योग | आइये योग को समझे। योग का इतिहास, परिभाषा, अर्थ व प्रमुख प्रकार

images283729 | Shivira Hindi News

Yoga | Let’s understand yoga. History, Definition, Meaning and Major Types of Yoga

“योग” जिसे आजकल बोलचाल की भाषा मे प्रायः “योगा” YOGA कहकर संबोधित किया जा रहा है। आइये, हम इस आलेख में योग को साधारण शब्दो मे समझने का प्रयास करते है।

योग का इतिहास | history of yoga

सामान्यतः लोग यह समझते है कि ” योग” के जनक महर्षि पतंजलि है। यह निश्चित बात है कि योग के साथ महर्षि पतंजलि का नाम इस प्रकार जुड़ा हुआ है कि हम योग व महर्षि पतंजलि को एक दूसरे का पूरक मानते है तथा यह समझने लगे गए है कि योग के जनक परमादरणीय महर्षि पतंजलि है। यहाँ हमको यह समझना होगा कि जिस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास जी से पहले भी रामायण का अस्तित्व था लेकिन उन्होंने “रामचरित मानस” के द्वारा अत्यंत सरल स्वरूप में नारायण श्री राम का चरित्र चित्रण किया उसी प्रकार आदिकाल से चले आ रहे ” योग ” को महर्षि पतंजलि ने इस विशुद्ध ज्ञान को सरल स्वरूप में प्रस्तुत किया था।

योग की परिभाषा | definition of yoga

योग को हम निम्नानुसार परिभाषित कर सकते है-

‘योग’ एक विशुद्ध एवं प्रायोगिक विज्ञान है, जो शरीर और मन के बीच सामंजस्य बनाकर आत्मा को पूर्णता तक रेखा पहुँचाता है।

ऊपरोक्त परिभाषा में योग को एक विशुद्ध व प्रायोगिक विज्ञान कहा गया है।

विशुद्ध विज्ञान किसे कहते है? What is pure science?

विज्ञान से आशय किसी व्यवस्थित ज्ञान या विद्या से है जो विचार, अवलोकन, अध्ययन और प्रयोग से मिलती है, जो किसी अध्ययन के विषय की प्रकृति या सिद्धान्तों को जानने के लिये किये जाते हैं। विज्ञान शब्द का प्रयोग ज्ञान की ऐसी शाखा के लिये भी करते हैं, जो तथ्य, सिद्धान्त और तरीकों को प्रयोग और परिकल्पना से स्थापित और व्यवस्थित करती है।

शुद्ध शब्द का अर्थ Pure से है अर्थात जब हम किसी ज्ञान या वस्तु से समस्त अशुद्धियों को निकाल देते है तो उसे विशुद्ध कहते है। जैसा कि हम जानते है कि ” वि ” एक उपसर्ग है जिसका अर्थ है ” विशेष रूप से ” । जब हम विशेष रूप से किसी ज्ञान को शुद्ध करते है तो वह विशुद्ध ज्ञान अथवा विशुद्ध विज्ञान बन जाता है।

इस प्रकार हम कह सकते है कि योग एक विशुद्ध विज्ञान है जिसके नियम सर्वव्यापी व सर्वकालिक है।

योग शब्द का शाब्दिक अर्थ | Meaning of the word yoga

प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य पाणिनि ने ‘योग’ शब्द की व्युत्पत्ति तीन धातुओं- ‘युजिर् योगे= जोड़’, ‘युज् संयमने = सामंजस्य’ तथा ‘युज् समाधौ = समाधि’ से वर्णित की है। यूँ तो योग वह व्यापक, विशद् प्रक्रिया है जो कई चरणों से गुज़ारकर व्यक्ति को पूर्णता तक ले जाती है।

  • ‘युजिर् योगे= जोड़’ के अनुसार योग के माध्यम से हम तन, मन, आत्मा, मस्तिष्क व वातावरण को एक साथ जोड़ते है।
  • ‘युज् संयमने के अनुसार हम योग के माध्यम से तन, मन, आत्मा, मस्तिष्क व वातावरण में सामंजस्य स्थापित करते है।
  • ‘युज् समाधौ = समाधि’ के द्वारा हम तन, मन, आत्मा, मस्तिष्क व वातावरण में एकात्म स्थापित करते हुए समाधि की स्तिथि में पहुचते है।

