चाणक्य भारत वर्ष का निर्माणकर्ता | The story of great Chanakya

चाणक्य भारत वर्ष का निर्माणकर्ता ( Chanakya the real builder of Bharat ) थे। आइये, ऐसे महान चाणक्य की कहानी The story of great Chanakya की बात करते हैं। विष्णुगुप्त, चाणक्य एवम कौटिल्य तीन नाम एक ही व्यक्ति के थे जो कि आज से 2300 वर्ष पूर्व भारत को एक नई दिशा देकर गए थे । विष्णुगुप्त उनका बचपन का नाम था। वे आचार्य चणक के पुत्र थे अतः चाणक्य कहलाये। जनपद कोलय में जन्म लेने के कारण उनको कौटिल्य कहा गया था।

चाणक्य का जन्म निःसन्देह 2300 वर्ष पूर्व हुआ था लेकिन उन पर कहानियों का लेखन 700 से 1200 ईसवीं पूर्व जैन, बौद्ध व अन्य साहित्य में , विशेषकर विशाखदत्त रचित नाट्य मुद्राराक्षस में, उपलब्ध हैं।

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चाणक्य तक्षशिला में आचार्य थे। तक्षशिला वर्तमान युग मे पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर में था। उसके विचारों को हम आज चाणक्य नीति कहते है तथा उनके विचार उनकी प्रसिद्ध पुस्तक अर्थशास्त्र में आज भी पढ़े जा सकते हैं। इस महान पण्डित, राजनीतिज्ञ एवम आचार्य ने राजा धनानंद को भरी सभा मे चुनोती देकर उसके विनाश की घोषणा करते हुए शपथ ली थी कि जब तक वह राजा का विनाश नही कर देता तब तक वह अपनी शिखा ( चोटी ) को खुला रखेगा।भारतवर्ष में अनेक महानायक हुए है लेकिन चाणक्य सबसे अलग प्रतीत होते है। आइये, जानते है ऐसे महान पण्डित चाणक्य के बारे में।

चाणक्य का व्यक्तिगत परिचय | Personal Introduction of Chanakya

चाणक्य के जन्म के बारे में एक जैन ग्रन्थ का कहना है कि उनका जन्म कोलय नामक जनपद में हुआ था। चाणक्य नके पिता का नाम चणक एवम माता का नाम चनेकेश्वरी था। चाणक्य के पिता के गृह सन्यासियों का निरन्तर आना-जाना था।

चाणक्य के जन्म के समय ही एक दांत आ चुका था। यह देखकर उनके घर आये जैन मुनि ने यह घोषणा की थी कि यह बालक राजा बनेगा। चाणक्य के माता-पिता इस घोषणा से स्तब्ध रह गए क्योंकि उनकी इच्छा थी कि बालक चाणक्य भविष्य में आचार्य बने। तब आगुन्तक जैन मुनि ने कहा कि यदि बालक चाणक्य का यह दांत निकाल दिया जाए तो यह राजा नही बल्कि राजा बनाने वाला आचार्य बन सकता हैं।

चाणक्य की धनानंद को चुनौती | Chanakya's challenge to Dhananand

भीतर से आघात एवम बाहर से चुनोती। धनानंद तुम अपने कर्तव्य से भटक चुके हो। भूल गए हो तुम की प्रजा के हित में ही राजा का हित होता हैं। आज में प्रण लेता हूँ कि जब तक तुम्हारी सत्ता का विनाश नही कर दूं मैं अपनी शिखा नही बांधूगा।

चाणक्य एवं चन्द्रगुप्त | Chanakya and Chandragupta

चाणक्य के पास सम्पूर्ण राष्ट्र भारतवर्ष के विकास एवम तत्कालीन मगध के राजा धनानंद के विनाश हेतु एक ब्ल्यू प्रिंट अवश्य उनकी पुस्तक "अर्थशास्त्र" के रूप में था लेकिन उसे साकार करने हेतु एक ऐसे नेतृत्व कर सकने योग्य व्यक्ति की तलाश थी जो पहले मगध एवं भविष्य में भारत का नेतृत्व कर सके। यह खोज मगध में ही चन्द्रगुप्त के रूप में पूर्ण हुई।

