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| On 3 years ago

इस मिट्टी से तिलक करो, यह मिट्टी है बलिदान की- वीर प्रसूता भूमि राजस्थान की

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वीर प्रसूता राजस्थान की दो पहचान है यहाँ की सती सावित्री पुत्रियाँ और यहॉ के धीर-वीर पुत्र। इस धरती पर बेशक धान कम उपजता है लेकिन इस वीर प्रसूता की गोद मे ऐसे वीर वीरांगनाओं ने जन्म लिया है जिनके नाम के स्मरण से ही सैकड़ो तीर्थो की यात्रा का पुण्य प्रप्त हो जाता है।

आजादी मिलने के बाद क्रमशः राज्य का गठबंधन आरम्भ हुआ था जो कि  30 मार्च 1949 तक साकार हुआ, सम्पूर्ण राजस्थान के गठन की प्रक्रिया आबु दिलवाड़ा के सम्मिलित होने तक 1 नवम्बर 1956 तक जारी रही थी। आज इस विशाल राज्य में कुल 33 जिले सम्मिलित है।

अतिप्राचीन काल मे इस क्षेत्र इस क्षेत्र से होकर सरस्वती और दृशद्वती जैसी विशाल नदियां बहा करती थीं। इन नदी घाटियों में हड़प्पा, ‘ग्रे-वैयर’ और रंगमहल जैसी संस्कृतियां फली-फूलीं। आज भी इनके अवशेष खुदाई करते समय प्राप्त होते है। राजस्थान में प्राचीन सभ्यताओं के केन्द्र- कालीबंगा, रंगमहल, आहड, गणेश्वर, बागोर व बरोर है।

आजादी के पूर्व राजस्थान १९ देशी रियासतों में बंटा था, जिसमें अजमेर केन्द्रशासित प्रदेश था। इन रियासतों में उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और शाहपुरा में गुहिल, जोधपुर, बीकानेर और किशनगढ़ में राठौड़ कोटा और बूंदी में हाड़ा चौहान, सिरोही में देवड़ा चौहान, जयपुर और अलवर में कछवाहा, जैसलमेर और करौली में यदुवंशी एवं झालावाड़ में झाला राजपूत राज्य करते थे। टोंक में मुसलमानों एवं भरतपुर तथा धौलपुर में जाटों का राज्य था। इनके अलावा कुशलगढ़ और लावा की चीफशिप थी।

आज इतिहास के पन्ने उलटते है तो हर राजस्थानी का मस्तक गर्व से उठ जाता है। यह वही भूमि है जहॉ वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप, त्याग प्रतिमूर्ति पन्नाधाय, भक्त शिरोमणि मीराबाई, रुणेचा के धनी व लोक आराध्य बाबा रामदेव जी, गोभक्त व वचन के धनी वीर तेजाजी, गो रक्षा हेतु विवाह की वेदी से उठ जाने वाले पाबूजी, नई दिशा व शिक्षा प्रदान करने वाले जाम्भोजी, स्वामिभक्त दुर्गादास व मुकुनदास खींची जैसे सैकड़ों वीर -वीरांगनाओं ने जन्म लिया है।

आज राजस्थान सम्पूर्ण राष्ट्र में अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता व अनेकों पर्यटन स्थलों के कारण देशी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। यहाँ के हर जिले की अपनी पहचान व विशेषता है। बाड़मेर की रिफाइनरी, जोधपुर की आईआईटी , एनएलयू व एम्स, उदयपुर के आईआईएम , कोटा की कोचिंग प्रणाली व जयपुर की शैक्षणिक सुविधाएं इसे आधुनिक स्वरूप प्रदान कर रही है।

शब्दो मे इस प्रदेश के मरुस्थलों, पहाड़ियों, सुरम्य स्थानों, खान-पान, आवभगत, अपणायत, वेशभूषा, संस्कृति, पहनावे को व्यक्त कर पाना बहुत कठिन है। आप जब राजस्थान आएंगे तो स्वयम ही कह उठेंगे।
"इस मिट्टी से तिलक करो, यह मिट्टी है बलिदान की"।
आज राजस्थान दिवस पर शुभकामनाएं।
सादर।