योगासनों की सँख्या | Number of Yogasanas

मान्यता है कि भगवान शिव ने सम्पूर्ण विश्व में पाई जाने वाली 84 लाख योनियों अनुरूप 84 लाख आसनों की रचना की। इस तथ्य का विवरण प्राचीन ग्रंथों में भी पढ़ने को मिलता है।

आसनानि समस्तानि यावन्तो जीव जन्तवः । चतुरशीतिलक्षाणि शिवेन कथितानि च॥ (घेरण्ड संहिता, 2/1 )

अर्थ- आसनों की कुल संख्या समस्त जगत में जीव-जन्तुओं के बराबर अर्थात् 84 लाख है।

साक्षात् शिव और दीर्घायु, हठी एवं तपस्वी ऋषियों के लिए बेशक इतने आसनों को सिद्ध करना संभव हो सकता हो। पर समय के साथ, जनमानस की सुगमता को देखते हुए इनमें से कुछ सरल, सहज और अधिकाधिक लाभ प्रदान करने वाले आसनों को चुना गया। इनकी संख्या 84 है। इसलिए गोरक्ष संहिता व शिव संहिता में मुख्यतः 84 आसनों का ही वर्णन मिलता है।

योगासनों का वर्गीकरण | Classification of Yogasanas

ऋषि-मुनियों ने मानव समेत पशु, पक्षी व प्रकृति का के अध्ययन एवं उन पर अनुसंधान कर विभिन्न स्वास्थ्यवर्धक आसनों को वर्गीकृत किया। योगासनों को हम प्रमुखतः 6 भागों में बाँट सकते हैं।

  • पशु-पक्षी आसन।
  • प्रकृति आसन।
  • अंग आसन।
  • योगी आसन।
  • वस्तु आसन।
  • अन्य आसन।

पशु-पक्षी आसन- ये आसन पशु-पक्षियों की आकृति, उनके उठने-बैठने, चलने-फिरने के तरीकों के आधार पर बनाए गए हैं। जैसे- गोमुखासन, भुजंगासन, मयूरासन, सिंहासन, शलभासन, मत्स्यासन, मकरासन, उष्ट्रासन, शशांकासन, गरुड़ासन आदि ।

प्रकृति आसन– ये आसन प्रकृति यानि वृक्ष, वनस्पति आदि पर आधारित हैं। जैसे- ताड़ासन, वृक्षासन, पद्मासन, पर्वतासन, अर्धचंद्रासन आदि। ,

अंग आसन– इन आसनों के नाम अंग विशेष पर आधारित हैं। जैसे शीर्षासन, सर्वांगासन, पादहस्तासन या उत्तानासन, मेरूदंडासन, पाद अँगुष्ठासन, कटिचक्रासन, कर्णपीड़ासन, शवासन, भुजपीड़ासन आदि।

योगी आसन– ये आसन योगियों, अवतारों, महापुरुषों के नामों पर आधारित हैं। जैसे- नटराजासन, सिद्धासन, महावीरासन, ध्रुवासन, मत्स्येंद्रासन, हनुमानासन, भैरवासन, भरद्वाजासन, अष्टावक्रासन, वीरभद्रासन आदि।

वस्तु आसन– इन आसनों की प्रेरणा विशेष वस्तुओं से ली गई है। जैसे तुला से तोलासन, हल से हलासन, नौका से नौकासन, धनुष से धनुरासन, वज्र से वज्रासन आदि ।

अन्य आसन– उपरोक्त श्रेणियों के अतिरिक्त शेष सभी आसन इसी वर्ग में आते हैं। जैसे वक्रासन, सुखासन, वीरासन, पश्चिमोत्तानासन, त्रिकोणासन, चमत्कारासन आदि।

प्रिय साथियों, आने वाले लेखों के द्वारा हम आपको प्रत्येक प्रकार के योगासन को विस्तार से समझाने की योजना बना रहे है। हम यह भी प्रयास करेंगे कि आपको प्रत्येक योग के बारे में आधिकारिक जानकारी योगाचार्य के माध्यम से दी जाए। इस हेतु हम वीडियो प्रस्तुति भी देंगे।

सादर।

Leave a Comment

Your email address will not be published.

Scroll to Top