चाणक्य एवं चन्द्रगुप्त | Chanakya and Chandragupta www.shivira.com

चन्द्रगुप्त के बाल्यकाल एवम जन्म का पूर्ण परिचय उपलब्ध नही हैं। चन्द्रगुप्त के बारे में यह अवश्य जानकारी मिलती हैं कि वे एक साधारण परिवार से थे। उनका नन्द परिवार से कोई प्रत्यक्ष सम्बंध भी नही था। विशाखदत्त ने अपनी पुस्तक मुद्राराक्षस में चाणक्य एवं चन्द्रगुप्त की पहली मुलाकात पाटलिपुत्र के पास दिखाई हैं।

चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को पहली बार तब देखा था जबकि वे धनानंद के अधिकारियों के द्वारा किये शोषण के खिलाफ खड़े हुए थे तथा दूसरी बार जब वे 100 हाथ की दूरी से अचूक निशाना लगा रहे थे। आचार्य चाणक्य ने चन्द्रगुप्त से प्रभावित होकर उसको अपना शिष्य होना स्वीकार किया। उस समय सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण कर दिया था लेकिन राजा पोरस से कड़ी जंग के बाद उसकी सेना बिखरने लगी थी।

सिकन्दर द्वारा जीते गए प्रांत सिकन्दर के खिलाफ होने लगे थे अतः चाणक्य ने मगध विजय से पूर्व सिकन्दर के विरुद्ध चन्द्रगुप्त को खड़ा करने का निर्णय लिया। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को समझाया कि मगध व सिकन्दर के शत्रु राज्य उनके मित्र सिद्ध हो सकते हैं। चन्द्रगुप्त को चाणक्य ने "साम,दाम,दण्ड व भेद" के तरीकों को समझाया।

चन्द्रगुप्त ने अपनी पहली विजय पंजाब पर हासिल की। कुछ जैन व बौद्ध ग्रन्थ चंद्रगुप्त एवम सिकन्दर की मुलाक़ात का भी जिक्र करते है। अपनी जीत से उत्साहित चन्द्रगुप्त को जब मगध के 2 लाख से अधिक सैन्यबल की जानकारी मिली तो उन्होंने चाणक्य के समक्ष इस विचार को रखा।

तब चन्द्रगुप्त को समझाते हुए चाणक्य ने कहा कि " युद्ध मे केवल सैन्य बल ही नही बल्कि प्रजा के समर्थन व सूचना की बड़ी आवश्यकता होती हैं।" चाणक्य ने धनानंद के विद्रोही मंत्रियों एवम कुपित जनता को साथ मे लिया तथा " भीतर से

आघात तथा बाहर से आक्रमण " की नीति को अपनाया। चाणक्य ने गुप्तचरों का भी सहयोग लिया लेकिन धनानंद की विशाल सेना के समक्ष चाणक्य एवं चन्द्रगुप्त को हार का सामना करना पड़ा।

इसके बावजूद चाणक्य व चन्द्रगुप्त ने हिम्मत नही हारी। एक बार पुनः उन्होंने पेशावर से पाटलिपुत्र तक कि यात्रा में पहले छोटे-छोटे जनपदों को जीत कर अपनी सेना में सम्मिलित किया तथा अंततः मगध पर विजय हासिल कर ली। चन्द्रगुप्त की विजय के पीछे चाणक्य के निम्न सूत्र थे-

  • अपनी सैन्य क्षमता का प्रयोग करके सीधे युद्ध मे विजय प्राप्त करना।
  • दुश्मन को दुश्मन के खिलाफ खड़ा करके उस पर विजय हासिल करना।
  • पारिवारिक सम्बन्धों की स्थापना करके मित्रवत व्यवहार द्वारा समर्थन प्राप्त करना।

चाणक्य ने अंततः चन्द्रगुप्त को मगध के सिंहासन पर बैठाकर अपनी शपथ पूर्ण करके अपनी शिखा को पुनः बांधा गया।

