक प्रकाशन,32/3 पश्चिम पुरी नई दिल्ली 110063
दूरभाष 9810249452, 9818390161
के पृष्ठ 97-99 से साभार

नोट-साभार पुस्तक के नाम में दलित शब्द आया हैं। साभार सामग्री में संशोधन की ज्यादा गुंजाइश नहीं रहती। इसलिए मुझे/हमें दलित शब्द का समर्थक न समझा जाए बल्कि मैं/हम इसके स्थान पर उपयुक्त संवैधानिक शब्द अनुसूचित जाति (एस.सी.) का प्रयोग करते हैं।

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