विशाल भारत हेतु चाणक्य के विचार | Chanakya's thoughts for Greater India

आज से 2300 वर्ष पूर्व भारत एक विशाल देश था। आज हम कश्मीर से कन्याकुमारी तक सीमित है तब हम आसाम से गांधार तक विस्तृत थें। तत्कालीन समय का भारत एक विशालराष्ट्र था । मगध एक बड़ा व शक्तिशाली राज्य था। साम्राज्य के नाम से सम्बोधित किया जाता था। उस महान मगध साम्राज्य में कौटिल्य ने ना सिर्फ सीमाओं का विस्तार सुनिश्चित किया था अपितु मानवजीवन हेतु आवश्यक सुविधाओं का भी निश्चिकरण किया था।

विशाल भारत हेतु चाणक्य के विचार | Chanakya's thoughts for Greater India www.shivira.com

तत्कालीन भारत जनपदों का युग था। तब के मुख्य जनपद थे -काशी, कौशल, अंग, मगध, वज्जि, मल , चेत्या , वत्स, कुरु, पांचाल, मच्छ, सर्वसेना, अश्माका, अवन्ति एवम गांधार। इसके अलावा भी अनेक छोटे राज्य थे।

आचार्य चाणक्य के मत में भारत जैसे विशाल देश हेतु राज्य की व्यवस्था केंद्रीकृत एवम ब्यूरोकेटिक साम्राज्य व्यवस्था होनी आवश्यक हैं। चाणक्य ने केंद्र से लेकर ग्राम तक समस्त प्रकार के अधिकारियों का वर्णन किया था। जबकि इससे पूर्व ऋग्वेद समय मे भी ऐसी व्यवस्था नही थी। चाणक्य ने 2300 वर्ष पहले संस्था अध्यक्ष , नावाध्यक्ष इत्यादि जैसे नवीन पदों का सृजन किया था।

चाणक्य की पुस्तक अर्थशास्त्र | Chanakya's book Arthashastra

चाणक्य ने अपनी पुस्तक "अर्थशास्त्र" में राज्यव्यवस्था का इतना सटीक वर्णन किया है की उससे हमे इस बात का सम्पूर्ण ज्ञान होता है कि राजा के अधीनस्थ कितने मन्त्री होंगे तथा किस प्रकार भ्र्ष्टाचार पर रोक लग सकती है। वर्तमान युग के विचारक यह कहते है कि अगर भारत को एवं भारतवासी को समझना है तो पहले आप कौटिल्य की अर्थशास्त्र को समझने का प्रयास करें।

विशाल भारत हेतु चाणक्य के विचार | Chanakya's thoughts for Greater India

आचार्य चाणक्य के अनुसार मनुष्यों की जीविका को अर्थ कहा जाता है। भूमि को प्राप्त करने व इसकी रक्षा करने का निरूपण करने वाले शास्त्र को अर्थ शास्त्र कहते हैं। चाणक्य ने अर्थशास्त्र की गजब की परिभाषा दी थी। इसी पुस्तक में चाणक्य ने देश को चलाने व बनाने का एक नया दर्शन दिया था।

आचार्य चाणक्य की पुस्तक अर्थशास्त्र का एक मात्र उद्देश्य भारतवर्ष में सुशासन स्थापना की थी। इसमें उन्होंने एक चक्रवर्ती राजा के माध्यम से मजबूत केंद्रीय संस्था की परिकल्पना की थी। पुस्तक में अन्य देशों को जीतने सम्बन्धित कोई उदाहरण अथवा व्यक्तव्य नही कहे गए है अतः यह सिद्ध होता है कि भारतवर्ष सदैव से शांति व अहिंसा का समर्थक रहा हैं।

चाणक्य का सप्तांग सिद्धान्त | Chanakya's Saptang Siddhanta

चाणक्य के अनुसार किसी भी राष्ट्र के संचालन हेतू उनके अनुसार सात तथ्यों का समावेश आवश्यक था। इसे कौटिल्य अथवा चाणक्य का सप्तांग सिद्धान्त भी कहा जाता हैं। इस सिद्धांत के अनुसार किसी भी राज्य के संचालन हेतु निम्नलिखित आवश्यक हैं।

चाणक्य का सप्तांग सिद्धान्त | Chanakya's Saptang Siddhanta
  • स्वामी अर्थात राजा। आज के भारत मे यह राष्ट्रपति/ प्रधानमंत्री हैं।
  • अमात्य अर्थात मंत्री। आज के युग के समस्त केबिनेट/राज्य मंत्री इस परिभाषा में सम्मिलित हैं। चाणक्य के अनुसार जनपद संबंधी सभी कार्य अमात्य के ऊपर ही निर्भर करते हैं। कृषि संबंधी कार्य, दुर्ग निर्माण, जनपद का कल्याण, विपत्तियों से रक्षा, अपराधियों को दंड देना, राजकीय करों को एकत्रित करना आदि सभी कार्य अमात्यों द्वारा ही किये जाने चाहिये। मौर्योत्तर युग में अमात्य को सचिव कहा जाने लगा था। अमात्य राज्य के सात अंगों में दूसरा अंग है, जिसका अर्थ है- मंत्री राजा के परामर्शदाताओं के लिए 'अमात्य', 'सचिव' तथा 'मंत्री' - इन तीनों शब्दों का प्रयोग प्राय: किया जाता है। इनमें अमात्य नि:संदेह प्राचीनतम है।
  • जनपद अर्थात राष्ट्र। बिना नागरिक के राज्य की कल्पना असम्भव होती हैं। जनपद की जलवायु अच्छी होनी चाहिये, उसमें पशुओं के लिये चारागाह हो, जहाँ कम परिश्रम में अधिक अन्न उत्पन्न हो सके, जहाँ उद्यमी कृषक रहते हों, जहाँ योग्य पुरुषों का निवास हो, जहाँ निम्न वर्ग के लोग विशेष रूप से रहते हों तथा जहाँ के निवासी राजभक्त एवं चरित्रवान हों
  • कोष अर्थात टैक्स व ट्रेजरी । इसे राज्य संचालन हेतु चाणक्य ने अनिवार्य बताया था।
    इसी के कुशल संचालन से राज्य का विकास एवं रक्षा सम्भव हो सकती हैं। धर्म तथा काम संबंधी संपूर्ण कार्य कोष के माध्यम से ही संपन्न होते हैं। सेना की स्थिति कोष पर ही निर्भर करती है। कोष के अभाव में सेना पराये के पास चली जाती है, यहां तक कि स्वामी की हत्या कर देती है। कोष सब प्रकार के संकट का निर्वाह करता है। कौटिल्य का मत है,कि राजा को धर्म और न्यायपूर्वक अर्जित कोष अर्थात् धन का संग्रह करना चाहिये। कोष स्वर्ण, रजत, बहुमूल्य रत्नों, मणियों, मुद्राओं आदि से परिपूर्ण होना चाहिये, ऐसा कोष अकालादि विपत्तियों का सामना करने में समर्थ होता है।
  • दंड अर्थात सेना/पुलिस । आज आंतरिक दंड पुलिस द्वारा एवम बाह्य ख़तरे का सामना सेना करती हैं।
  • मित्र देश | चाणक्य ने अपने सिद्धांतों में मित्र देशो को भी राज्य का अनिवार्य अंग बताया था। आज भारत के मित्र देश अमेरिकी, इजरायल, रूस ,फ्रांस इत्यादि भारत की प्रमुख शक्ति हैं। चाणक्य के अनुसार मित्र की विशेषता इस प्रकार है - मित्र पिता-पितामह के क्रम से चले आ रहे हों, नित्यकुलीन, दुविधा रहित, महान एवं अवसर के अनुरूप सहायता करने वाले हों। मित्र तथा शत्रु में भेद बताते हुये चाणक्य लिखते है, कि शत्रु वह है, जो लोभी, अन्यायी, व्यसनी एवं दुराचारी होता है। मित्र इन दुर्गणों से रहित होता है।
  • दुर्ग । दुर्ग यानी किला, इस स्थान पर संकट के समय राजा व मंत्री सुरक्षित रह कर राज्य की रक्षा करते है। आज अमेरिका जैसे देश मे एयरफोर्स वन नामक हवाई जहाज है जो कि एक तरह से हवाई किला है। भारत मे यह प्रावधान सुनिश्चित कर दिया गया हैं।

चाणक्य के अनुसार एक अच्छे राजा की विशेषता | Characteristics of a good king according to Chanakya

चाणक्य की पुस्तक अर्थशास्त्र के अनुसार एक अच्छे नेता में निम्नलिखित गुण होने चाहिए।

  • उच्चकुल में उत्पन्न
  • विनयशील,
  • सत्यनिष्ठ
  • स्थूललक्ष
  • क्रतज्ञ
  • सत्यप्रतिज्ञ
  • धर्मात्मा
  • वृद्धदर्शी
  • सुख एवं दुःख में धैर्यशाली
  • बुद्धिमान
  • दैवसम्पन्न
  • आलस्यरहित
  • महान उत्साह युक्त
  • दृढ निश्चयी
  • बङी मंत्रिपरिषद वाला
  • सामंतों को आसानी से वश में करने वाला।

चाणक्य के अनुसार राजधर्म का अर्थ | Meaning of Rajdharma according to Chanakya

कौटिल्य के मूल ग्रन्थ अर्थशास्त्र का मूल शब्द है राजधर्म। राजधर्म का मतलब है की राजा एक राजऋषि के समान होता है अर्थात उसे राजकीय सम्पदा का इस्तेमाल बिना स्वार्थ के किसी ऋषि के समान करते हुए प्रजा का हित साधन करना होता हैं। स्वयं के स्वार्थ के बिना राज्यकार्य करना ही राजधर्म होता है । इन कार्यों में राज्य का हित सर्वोपरि होता हैं।

चाणक्य की घोषणा | Chanakya's announcement

कौटिल्य ने यह घोषणा की थी कि राज्य अपना स्वयम का विधान बना सकते है। राज्य का विधान शास्त्रों के विधान से ऊपर हैं। सभी राज्य धर्म व न्याय के आधार पर चलेंगे लेकिन राजा की इच्छा व धर्म से ऊपर राज्य का संविधान रहेगा।

कौटिल्य पहले विचारक थे जिन्होंने इस मत को विकसित किया कि राज्य का संविधान राजा की इच्छा, धर्म की मान्यता अथवा समाज की परम्परा से कही अधिक है तथा जबभी कोई विरोधाभास हो तब संविधान ही मान्य हो सकता हैं।

 चाणक्य एवम तक्षशिला विश्विद्यालय | Chanakya and his  University |

तक्षशिला वर्तमान समय मे पाकिस्तान के रावलपिंडी स्थान पर है तब का तक्षशिला अध्ययन व अध्यापन का केंद्र बिंदु था।

तक्षशिला भारत का महान प्राचीन विश्विद्यालय www.shivira.com

आचार्य चाणक्य ने तक्षशिला विश्विद्यालय में ही अध्ययन किया था ततपश्चात इसी विश्विद्यालय में आचार्य बने थे। आचार्य चाणक्य की गिनती प्रबुद्ध आचार्य में होती थी। उन्होंने अपनी 151 वर्ष की आयु का लंबा समय इसी विश्विद्यालय में व्यतीत किया था।

चाणक्य व सिकन्दर | Chanakya and Sikandar

जिस कालक्रम में चाणक्य तक्षशिला ने अध्यापन कर रहे थे उसी कालखंड में मैसीडोनिया में जन्म लिए हुए सिकन्दर तृतीय पूरी दुनिया मे जीत का जश्न मना रहा था। सिकन्दर ने तत्कालीन यूरोप, ग्रीस, फारस व ईरान पर कब्जा कर लिया ठगा। इसके पश्चात उसने भारत पर विजय प्राप्त करने की ठानी थी।

सिकन्दर के मार्ग में पहला भारतीय राज्य गांधार था जो कि आज के अफगानिस्तान व पाकिस्तान के नार्थ वेस्ट प्रोविंस क्षेत्र में था। उस समय गांधार पर आम्बी का शासन था। आम्बी ने सिकन्दर के सामने हथियार डाल कर अपनी पराजय बिना लड़े ही स्वीकार कर ली थी।

इसके बाद सिकन्दर ने पंजाब की तरफ कदम बढ़ाए। पंजाब पर पोरस का शासन था। पोरस ने सिकन्दर का मुकाबला जीवटता से किया लेकिन आखिरकार पोरस को पराजय मिली। पराजित पोरस को जब सिकन्दर के सामने लाया गया एवम सिकन्दर ने उसको पूछा कि पोरस का अंजाम क्या होना चाहिए तब पोरस ने जो कहा वह आज भी मशहूर है-

"मेरे साथ वही व्यवहार होना चाहिए जो एक राजा दूसरे राजा के साथ करता हैं।"

तत्कालीन भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य मगध था। तत्कालीन मगध का क्षेत्र वर्तमान समय के गया व पटना का परिक्षेत्र था। तत्कालीन मगध की सीमा में यमुना व गंगा दोनों नदियाँ समावेश थी।

तत्कालीन भारत मे जब सिकन्दर समूचे

भारत पर कब्जा करने की सोच रहा था वही चाणक्य समूचे भारत को एक करने का विचार कर रहा था। सिकन्दर तब भारत हेतु एक बड़ा खतरा था क्योंकि तब के सबसे शक्तिशाली राज्य मगध में धनानंद जैसा राजा था जिसे जनता से नही सिर्फ अपने अहंकार से मतलब था।

चाणक्य व धनानंद | Chanakya and Dhanananda

सिकन्दर के आक्रमण के समय मगध राज्य की बागडोर शासक धन नन्द अर्थात धनानंद के हाथों में थी। सिकन्दर को रोकने में मगध के अलावा किसी अन्य राज्य में सक्षमता नही थी लेकिन मगध में राजा धनानंद व उसके अधिकारियों द्वारा जनता का शोषण चरम पर था।

चाणक्य सिकन्दर के बढते कदमो से आहत होकर राजा धनानंद के दरबार मे उससे मन्त्रणा हेतु पहुचे थे। उस दिन राजा धनानंद "दान पर्व" का आयोजन करते हुए ब्राह्मणों एवम आचार्यों को दान दे रहे थे। आचार्य विष्णुगुप्त अर्थात आचार्य ने विनयपूर्वक दान स्वीकार करने से मना कर दिया था। इसे राजा धनानंद ने स्वयम का तिरस्कार समझ लिया था। जब धनानंद चाणक्य के साथ संवाद में क्रोधित हो उठा तो उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे चाणक्य को सभा से धक्के मारकर निकाल दे। ऐसा आदेश सुनकर चाणक्य ने कहा था कि -

"धनानंद, तुम अपने कर्तव्य से भटक चुके हो। तुम भूल गए हो कि प्रजा के हित में ही राजा का हित होता हैं। आज मगध तुम्हारे अन्याय व अहंकार से त्रस्त हैं लेकिन मैं ऐसा होने नही दूंगा। आज मैं प्रण लेता हूँ कि जब तक मैं तुम्हारी समूल सत्ता का विनाश नही कर दूँ तब तक मैं अपनी शिखा नही बांधूगा।"

चाणक्य का चिंतन | Chanakya's Thoughts

चाणक्य के काल मे भारतवर्ष छोटे-छोटे राज्यों व जनपदों में विभाजित था। इसी कारण वह विदेशी आक्रांताओं का सामना करने में सक्षम नही था। चाणक्य का मानना था कि सम्पूर्ण भारत एक चक्रवर्ती राजा के आधीन हो ताकि वह किसी भी विदेशी शक्ति का सामना मजबूती से कर सके।

चाणक्य राज्य, राजा व प्रजा के सम्बन्धों का गहन अध्ययन करते थे। वे अपने अध्ययन से एक ऐसे राज्य का निर्माण चाहते थे जिसमें धनानंद के समान जनता का विरोधी शासक राज्य नही कर सकता हो।

चाणक्य एवम उनकी प्रसिद्ध पुस्तक अर्थशास्त्र | Chanakya and his famous book Arthashastra

राज्य में सुशासन की स्थापना करने एवम ऐसे सुशासन की व्यवस्था कैसे कायम की जा सकती हैं। इसी विषय पर विचार करते हुए चाणक्य ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "अर्थशास्त्र" का लेखन किया था। अर्थशास्त्र नामक चाणक्य की पुस्तक वास्तव में राज्य शासन एवं प्रशासन को कगलाने की कला की पुस्तक है। इस पुस्तक में राजनीति विज्ञान, लोक प्रशासन, समाज विज्ञान एवम विदेश नीति का समावेश हैं।

भ्रष्टाचार पर चाणक्य के विचार | Chanakya's thoughts on corruption

चाणक्य भ्र्ष्टाचार से बहुत खिन्न थे उनके मत में जिस प्रकार मछली पानी मे विचरण करते समय कब पानी पीती है उसका पता नही चलता है उसी प्रकार राज्य के अधिकारी राज्य कार्य सम्पादन करते समय कब राजकीय कोष को हानि पहुंचा कर स्वयं का व्यक्तिगत लाभ प्राप्त कर लेते है दोनों का पता ही नही चलता है। उनके अनुसार आकाश में उड़ने वाले पक्षियों की गतिविधियों को पता लगाया जा सकता है लेकिन कर्मचारियों के भृष्टाचार का पता लगाना बहुत मुश्किल हैं।

भृष्टाचार उन्मूलन हेतु उनका मत था कि अधिकारियों को एक ही विभाग में नहीं रहने दिया जाना चाहिए। वे वर्ष में एक बार सभी विभागों के अधिकारियों की सामुहिक बैठक के पक्ष में थे। उनके अनुसार यह आषाढ़ पूर्व पूर्णिमा को करना सर्वश्रेष्ठ था । इस बैठक में सभी प्रकार के अधिकारियों द्वारा अपने कार्यों को क्रोसचेक करना आवश्यक था तथा गलत अधिकारी के विरुद्ध कार्यवाही आवश्यक थी।

अर्थशास्त्र की मुख्य बाते

  • राजा को साढ़े चार घण्टे से अधिक नही सोना चाहिए।
  • राजा को राज्य ऋषि होना चाहिए।
  • राज्य हेतु प्रथम प्राथमिकता जनता का सुख है।
  • संविधान किसी भी धर्म पुस्तक से सर्वोपरि हैं।
  • जागीरदारों के स्थान पर ब्यूरोकेटिक व्यवस्था से कार्य करवाया जाना चाहिए।
  • अधिकारियों का निरन्तर तबादला होना चाहिए।
  • शासक का आचरण अनुकूल होना चाहिए।

चाणक्य की सादगी | Simplicity of Chanakya

मगध जैसे शक्तिशाली राष्ट्र के नीति नियन्ता होने तथा प्रधानमंत्री के पद के बावजूद चाणक्य अत्यंत सादगी से जीवन जीते थे। वे एक कुटिया में ही निवास करते थे। आज भी अनेक ऐसे उदाहरण समाज मे उपलब्ध है जो कि सर्वशक्तिमान होने के बाद भी सादगीपूर्ण जीवन जीते है। ऐसे उदाहरण महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग, लाल बहादुर शास्त्री, एपीजे अब्दुल कलाम के रूप में उपलब्ध हैं।

चाणक्य की आयु | Age of chanakya

चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को बचपन से राजा बनने तक शिक्षा प्रदान की। इसके पश्चात उन्होंने चन्द्रगुप्त के पुत्र बिंदुसार हेतु भी कार्य किया। अनेक शास्त्रों के अनुसार चाणक्य 151 वर्ष तक जीवित रहे थे। उन्होंने मौर्य वंश की तीन पीढ़ियों को मार्गदर्शन दिया था। जैसा कि विदित है उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य को बचपन से ही मार्गदर्शन दिया था अतः उनकी 151 वर्ष की आयु का कथन स्तय प्रतीत होता हैं।

चाणक्य अंत मे हुए षड्यंत्र के शिकार | Chanakya is the victim of conspiracy in the end.

चाणक्य ने "साम, दाम , दण्ड व भेद " की नीतियों पर चलते हुए मगध को सर्वोच्च स्थान दिलवाया लेकिन अंत मे स्वंय एक षडयंत्र के शिकार हो गए थे। महाराज बिंदुसार को उनके एक अमात्य ने महामात्य चाणक्य के विरुद्ध भड़काया की चाणक्य बिंदुसार की माता की हत्या के षड्यंत्र में सम्मिलित थे। उनके खिलाफ यह षड्यंत्र सुबन्धु नामक अमात्य ने रचा था।

अपने ऊपर लगे इस आरोप ने चाणक्य को बहुत गहरी चोट पहुंचाई और वे जंगल की तरफ प्रस्थान कर गए। कालांतर में बिंदुसार के समक्ष एक दासी ने प्रस्तुत होकर समस्त सच्चाई उजागर कर दी कि चाणक्य ने बिन्दुसार की माता के पेट को चीरने का आदेश उनकी मृत्यु हेतु नही अपितु बिंदुसार के जन्म हेतु दिया था।

बिंदुसार एवम सुबन्धु स्वयम चाणक्य के पास क्षमा याचना हेतु गए। चाणक्य ने दोनों को माफ तो कर दिया था लेकिन वापस मगध की और नही लौटे।

बिंदुसार के जन्म की कथा।The story of the birth of Bindusara

चन्द्रगुप्त के बहुत सारे दुश्मन थे। आचार्य चाणक्य को यह भय था कि चंद्रगुप्त की हत्या दुश्मनों द्वारा किसी भी प्रकार से सम्भव है। वे रसोईयों के माध्यम से बहुत अलप मात्रा में जहर चन्द्रगुप्त के खाने में मिलवाते थे ताकि चन्द्रगुप्त का शरीर जहर से लड़ने का अभ्यस्त हो जाये।

चन्द्रगुप्त की गर्भवती पत्नी दुर्दुरा को इसका ज्ञान नही था। वह एक दिन चंद्रगुप्त के साथ खाना खाने को बैठ गई। भोजन पश्चात जहर के प्रभाव से उसकी मृत्यु हो गई। चाणक्य ने उसके गर्भ में मौजूद बिंदुसार को बचाने के लिए उसका पेट चिरवाकर कर शिशु बिंदुसार की रक्षा की गई थी।

चाणक्य के कथन अथवा चाणक्य नीति

  • निर्बल की कोई सहायता नही करता।
  • यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि परिषेवते । ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव हि ।। अर्थ - जो निश्चित को छोड़कर अनिश्चित का सहारा लेता है, उसका निश्चित भी नष्ट हो जाता है। अनिश्चित तो स्वयं नष्ट होता ही है ।
  • आचार्य चाणक्य के अनुसार धन से भी महत्वपूर्ण होता है धर्म। धन प्राप्ति के लिए कभी भी मनुष्य को धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।
  • जब बात रिश्तों की आए तो उस स्थिति में धन का त्याग करना चाहिए। धन से रिश्ते और उनमें बसा प्रेम समर्पण नहीं खरीदा जा सकता है। जब धन का भी नाश हो जाता है तब उस स्थिति में भी मित्र, परिवार और रिश्ते ही खराब समय में सहारा बनते हैं।
  • किसी के लिए भी उसका आत्म सम्मान सबसे महत्वपूर्ण होता है। धन से आत्म सम्मान नहीं खरीद सकते हैं। इसलिए जब बात आत्मसम्मान की हो तो धन का त्याग कर देना चाहिए।
  • राजपत्नी गुरोः पत्नी मित्र पत्नी तथैव च ! पत्नी माता स्वमाता च पञ्चैता मातरः स्मृता!! अर्थात राजा की पत्नी, मित्र व भाई की पत्नी , गुरु की पत्नी व पत्नी की माता का सदैव आदर करना चाहिए।